सूक्ष्मीकरण से सम्भावित परिणतियाँ
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मई 1984 से हमने अपने स्थूल शरीर से संभव हो सकने वाला स्थूल स्तर का क्रियाकलाप बन्द कर दिया। इसका अर्थ हुआ- भेंट, मिलन वार्तालाप, विचार विनिमय, परामर्श का अब तक चलने वाला सिलसिला एक प्रकार से समाप्त ही हो जाना। कोई विशेष अपवाद हो, तब ही इस प्रक्रिया का व्यक्तिक्रम करेंगे। जड़ नियम जड़ पदार्थों पर लागू होते हैं। चेतना की अपनी विशेष स्थिति है वह जीवित रहते हुए भी मृतक और मृत होते हुए भी जीवितों जैसे आचरण करती पायी जाती है।
हमारी सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया का प्रयोजन पाँच कोशों पर आधारित सामर्थ्यों को अनेक गुनी कर देना है। दो शरीर मिलकर तो गणना में दो ही होते हैं। पर सूक्ष्म-जगत में स्थूल अंक गणित, रेखा गणित, बीज गणित काम नहीं आती। उस लोक का गणना चक्र अलग ही गुणन क्रम से चलता है। स्कूली गणित में 2+2+2+2=8 होंगे। लेकिन सूक्ष्म जगत में 2×2×2×2=16 हो जायेंगे। सूक्ष्मीकृत शक्तियाँ कई बार तो इससे भी बड़े कदम उठाते देखी गई हैं। मनुष्य में पाँच कोश हैं। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय। मोटे तौर से सभी कोशों के जागृत होने पर एक मनुष्य पाँच गुनी सामर्थ्य सम्पन्न माना जाता है। पर दिव्य गणित के हिसाब से 5×5×5×5×5=3125 गुणा हो जाता है। शरीर गत पाँच भौतिक शरीर प्रत्यक्ष गणित के हिसाब से ही कुछ काम कर सकते हैं। चेतना के पाँच प्राण भी शरीर की परिधि में बंधे रहने तक पाँच विज्ञजनों जितना ही होते हैं, पर सूक्ष्मीकृत होने पर गणित की परिपाटी बदल जाती है और एक सूक्ष्म शरीर की प्रखर सत्ता 3125 गुनी हो जाती है।
हनुमान द्वारा रामायण काल में जो अनेकों अद्भुत काम संभव बन पड़े, वे उनके सूक्ष्म शरीर के ही कर्तव्य थे। जब तक वे स्थूल रहे, तब तक उन्हें सुग्रीव का नौकर रहना पड़ा और बातों द्वारा बालि द्वारा सुग्रीव की तरह उन्हें भी अपमानित होना पड़ा। पर सूक्ष्मता का अवलम्बन तो चेतना की सामर्थ्य को कुछ से कुछ बना देता है।
यह कार्य युग परिवर्तन प्रयोजन में भगवान की सहायता करने के लिए मिला है। युग संधि का समय सन् 2000 तक चलेगा। इस अवधि में हमें न बूढ़ा होना है, न मरना। अपनी 3125 गुनी शक्ति के अनुसार काम करना है। कालक्षेत्र के नियमों का भी सीमा बंधन नहीं रहेगा। इसलिए जो काम अभी हाथ में हैं, वे अन्य शरीरों के माध्यम से चलते रहेंगे। लेखन हमारा बड़ा काम है, वह अनवरत रूप से सन् 2000 तक चलेगा। यह दूसरी बात है कि कलम जो हाथ में जिन अंगुलियों द्वारा पकड़ी हुई है वे ही कागज काला करेंगी या दूसरी। वाणी हमारी रुकेगी नहीं। यह प्रश्न अलग है जो जीभ इन दिनों बोलती चालती है, वही बोलेगी या किन्हीं अन्यों को माध्यम बनाकर काम करने लगेगी। अभी हमारा कार्य क्षेत्र मथुरा, हरिद्वार रहा है और हिन्दू धर्म के क्षेत्र में कार्य चलता रहा है। आगे वैसा देश, जाति, लिंग, धर्म, भाषा आदि का कोई बन्धन न रहेगा जहाँ जब जैसी उपयोगिता आवश्यकता प्रतीत होगी वहाँ इन इन्द्रियों की क्षमताओं से समयानुकूल कार्य लिया जाता रहेगा।
सन् 2000 तक किसी अनाड़ी को ही हमारे मरण की बात सोचनी चाहिए। विज्ञजनों को स्मरण रख लेना चाहिए कि इस दृश्यमान शरीर से भेंट दर्शन, परामर्श, हो या नहीं, हमारे अपने कार्य क्षेत्र में उत्तरदायित्वों की पूर्ति में अनेक गुनी तत्परता से काम होते रहेंगे। सहकार और अनुदान क्रम भी चलता रहेगा। हमारे मार्गदर्शक की आयु 600 वर्ष से ऊपर है। उनका सूक्ष्म शरीर ही हमारी रूह में है। हर घड़ी पीछे और सिर पर उनकी छाया विद्यमान है। कोई कारण नहीं कि ठीक इसी प्रकार हम अपनी उपलब्ध सामर्थ्य का सत्पात्रों के लिए सत्प्रयोजनों में लगाने हेतु वैसा ही उत्साह भरा उपयोग न करते रहें। पाठकों-आत्मीय परिजनों को सन् 2000 तक सतत् हमारे विचार ‘ब्रह्मवर्चस’ नाम से पत्रिकाओं पुस्तिकाओं फोल्डरों के माध्यम से मिलते रहेंगे।

