मात्र सुधार ही नहीं, निर्माण भी अपरिहार्य
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रामचरित मानस में राम जन्म से लेकर उनके लंका दमन और राज्यारोहण तक का वृत्तांत है। पर इतने में सम्पूर्ण रामायण नहीं बनती। भगवान दो उद्देश्य लेकर अवतरित हुए थे। एक अधर्म का नाश, दूसरा धर्म का परित्राण। तुलसीकृत रामचरित मानस में असुरता से परित्राण का विवरण ही लिखा गया है। धर्म की स्थापना कैसे हुई। यह एक स्वतंत्र विषय है। उसमें परिश्रम कम न लगा होगा। योजना छोटी न बनी होगी, साधन कम लगे होंगे और थोड़े नल-नीलों से काम न चला होगा। पर उस सब का वर्णन उस ग्रंथ में नहीं है। रामराज्य की स्थापना को धर्मराज्य की स्थापना या सतयुग की वापसी कहा जाता है। यह कार्य ऐसे ही जादू की छड़ी घुमाते न हो गया होगा। असुरता उन्मूलन में जितना पुरुषार्थ अपेक्षित है उतना ही देवत्व की स्थापना हेतु भी अभीष्ट है।
सभी जानते हैं कि ध्वंस सरल है और निर्माण कठिन एक तीली से समूचा गाँव जल सकता है किन्तु उसे फिर से उसी रूप में या उससे भी अच्छे ढंग से बनाना हो तो इसके लिए कितने बड़े कितने समर्थ प्रयत्नों की आवश्यकता पड़ेगी। इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। रामराज्य की स्थापना को कम महत्व नहीं दिया जा सकता है क्योंकि वस्तुतः वही लक्ष्य था। मात्र असुरों को मार डालना भर लक्ष्य रहा होता तो उतने भर से क्षणिक राहत की ठंडी साँस लेने का अवसर न मिलता। वह सब कहाँ दृष्टिगोचर होता जिसकी याद अभी भी आती रहती है लंका दहन के उपरान्त वहाँ मात्र मरघट जैसे दृश्य दिखाई पड़ते। जले भवन, छितराई लाशें, दुर्घटित कबाड़ देखकर कौन यह अनुमान लगा पाता कि रामचन्द्र जी ने कोई कहने योग्य पुरुषार्थ किया।
बात लंका की हो- अयोध्या की हो- या सम्बन्धित इलाके की। प्रशंसा की बात तभी कही जा सकती है, जब वहाँ कुछ ऐसा बन पड़ा हो जो पुराने की तुलना में और अधिक शानदार रहा हो। यह किस प्रकार सम्पन्न हुआ। इसका उल्लेख रामायण में नहीं है। इसका अर्थ यह हुआ कि रामचरित मानस के प्रमुख सूत्र संचालक का उसमें बहुत बड़ा भाग न रहा होगा। वह सम्भवतः दूसरों ने किया होगा।
सूक्ष्मीकरण को उद्देश्यों में एक पक्ष वह है जिसे आक्रमणात्मक कहा जा सकता है। उलटे को उलट कर सीधा करना। यह गिरी हुई रेलगाड़ी को क्रेन द्वारा पटरी पर से उठाकर खड़ी कर देना हुआ। इतने भर से रेलगाड़ी चलने थोड़े ही लगेगी। उसकी मरम्मत भी लाको वर्क शाप में ले जाकर करनी होगी। भयंकर अग्नि-काण्ड को दमकलें अथक परिश्रम से बुझाती हैं। लपटें ठंडी होने पर सन्तोष की साँस ली जाती है। फिर भी जो घर जले हैं उनके निवासियों को यथास्थिति पहुँचाने का कार्य फिर भी बाकी रह जाता है। लड़ाई के दिनों शत्रु का आक्रमण रोकने के लिए नदी के पुल तोड़ दिये जाते हैं। पर वे सदा टूटे ही थोड़े पड़े रहते हैं। उन्हें फिर से बनाना पड़ता है अन्यथा आवागमन रुक जाने से उस क्षेत्र की जनता त्राहि-त्राहि कर उठेगी। शत्रु का मार्ग रोकने के लिए पुल किसने तोड़ा इसकी चर्चा प्रमुख रूप से होती है। पर पीछे उसे नये सिरे से बनाने में कितने इंजीनियर ठेकेदार, श्रमिक आदि लगे। उसका उल्लेख प्रायः कम ही होता है।
इन दिनों ध्वंस, विनाश, विग्रह और पतन की शक्तियों का तूफानी उभार है। इन्हें रोकना आज का प्रमुख काम है। इसके लिए जो कुछ किया जाता है उसे रोकथाम करना कहना चाहिए। यह आवश्यक है। तात्कालिक उपाय भी है। इसके बिना गाड़ी आगे बढ़ती ही नहीं । इसलिए प्राथमिकता या प्रमुखता भी इसी को देना अनिवार्य समझ हमें यह अवलम्बन अपनाना पड़ा है।

