परिजनों के लिए विशेष साधना उपक्रम
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पिछली पंक्तियों में हमने परिजनों से अपनी तप−साधना में सहभागी बनने हेतु आग्रह किया था। इस उपक्रम में उन्हें पंद्रह-पंद्रह मिनट तान बार की त्रिकाल संध्या के रूप में उपासना, साधना, आराधना के निमित्त सुनिश्चित रूप से निकालना चाहिए।
उपासना :- प्रातःकाल नित्यकर्म से निवृत्त होकर एक माला गायत्री जप आत्मोत्कर्ष के लिए एवं एक माला वातावरण परिवर्तन के लिए करना चाहिए। साथ ही आत्मा को परमात्मा के साथ लिपट जाने का भाव भी करना चाहिए। ईंधन आग की तरह, नाले नदी की तरह, बिन्दु सिन्धु की तरह, पतंगे दीपक की तरह। आदर्शों के समुच्चय विराट् ब्रह्म के साथ अपनी सत्ता इसी प्रकार विसर्जित करनी चाहिए। बांसुरी वादक की तरह, पतंग उड़ाने वाले की तरह उसी के संकेतों पर चलने का निश्चय करना चाहिए।
साधना :- मध्याह्न काल में जीवन साधना के लिए पन्द्रह मिनट एकान्त चिन्तन मनन हेतु निकालना चाहिए इसमें आत्म समीक्षा-आत्म सुधार की योजना-आत्म निर्माण की विधि और आत्म विकास की स्थिति प्राप्त करने का विचार करना चाहिए। वर्तमान स्थिति में जो बन सकता हो, उसका ताना बाना बुनना चाहिए। चार संयम ही तप हैं। इन्द्रिय, अर्थ, समय और विचारों में से एक भी विभूति का अपव्यय न किया जाये। न्यूनतम में निर्वाह करने और परिवार छोटा स्वावलम्बी बनाने की नीति अपनानी चाहिए। सादा जीवन उच्च विचार की रीति-नीति का निर्वाह करने से अपने पास बहुत कुछ बचने लगेगा। आठ घण्टा कमाने के, सात घण्टा सोने के, पाँच घण्टा फुटकर कामों में लगने पर कुल बीस घण्टे निजी कामों में खर्च करने के उपरान्त भी चार घण्टे बचते हैं, जिनका सुनियोजन हो सकता है। यह इस पर निर्भर है कि स्वयं को कितना कसा गया।
आराधना :- सायंकाल सोते समय आराधना का पर्यवेक्षण करने के लिए बिस्तर पर पड़े-पड़े विचार करना चाहिए कि आज के समय, श्रम, वैभव एवं ज्ञान में से कितना अंश लोक मंगल के निमित्त लगा? नहीं लगा तो क्यों नहीं लगा? भविष्य में उन कारणों को दूर करना चाहिए जिनसे कि अपनी विभूतियाँ युगधर्म के लिए लग नहीं पातीं। शरीर से बढ़कर महत्व यदि आत्मा को मिले तो कोई कारण नहीं कि सारा समय और वैभव पेट प्रजनन के लिये ही लगे। समय की पुकार सर्वथा अनसुनी नहीं करनी चाहिए। चारों ओर के परिवेश से स्वयं को न प्रभावित होने देकर आत्मा की पुकार पर चलना चाहिए।
प्रातःकाल आत्मा को परमात्मा से लिपटा देना, मध्याह्न की बचत योजना कार्यान्वित करना और सायंकाल युगधर्म के लिए किये गये पुण्य परमार्थ का लेखा-जोखा लेना। संक्षेप में यही है उपासना, साधना, आराधना की विधा जिसे जीवन चर्या के साथ गूँथने पर जीवन त्रिवेणी संगम जैसा पवित्र, प्रखर, और प्रामाणिक बनता है और फिर काक के पिक एवं बगुले के हंस बनने में कोई बाधा मार्ग में नहीं आती।
युगधर्म हेतु क्या किया जाय, इसके लिये यही पर्याप्त है कि विचार क्रान्ति ही अपने समय का युगधर्म है। इसके लिये समयदान-अंशदान की श्रद्धाँजलि आवश्यक है ताकि झोला पुस्तकालय, ज्ञानघट के रूप में स्वाध्याय क्रम एवं जन्मदिवसोत्सव, कथा पुराण के रूप में सत्संग क्रम चल पड़े। जो पूरा समय दे सकने की स्थिति में हों वे शाँति कुँज को अपना घर बनाने की सोचें एवं समाज सेवा हेतु स्वयं को खपाकर उस ऋण में मुक्त होने की योजना बनायें जो अभी तक उस पर लदा है। उनके लिये क्या कैसी योजना है इसका स्वरूप अगले लेखों में है।
मिलन प्राणायाम :- प्रातःकाल सूर्योदय के समय चौबीस प्राणायाम करते रहने के रूप में प्रज्ञापरिजनों के लिये विशेष संपर्क स्थापना क्रम बनाया गया है। दिव्य प्रेरणा की लहरें उस समय विशेष रूप से संप्रेषित होती हैं। उन्हें खींचने और धारण करने की भावना साँस खीचते समय करनी चाहिए।
इन श्वासों के साथ कुछ विशेष संदेश संकेत हैं। दिव्यसत्ता के साथ मिलन, गुंथन एवं एकात्म अद्वैत स्थिति का अनुभव होगा। दिव्य प्राण समस्त नस−नाड़ियों में संव्याप्त होता प्रतीत होगा। श्वास खींचने और छोड़ने के इस प्राणायाम उपक्रम में भावना करनी चाहिए कि लोभ, मोह और अहंकार के तीनों भव बंधन पलायन कर रहे हैं। आत्मा सद्भावना, सद्विचारणा और सद्क्रिया पारायणता से उल्लसित हो रहा है।
ये सभी उपक्रम इस युग संधि वेला में हमारी परोक्ष साधना के रूप में सतत् निभाये जाते रहें।

