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Magazine - Year 1984 - Version 2

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गायत्री नगर में बसने हेतु भाव भरा आह्वान। - सतयुग के स्वप्न को हमीं साकार करें

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मनुष्य शरीर संरचना की दृष्टि से पशु है। शिक्षा जिसे जिस स्तर की जितनी विभिन्न परिस्थितियों में मिली है, वह उसी स्तर का मानव कहला सकने का अधिकारी हुआ है। यदि उसके लिए कुछ भी शिक्षा का प्रबन्ध न किया जाय तो निश्चित ही इस सभ्यता के युग में भी आदिम कालीन वन-मानुषों की तरह आचरण करता हुआ दिखाई देगा। भेड़िये द्वारा पाले गए रामू मनुष्य बालक के बारे में यह गाथा सर्व विदित है कि वह चार पैरों से चलता, मुँह से गुर्राता ओर कच्चा माँस खाता था। गुफा-जंगल में रहना उसे प्रिय था। बहुत प्रयत्न करने के उपरान्त ही मनुष्य जैसी छोटी मोटी आदतें उसे सिखाई जा सकीं थी।

अन्न वस्त्र की प्रधानता सर्वोपरि है पर इसके बाद यदि अगला नम्बर आता है तो वह शिक्षा का ही है। शिक्षा में पुस्तकों और अध्यापकों से सहायता मिलती है पर यह नहीं समझ बैठना चाहिए कि इनके बिना दूसरा कोई उपाय नहीं है। मनुष्य सहजीवी प्राणी है। अनुकरण उसकी मूल प्रवृत्ति है। जिन लोगों के साथ वह रहता है, उन्हें जो कुछ बोलते-सोचते-करते देखता है, उसी को बुद्धि विकास के साथ-साथ सीखने लगता है। वन वासी भी अपनी जीवन शैली सीखने में उतने ही चतुर होते हैं जितने कि सभ्य लोग। अनुचित-उचित का भेद बहुत विकसित मनःस्थिति में आता है। आरम्भ तो नकल को अपनाने से ही होता है। यही है मानवी उत्थान या पतन की विधि व्यवस्था।

अभी भी न्यूगिनी-अफ्रीका-अडमणन जैसे क्षेत्रों के आदिवासी सभ्यता के इस युग में भी सैकड़ों वर्ष पीछे हैं। इसके विपरीत उत्तरी ध्रुव के घोर शीत वाले सुविधा रहित क्षेत्र में चिरकाल से निवास करने वाले एस्किमो लोगों को जब कनाडा के सुविकसित लोगों के साथ रहने का अवसर मिला तो कुछ ही समय में वे उतने ही प्रगतिशील बन गए जितने कि उस क्षेत्र के अन्य लोग थे। यह शिक्षा का चमत्कार है। इसलिए यदि शिक्षा को जीवनदायिनी कहा जाय तो उसमें अतिश्योक्ति की कोई बात नहीं है। शिक्षा एक बड़े समुदाय के बीच निवास करते हुए उसकी परम्परा उपक्रम का नाम है। इसमें पुस्तकों और अध्यापकों से सहायता तो मिलती है। पर ऐसी बात नहीं कि इनके बिना प्रगति हो ही न सके। समूह का प्रवाह ही शिक्षा का उद्गम स्रोत है। साथ ही यह कहने में भी हर्ज नहीं कि शिक्षा ही मनुष्यता का मेरुदण्ड है। अन्यथा वह नर वानर-वन-पशु ही बनकर रह जाता।

संसार के इतिहास के महत्वपूर्ण घटनाक्रमों का पर्यवेक्षण करने पर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि प्रगति और पिछड़ेपन का वास्तविक एक मात्र कारण शिक्षा का स्तर रहा है। जहाँ यह प्रयोग जितने अंशों में जितने ऊँचे स्तर का हुआ है, वहाँ लोग अपनी व अपने क्षेत्र वासियों की हित साधना करने में सफल रहे हैं। उसके लिये संयोग तथा साधना से सिद्ध वातावरण भी स्तर को ऊँचा उठाने में मददगार सिद्ध हुआ है। उदाहरण के लिये भारत कभी संसार का मुकुट मणि था। इसका कारण यहाँ की प्राकृतिक सम्पदा नहीं वरन् शिक्षा, सभ्यता और संस्कृति थी। उसके विपरीत संसार में अधिक सम्पन्न क्षेत्र भी रहे हैं। पर अपने अनाचरण के कारण निरन्तर कलह पराभव के निमित्त कारण बने रहे।

शरीर, धन, शिक्षा ये शरीरगत बल हैं। इनके बदले में पराक्रम खरीदे जा सकते हैं- वैभव कमाया जा सकता है। किन्तु व्यक्तित्व चेतना का गुण है। उसके लिये गुण कर्म, स्वभाव का ऊँचा स्तर चाहिए। यह अध्यवसाय, वातावरण, मनन, चिन्तन और अभ्यास के आधार पर हस्तगत होता है। व्यक्तित्व का मूल्याँकन इसी आधार पर होता है। महत्वपूर्ण कार्य इसी के सहारे बन पड़ते हैं। गौरव गरिमा इसी के आधार पर निखरती है। महा मानवों में गणना कराने वाली विभूति यही है। अपने देश में इसी सुसंस्कारिता को प्रमुख माना गया है। इसके लिए अध्ययन-अध्यापन ऐसे रखा जाता था जिसके सहारे व्यक्ति सभ्य एवं सुसंस्कारी बन सके। इसके लिए ऐसे ही सान्निध्य संपर्क की भी आवश्यकता रहा करती है। अनुकरण प्रिय वृति होने के नाते मनुष्य को ऐसा सान्निध्य चाहिए जिससे सद्गुणों का निरन्तर अभ्यास बढ़ता रहे। साहित्य का अध्ययन चिन्तन, मनन का उपक्रम ऐसा होना चाहिए जिससे चेतना का स्तर सुविकसित होता हो। यह विभूति जिसे उपलब्ध है वह शरीर से चाणक्य जैसा कुरूप अष्टावक्र जैसा अपंग कालिदास जैसा अशिक्षित, सुदामा जैसा निर्धन होते हुए भी इन कमियों के कारण जीवन के किसी भी क्षेत्र में रुकता नहीं। सफलता की दिशा में द्रुतगति से आगे बढ़ता जाता है।

भारत की देव मानवों की निवास स्थली देव भूमि मानी जाती रही है। इसका कारण यहाँ जन्मने वालों की कायकलेवर सम्बन्धी विशेषता से कोई संबन्ध नहीं रहा है। शरीरों की रचना जैसी पुरातन काल में थी वैसी ही अब भी है। सच तो यह है कि साधन-सुविधाओं की दृष्टि से हम पूर्वजों की तुलना में कही अधिक सुसम्पन्न हैं। कमी है तो मात्र सुसंस्कारिता की। इस सबके कारण ही व्यक्ति हर दृष्टि से दीन हीन हो गया है। धूर्त्तता, लोलुपता, वितृष्णा जैसे दुर्गुणों के कारण व्यक्ति सम्पन्नता और शिक्षा के रहते हुए भी असंतोष और उद्वेग से हर घड़ी घिरा रहता है। स्वयं बेचैन रहता है और संपर्क क्षेत्र में किसी को चैन से नहीं रहने देता।

पुरातन काल के सतयुगी वातावरण को वापस लाने के लिए हमें सुसंस्कारिता का वातावरण पुनः बनाना होगा। यह कहीं बाजार में नहीं बिकती ओर न पेड़ों पर लगती है। उसके लिये व्यक्ति का कार्यक्षेत्र श्रेष्ठ सज्जनों से घिरा और शालीनता की विचार धारा से भरा होना चाहिए। व्यक्तित्व की समग्र प्रगति का यही एक उपाय है। प्राचीन काल में घर-परिवार इसी विशेषता से भरे पूरे होते थे। उनके सामने ऐसा चिन्तन रहा था जिसके कारण सदा आदर्शों के चिन्तन में निरत रहना पड़े। उन दिनों छोटे-छोटे गाँव बसते थे ताकि उनका सुसंचालन भली प्रकार हो सके। एक दूसरे को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने हेतु, समय निकाल सके, ध्यान दे सके। अब मनुष्य बेतरह कट गया है। बड़े गाँव शहरों आदि में रहने व पारस्परिक संपर्क न मिल पाने के कारण मनुष्य जंगली इक्कड़ जानवरों की तरह एकाकी और उच्छृंखल जीवन जीने लगा है। दूसरों के साथ ताल मेल रखने वाली परम्परा एक प्रकार से समाप्त हो गयी।

हमने सदा से सतयुग की वापसी का सपना देखा है। अखण्ड ज्योति परिवार, गायत्री परिवार, प्रज्ञा परिवार आदि “परिवार परक” सम्बोधन ही हमें अच्छे लगते रहे हैं। इसीलिये आवश्यक समझा गया कि उनका विस्तार इस असामान्य स्तर का हो कि वे एक दूसरे का प्रभाव ग्रहण कर सकें, प्रभाव दे सकें। इस से तात्पर्य है छोटे नगर। विश्वनिर्माण, युगनिर्माण के लिए हमने ऐसे छोटे नगर बनाने का स्वप्न देखा है जिनमें सुसंस्कारिता के अभिवर्धन के समस्त साधन मौजूद हों। एक दूसरे के साथ पारिवारिकता के संबंध सूत्र में वे बंधें और निरन्तर सर्वतोमुखी प्रगति से लाभान्वित होते रहें।

गायत्री परिवार हमारी सर्व प्रथम एवं गायत्री नगर अंतिम संरचना है। स्थापना हम कर चुके, उन्हें गतिशील बनाना परिजनों का काम है। स्वप्न हमने देखा, साकार उसे आप कर दिखाएँ। सतयुग की नवयुग की कल्पना ही नहीं हमने की उसका विधान, स्वरूप, विवेचन एवं कार्यक्रम भी प्रशिक्षित किया अब बारी परिजनों की है कि वे उस राजमार्ग पर चलें और उस मार्ग पर पहुंचें जहाँ केवल अपनी, अपने परिवार की वरन् समस्त संसार की सुख सम्पन्नता ओर प्रगति की संभावनाएँ छिपी पड़ी है।

हमने शान्ति कुँज की छोटी एवं गायत्री नगर की बड़ी इमारत इतनी जल्दी और इतने भव्य रूप में बना दी कि उसे विश्वकर्मा की कृति कहा जा सकता है। अब बारी है कि उसे हरी-भरी फुलवारी के रूप में सुविकसित कर दिखाएँ।

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