आत्मबल स्थायी भी फलदायी भी
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शक्तियों से सबसे बड़ी शक्ति आत्मबल है। प्रकृति बल सभी अस्थायी है। फिर उनका तनिक भी दुसंग बन पड़ने पर अपने तथा दूसरों के लिए विपत्ति खड़ी होती है। धन, यौवन, सौंदर्य, पद, ज्ञान आदि सभी के सम्बन्ध में यही बात कही जा सकती है। इनके बदले तत्काल सुविधा साधन खरीदे जा सकते हैं। इसलिए वे भी बहुत भाते हैं। सभी उन्हें कमाने, पाने के लिए आतुर रहते हैं। किन्तु साथ ही यह भी निश्चित है कि प्राप्त करने वालों में से सदुपयोग की विधा से अपरिचित रहने के कारण उल्टा अनर्थ मोल लेते हैं। दुर्व्यसनी, कुकर्मी, दुर्गुणी प्रायः सम्पन्न लोग ही अधिक होते हैं। ईर्ष्या की आग में उन्हीं को अधिक जलना और जलाना पड़ता है। फिर इनमें से किसी के भी स्थायित्व का ठिकाना नहीं। इस प्रवाहमान विश्व व्यवस्था में हर वस्तु क्षण-क्षण बदल रही है- अपना मन भी। ऐसी दशा में कौन वस्तु कब तक प्रिय रहने योग्य रहे इसका कुछ कहा नहीं जा सकता।
इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए विज्ञजन सदा से आत्मबल के सम्पादन पर जोर देते रहे हैं। उसके स्थायित्व भी है। चेतना को परिष्कृत करने से व्यक्तित्व निखरता है और वह निखरा हुआ व्यक्तित्व भौतिक एवं आत्मिक दोनों ही क्षेत्रों की सफलताएँ अर्जित करने में समान रूप से लागू होता है।
आत्मबल के धनी सच्चे अर्थों में धनी होते हैं। वे भौतिक दृष्टि से गरीब दीखते भर हैं वस्तुतः कंगाल नहीं होते। खाने की अपेक्षा उन्हें खिलाने में अधिक रस आता है इसलिए अपव्यय में उड़ाने या ठाट-बाट संजोने की अपेक्षा वे उसे दूसरे जरूरतमंदों को बाँटने रहते हैं। इसलिए व्यक्तिगत जीवन में सादगी अपनाने वाले अध्यात्मवादी गरीब जैसे लगते भर हैं। उनकी भौतिक सम्पदा भी असाधारण होती है। जब उन्हें किन्हीं महत्वपूर्ण कार्यों के लिए असीम जन सहयोग मिलता है तो विदित होता है कि उसका पैसा कितनों की जेब में सुरक्षित रखा था जो आवाज देते ही खिंचता चला आयेगा।
गाँधी जी गरीबी में रहते थे पर उनकी स्मृति में जो गाँधी स्मारक निधि बनी उसमें करोड़ों रुपया एकत्रित हुआ। उनकी धर्म पत्नी के स्मारक में भी साठ करोड़ रुपया एकत्रित हुआ था। महामानवों में से किसी को भी पैसे की कमी से अपनी महती योजनाएँ रोकनी नहीं पड़ी हैं। सुग्रीव, विभीषण, सुदामा, नरसी आदि में से किसी को भी धन का घाटा नहीं पड़ा। यदि वे आदर्शों से दूर मात्र पेट प्रजनन में ही संलग्न रहते। तो शायद वैसे ही बने रहते जैसे कि अपने मतलब से मतलब रखने वाले आमतौर से रहते देखे गये हैं।
आत्मबल सबसे बड़ा बल है। उसे संग्रह करने के लिए विज्ञजनों व हर श्रेयार्थी को सलाह दी है। जिनने ये माना है वह आरम्भ में धूर्तों की बिरादरी में उपहासास्पद भले ही बना हो। कुछ ही समय पश्चात् यह अनुभव किया गया कि इस मार्ग पर चलने वाला, कोई कुछ खोता नहीं कमाता ही है। खोटे नकली अध्यात्म को अपनाने वाले हैं। जो धूप दीप की कीमत पर देवताओं की जेब काटने की फिकर में रहते हैं। घाटा उन्हें ही पड़ता है। असली अध्यात्म में पूँजी गुमने जैसा कुछ है ही नहीं। जो लगाया जाता है वह हजार गुना होकर वापस लौट आता है। जीवन की सार्थकता आत्म-वैभव के सम्पादन में ही है। हम अपने सभी प्रियजनों को यही परामर्श एवं प्रोत्साहन देते रहे हैं। अब भी अपने अनुभव और उदाहरण को सभी प्रस्तुत करते हुए यही कह सकते हैं कि हमारा सीधा संपर्क न रहने पर भी यदि वे हमें- हमारे परामर्श को कोई महत्व दें तो जीवनचर्या ऐसी बनायें जिसमें आत्मिक प्रगति की साधना साथ-साथ चलती रहे। इसमें वे घाटे में नहीं नफे में रहेंगे।

