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Magazine - Year 1984 - Version 2

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भूत एक भ्रम भी- एक वास्तविकता भी

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First 20 22 Last
चिरकाल से प्रचलित एवं बहुसंख्य व्यक्तियों से व्यवहृत मान्यताएँ मस्तिष्क के चारों ओर एक घेरा बना लेती हैं और एक सच्चाई की तरह प्रतीत होने लगती हैं। मनुष्य की विचार तरंगें पृथ्वी पर छाये आयन मण्डल की तरह की मस्तिष्क के चारों ओर एक आयडियोस्फियर बना लेती हैं जो अपना प्रभाव सतत् मानवीय चिन्तन पर डालता रहता है। वैज्ञानिकों का कथन है कि हर व्यक्ति अपना विचार मण्डल (आयडियोस्फियर) बनाने के लिये पूर्ण रूपेण स्वतन्त्र है। वह चाहे तो इसे विधेयात्मक रूप देकर मनःशक्तियों को विकासोन्मुख कर सकता है, साथ ही निषेधात्मक विचार प्रवाह उसे पतन के गर्त्त में भी ढकेल सकता है। लेकिन इसी आयडियोस्फियर से सम्बन्धित एक और प्रकरण ऐसा है जो दैनन्दिन जीवन क्रम में मानवी व्यवहार में देखने को मिलता है। वह है- कुकल्पनाओं से गढ़ा हुआ विचित्र जगत- जिसमें भूत-पलीत, डायन-चुड़ैल आदि बसते हैं।

वंश परम्पराओं से विभिन्न समाजों में देवी-देवता पूजे जाते रहते हैं। उनके वंशधर वैसा ही देखते-सुनते रहते हैं जो उन्हें उनके बड़े-बूढ़ों ने बताया है। उनकी कथा-गाथाएँ घरों में चला करती हैं। इन कथनोपकथनों से उनके अस्तित्व ओर क्रिया-कलाप की पुष्टि होती रहती है और फलतः छोटेपन से ही उन मान्यताओं को इतनी मजबूती से पकड़ लेती है कि वे लगभग सच्चाई जितनी गहराई तक मनःक्षेत्र में अपनी जड़ें जमा लेती हैं। मान्यताएँ जड़ें पकड़ लेने पर सच्चाई बन जाती हैं अथवा सच्चाई बहुत दिनों तक कार्यान्वित होते रहते पर लोक-मान्यता बन जाती है, यह कहना कठिन है। सन्देह इसलिये उठता है कि विभिन्न स्थानों पर कितनी ही मान्यताएँ एक दूसरे से सर्वथा विपरीत होते हुए भी सच्चाई समझी जाती है। विशेषतया यह बात देवी-देवताओं के सम्बन्ध में- भूत-प्रेतों के सम्बन्ध में विशेष रूप से लागू होती है। अवास्तविकता की ऐसी प्रतिक्रिया जो वास्तविकता से किसी भी प्रकार कम नहीं होती, आश्चर्यजनक है। साथ ही जिन क्षेत्रों में जो भूत-प्रेत माने या देवी देवता पूजे नहीं जाते रहे हैं, वहाँ उनके सम्बन्ध में चर्चा की जाय तो उन बातों की मजाक उड़ा दी जाती है और अविश्वास व्यक्त किया जाता है। इसके विपरीत जिन परिवारों में जो देवी देवता माने या पूजे जाते रहते हैं वहाँ उनके अस्तित्व के बारे में सन्देह उत्पन्न करने वाली बातें सर्वसाधारण द्वारा उपहास में उड़ा दी जाती हैं एवं आक्रामक प्रतिरोध भी किया जाता है।

ऐसी ही और भी कितनी ही मान्यताएँ हैं। उदाहरणार्थ जैन धर्म के अनुयायियों के सम्मुख देवताओं द्वारा बलि माँगे जाने और न देने पर रुष्ट होने की बात कदापि गले न उतरेगी इसके विपरीत आदिवासी- वनवासी लोग तनिक-तनिक सी बात की भूल में भूत का आक्रोश समझते ओर उसके निराकरण के लिए पशुबलि ही एकमात्र उपाय मानते हैं। दोनों ही अपने-अपने पक्ष में इतने कारण प्रमाण प्रस्तुत कर सकते हैं कि अपने स्थान पर दोनों ही सही प्रतीत होते हैं। यदि ऐसा न होता तो अपनी क्षेत्र को सही सिद्ध करने के लिए वे इतना जोर ही क्यों देते और विपरीतगत प्रकट करने पर आक्रोश क्यों व्यक्त करते?

सत्य क्या है? अभी तक इसका सही विवेचन नहीं हो सका। अन्तःकरण जैसे-जैसे उदार और निर्मल होता जाता है, वैसे-वैसे सत्य की उदात्त परिभाषा होने लगती है। मान्यताओं का आवरण हट जाता है। किन्तु साथ ही यह बात भी सच है कि यदि अन्तरात्मा का स्तर गिरने लगे, दुष्टता का पक्षधर बनने लगे तो भी कुकर्म करते समय कोई ग्लानि न अनुभव होगी। वरन् वह कार्य हर दृष्टि से सही प्रतीत होने लगेगा। जिनका कार्य प्रतिदिन ढेरों जीवों की हिंसा करते रहना है, उन्हें अपना कार्य कुछ ही समय पश्चात् स्वाभाविक मनोरंजक ही नहीं, उपयोगी भी प्रतीत होने लगता है। वे तब अपने कार्य के पक्ष में ऐसी दलीलें भी देने लगते हैं जिससे तार्किक दृष्टि से अपनी बात का औचित्य भी ठहराया जा सके।

यहाँ चर्चा भूत-पलीतों के सम्बन्ध में हो रही है। जिक्र चल ही पड़ तो मनुष्य जैसे स्वभाव एवं आकृति प्रकृति के भूत-पलीतों को भी देवी-देवता कहा जा सकता है। बड़े रूप में देखा जाय तो अति सामर्थ्यवान प्रकृतिगत शक्तियों को भी देवता का रूप दिया जा सकता है- जैसे सूर्य, चन्द्र, पवन, अग्नि, वरुण आदि।

संसार में अनेकों प्रकार की अनेकों क्षेत्रों में अनेकानेक मान्यताएँ प्रचलित हैं और उन सभी के अभ्यस्त अनुयायी अपनी बात पर उतना ही जोर देते हैं, मानों पूर्ण सत्य ही जिम्मेदारी या ठेकेदारी उन्हीं के हिस्से में आई हो। यदि ऐसा न होता तो धर्म सम्प्रदायों के नाम पर अब तक जो लम्बे समय से भयानक रक्तपात होता रहा है, वह क्यों होता? इतनी गुँजाइश या सहनशीलता किसी भी धर्म में नहीं है जो यथार्थता का पता लगाने के लिए अपनी मान्यता का भी एक पक्ष मानने की उदारता बरत सके। हर धर्मावलम्बी अपने मन्तव्य को पूर्ण सत्य और अन्यान्य मतावलंबियों को भटके हुए मानकर पूर्वाग्रहों से भरकर विवाद क्षेत्र में उतरना चाहता है। यहाँ कठिनाई एक ही है कि पूर्वाग्रहों के आधार पर जमी हुई मान्यता इतनी प्रबल होती है कि अपने सिवाय अन्य किसी के तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण को वह गम्भीरता से लेना नहीं चाहती। फलतः शास्त्रार्थ का कभी कोई निर्णय नहीं निकलता, मात्र वितण्डावाद बनकर यह जाता है।

चर्चा का मूल विषय सूक्ष्मीकरण है। शरीर का अन्त हो जाने के उपरान्त आत्मा का अस्तित्व शरीर के रूप में रहता है या नहीं अथवा शरीर रहते हुए भी कई आत्माएँ अपने सूक्ष्म शरीर से असम्भव समझे जाने वाले प्रत्यक्ष क्रिया-कलाप कर सकती हैं या नहीं, इसके लिये तर्क, तथ्य का कौन-सा आधार अपनाया जाय? मूल प्रसंग यही है। अपना पक्ष प्रस्तुत करने पर भी इन पंक्तियों के पाठकों ने कई मान्यताएँ दृढ़तापूर्वक अपना ली होंगी तो फिर वे उन्हीं पर हठधर्मी बने रहेंगे और सूक्ष्मीकरण प्रसंगों को उथली कल्पना भर मानते रहेंगे।

मान्यता का सत्य ही एक विशेष प्रकार का सत्य है, जो लगभग पूर्ण सत्य के समतुल्य ही जा पहुँचता है। हो सकता है। कि पुराना मत बदलने पर पूर्वाग्रहयुक्त सभी तर्क गलत भी प्रतीत होने लगें पर जब तक उन पर हठधर्मिता का आवरण है तब तक तो वे उनकी अपनी दृष्टि में पूर्ण सत्य ही प्रतीत होंगे। न केवल प्रतीत होंगे वरन् परिणाम भी वैसे ही प्रस्तुत करेंगे। यह श्रद्धा का क्षेत्र है। श्रद्धा जब सृजनात्मक एवं सघन होती है, तब वह जैसी है अपने साथ वातावरण, परिस्थितियाँ एवं घटनाएँ भी बदलकर रख देती हैं।

“शंका डायन मनसा भूत” की उक्ति पूरी तरह सत्य है। यदि मरघट की, समीपवर्ती झाड़ी की मान्यता भूत-चुड़ैलों से जुड़ी हुई हो तो उधर से निकलने पर हिलती हुई पत्तियाँ भी असली डायन की तरह खूँखार प्रतीत होंगी और उस व्यक्ति को भयाक्राँत कर देंगी। मन में भूत उत्पन्न होना भी उतना ही सत्य है। रात्रि के निविड़ अन्धकार में जग रहे व्यक्ति को पूर्व मान्यतानुसार दरवाजों या खिड़कियों का खड़खड़ाना भी भूत द्वारा की गयी गड़बड़ी का प्रमाण देता है। अब तक भूत-प्रेतों के चंगुल में फँसे सहस्रों व्यक्ति जीवन गँवा चुके हैं, तान्त्रिकों के चंगुल में फँसकर धन, स्वास्थ्य एवं मनोबल खो चुके हैं। उनके मिथ्या विश्वास ने ही उन्हें असली भूत की उपस्थिति की तरह डरा दिया पर वह डर उनका जान लेकर ही विदा हुआ।

भूत वस्तुतः होता है या नहीं, यह शोध का विषय है पर पिछड़े वर्गों में जो भूतोन्माद की बीमारी पाई जाती है उसके मूल में कुछ तो उनके मिथ्या विश्वास ही जड़ जमाए बैठे होते हैं, कुछ अवसर आ पड़ने पर आसपास के वातावरण के कारण भूत रूप में उन पर छा जाते हैं। वे ऐसा व्यवहार करने लगते हैं, मानो भूत उन पर सवारी गाँठकर कुछ कहलवा रहा हो या करा रहा हो। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति मिथ्या विश्वास पर अवलम्बित होते हुए भी रोगी को जीवन भर आतंकित किए रहती है। यह शोधकर्ताओं का विषय है कि वे देखें कि कोई भूत था भी या नहीं। केवल विश्वास और पूर्वाग्रह ही स्वसम्मोहित करके रोगी के लिए घातक स्थिति उत्पन्न करने न लगें।

प्रश्न यहाँ शोध का ही नहीं, इसका भी है कि ऐसी स्थिति में फँसे हुए रोगी के प्राण बचाने के लिए क्या किया जाय? उत्तर एक ही है- काँटे से काँटा निकाला जाय। भूत-प्रेत भगाने वाले कई तरह के उपचार करते हैं व जताते हैं कि भूत को पकड़कर घड़े में या बोतल में बन्द कर दिया गया और उसे कहीं जमीन में गाड़ या जला दिया गया। इससे रोगी को विश्वास हो जाता है कि भूत सचमुच ही नष्ट कर दिया गया एवं उसे राहत मिलती है। यदि रोगी समझदार है और उसे वस्तुस्थिति समझाई जा सकती है। तो उसे यह समझाया जा सकता है कि आत्म-विश्वास स्वसम्मोहन कितना जबरदस्त तथ्य है और किसी को भ्रमित कर काया व मस्तिष्क की यह क्या से क्या दुर्गति कर सकती है।

फ्राँस के एक राजा ने मृत्युदंड पाए रोगी को मनोवैज्ञानिक एवं विचित्र ढंग से फाँसी दी। उसकी आँखों पर पट्टी बाँध दी गई एवं एक पात्र से जल टपकाते हुए सुई चुभोकर कहा कि तुम्हारी एक नस काट दी गयी है। जल के गिरने की आवाज को उसने इतना स्वाभाविक समझा कि इतना भर कहे जाने पर कि तुम्हारा रक्त धीरे-धीरे निकल रहा है, वह भयाक्राँत होकर मौत को प्राप्त हो गया। एक व्यक्ति को एक जहरीले साँप ने काटा। जिसने देखा उसने कह दिया, जरा सी खरोंच भर आई है। बात टल गयी। बहुत दिनों बाद उसने भेद खोला कि उसे असली साँप ने काटा था। तुरन्त जहरीले साँप के काटे जाने की स्मृति उसे हो आई एवं भयभीत हो वह मर गया। जहर के चढ़ने का प्रश्न ही नहीं उठता था। मन्त्र-तन्त्रों में प्रायः प्रयोक्ता का आत्म विश्वास एवं दृढ़ मनोबल ही काम करता है। जिस पर मन्त्र चलाया जाता है उसका भी प्रयोक्ता पर विश्वास होना चाहिए तभी चमत्कारी परिणाम भी निकलने हैं।

भूत-प्रेत के प्रसंग प्रायः निर्मूल आशंका पर आधारित होते हैं। लेकिन कभी-कभी भूत-प्रेतों का वास्तविक अवतरण भी होता है। कभी-कभी कोई सहानुभूति रखने वाली आत्मा विशुद्ध सहायता की दृष्टि से किसी से संपर्क साधती है पर लोग भूत-प्रेत का नाम मात्र सुनकर इतने भयभीत हो जाते हैं कि हितैषी और हानिकारक तक का अन्तर नहीं समझ पाते। परोक्ष जगत के सम्बन्ध में संव्याप्त अज्ञान ही इस भूतोन्माद का कारण है। पिछड़े, अनगढ़, अनगढ़, सनकी लोगों की शारीरिक मानसिक अवस्था को सूक्ष्मधारी आत्माओं से अलग समझा जाना चाहिए व इस अज्ञान को मिटाया जाना चाहिए कि कोई देवी देवता या भूत-पलीत किसी के ऊपर आते हैं। मस्तिष्क पर छाया अज्ञान ही हिस्टीरिया के उन्माद रूप में निकलता है। किन्तु यदि उत्कृष्टता के मार्ग पर ले चलने वाली सहायक आत्माएँ परोक्ष जगत से आदान-प्रदान का क्रम स्थापित करना चाहेंगी तो सदैव श्रेष्ठ परामर्श के रूप में अविज्ञात सहयोग के रूप में वह प्रकट होगा, चाहे उसे अदृश्य होने के कारण देखा या समझा न जा सके एवं अविज्ञात या मात्र संयोग का नाम दे दिया जाय।

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