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Magazine - Year 1984 - Version 2

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परोक्ष जगत की विधि व्यवस्था एवं तथ्य भरे आधार

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सृष्टा की नियति व्यवस्था ने न केवल जीवन का सृजन किया है, वरन् उसका निर्वाह ठीक प्रकार होता रहे, इस निमित्त अन्न, वनस्पति, जलवायु आदि का भी प्रचुर भाण्डागार मानव समुदाय हेतु उपलब्ध किया है। जिन साधनों के आधार पर हम जीवित हैं और अनेकानेक गतिविधियों का संचालन करते हैं, वे अपने पुरुषार्थ से नहीं उगाए गये वरन् दैवी अनुग्रह से पाए गए हैं। पुरुषार्थ अपने स्थान पर सराहनीय है किन्तु यह नहीं भुला दिया जाना चाहिए कि जो उपलब्ध है उसमें परोक्ष से किसी अदृश्य सहायक का योगदान भी कम मात्रा में सम्मिलित नहीं है।

यह सामान्य जीवन व्यवस्था की बात हुई। इसके अतिरिक्त अनेकों बार ऐसी घटनाएँ भी दृष्टिगोचर होती हैं जिन्हें अदृश्य सत्ता की विशिष्ट सहायता कहा जा सकता है। बहुधा ऐसे प्रसंगों को संयोग कहकर टाल दिया जाता है पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि यह मात्र संयोग नहीं है। प्रकृति व्यवस्था में ऐसे संयोगों के लिए गुंजाइश नहीं है जो साधारण नियमों का व्यतिक्रम करके किसी विशेष व्यक्ति को- विशेष अवसर पर- विशेष प्रकार की- सहायता पहुँचा सकें।

शास्त्रों में विभिन्न लोकों का वर्णन मिलना है जिनमें जीवनमुक्त आत्माएँ विचरण करती रहती हैं एवं शरीरधारी पृथ्वी वासियों की मदद हेतु सतत् तत्पर रहती हैं। इन लोकों को भौतिकी के “डायमेन्शन” के आधार पर नहीं समझा जा सकता क्योंकि सूक्ष्म होने के कारण इनकी स्थिति चतुर्थ आयाम से भी परे होती है। किन्तु साधना पुरुषार्थ से अर्जित दिव्य दृष्टि सम्पन्न शरीरधारी साधक स्वयं को सूक्ष्म रूप में बदलकर अथवा स्थूल स्थिति में इन आयामों के रहस्यमय संसार का दिग्दर्शन कर सकते हैं। इस संसार में अपने कर्मों के अनुरूप सूक्ष्म आत्माएँ फल पाती हैं एवं उसी आधार पर एक निश्चित अवधि तक उन्हें उसमें रहना पड़ता है। यह एक सुनिश्चित तथ्य है।

शास्त्रों के अनुसार जन्म-मरण के चक्र में घूमता हुआ जीव स्वर्ग-नरक, प्रेत-पिशाच, पितर, कृमि-कीटक पशु एवं मनुष्य योनि प्राप्त करता है। इस दौरान उसे जो-जो गतियाँ प्राप्त होती हैं, शास्त्रों में उन्हें दो भागों में बांटा गया है- कृष्ण या शुक्ल गति। इन्हें घूमयान तथा देवयान भी कहा गया है। छान्दोग्योपनिषद् में इन गतियों ओर जीवात्मा की विभिन्न स्थितियों का विस्तार से वर्णन किया गया है। गीताकार ने भी कहा है-

त्रैविद्या माँ सोमपाः पूत पापा। यज्ञैरिष्टा स्वर्गति प्रार्थयन्ते॥

ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्र लोकमश्नन्ति। दिव्यान दिवि देवभोगान॥

ते तं भुक्तवा स्वर्ग लोकं विशालं। क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति॥

अर्थात्- “वैदिक कर्मकाण्ड कर सकाम यज्ञों के द्वारा यज्ञ भगवान की पूजा द्वारा यज्ञ शेष के सोमपान से निष्पाप बनकर श्रेष्ठ व्यक्ति स्वर्ग प्रयाण करते हैं एवं वहाँ विभिन्न प्रकार के देव भोगों को भोगते हैं। उस विशाल स्वर्गलोक में अनेकानेक भोगों को भोगने के उपरान्त जब पुण्य कर्म समाप्त हो जाता है तो जीव पुनः इसी मृत्युलोक में आते हैं।” यहाँ यज्ञ से तात्पर्य प्राणाग्नि के स्फुरण एवं व्यक्तित्व के उदात्तीकरण से है। भजन प्रक्रिया के कर्मकाण्ड अनिवार्य तो हैं, पर प्रधान नहीं।

अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार सूक्ष्म दृष्टि सम्पन्न व्यक्ति पृथ्वी पर बैठे-बैठे ही समस्त लोकों व उनमें निवास कर रही सूक्ष्म आत्माओं से संपर्क साधने में समर्थ होते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ सूक्ष्म सत्ताएँ अन्तरिक्षीय लोकों में ही नहीं प्रत्युत पृथ्वी पर भी निवास करती हैं। वे अपनी ओर से शरीर धारियों से संपर्क स्थापित करने का पूरा प्रयास करती हैं, परन्तु सूक्ष्म जगत से अनभिज्ञ मनुष्य समुदाय के भयभीत होने से वे संकोच करती हैं, जबकि दृष्टा साधक उनसे पूरा सहयोग लेते हुए स्वयं को नहीं अपितु जीवधारी समुदाय को परोक्ष के वैभव से लाभान्वित कराते हैं।

थियासाफी समुदाय का मरणोत्तर जीवन पर पूरा विश्वास है एवं उनके मतानुसार जीवात्मा का सतत् विकास होता रहता है। इस कार्य में सृष्टा की विधि−व्यवस्था में सहयोग देने हेतु महान सूक्ष्म शरीरधारी आत्माओं का एक संघ है जिसका केन्द्र हिमालय के हृदय उत्तराखण्ड में हैं। यहाँ दुर्गम क्षेत्रों में स्थूल शरीरधारी सामान्यतया नहीं पहुँच पाते किन्तु अपने श्रेष्ठ कर्मों के अनुसार सूक्ष्म जीवात्माएँ प्रवेश पाती रहती हैं। जब भी पृथ्वी पर कोई संकट आता है, श्रेष्ठ व्यक्तियों को सहयोग देने हेतु वे पृथ्वी पर आती हैं।

मुण्डकोपनिषद् में उल्लेख आता है-

“एह्येहीति तमाहुतयः सुवर्च्चसः सूर्य्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वदन्ति, प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्च्चयन्त्यः एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः॥”

अर्थात्- “यज्ञ कर्म के फल से जो दिव्यलोक के अधिकारी होते हैं, ऐसे पुण्यात्मा पुरुष के मृत्युकाल में ज्योतिष्मति आहुतियाँ “आवो-आवो” कहकर पुकारती है तथा सूर्य किरणों की सहायता से दिव्यलोक में ले जाती है। वहाँ मधुर वचनों से उनकी अभ्यर्थना अर्चना करती हैं। ऐसे पुण्यात्माओं की दिव्य लोकों में गति होती है।”

इस प्रकार शास्त्र वचनों में परोक्ष जगत एवं वहाँ रहने वाली अदृश्य सूक्ष्म आत्माओं के अस्तित्व के समर्थन में तो प्रतिपादन मिलते ही हैं, पृथ्वी पर बसने वाली श्रेष्ठ आत्माओं द्वारा उनसे संपर्क स्थापित कर आदान-प्रदान के क्रम का प्रसंग भी प्रकाश में आता है। वैज्ञानिकों के अनुसार सूक्ष्म शरीर धारियों में एक्टोप्लाज्म नामक एक सूक्ष्म द्रव्य विद्यमान होता है जो पदार्थ के चतुर्थ आयाम से ऊपर की स्थिति है। सम्भवतः जीवात्मा उसी का उपयोग कर भौतिक आकार ग्रहण करती हैं जैसा कि अनेकानेक उदाहरणों से सिद्ध होता है। इसे “परसोनीफिकेशन” नाम दिया गया है व परामनोवैज्ञानिक इस पर अनुसन्धान भी कर रहे हैं।

प्रसिद्ध भौतिकविद् मार्टिन गार्डनर ने लिखा है कि “इस संसार में नित्य हजारों व्यक्ति के साथ ऐसी छोटी बड़ी घटनाएँ नित्य घटती रहती हैं। इनमें से कुछ को संयोग मान भी लिया जाय तो भी कुछ ऐसी विलक्षण होती हैं कि उन्हें मात्र संयोग नहीं कहा जा सकता।”

प्रत्यक्षवाद को ही प्रमुख मानने वाले अन्य वैज्ञानिकों के परिहास की उपेक्षा कर कतिपय परामनोवैज्ञानिकों एवं भौतिकविदों ने ऐसी घटनाओं का संकलन कर विश्लेषण किया व पाया कि कोई अदृश्य शक्ति जिसकी अभी तक खोज नहीं हो पायी है, ऐसे प्रसंगों का कारण बनती है जिन्हें परोक्ष अनुदान-सहायता के रूप में देखा जाता है लेकिन संयोग या अपवाद करार दिया जाना है।

ब्रिटेन के भौतिकशास्त्री एवं सुप्रसिद्ध गणितज्ञ एड्रियन डॉब्स ने विभिन्न परीक्षणों के उपरान्त निष्कर्ष निकाला है कि “इस विश्व ब्रह्माण्ड में ऐसी सूक्ष्म सन्देशवाहक शक्ति धाराएं निरन्तर प्रवाहित होती रहती हैं जो मानवी ज्ञानेन्द्रियों से संपर्क स्थापित करती हैं। इन तरंगों की वेव-लेंग्थ लगभग एक समान होती है।” अपनी पुस्तक “द रूट्स आफ काइन्सीडेन्स” में डा. डॉब्स की इन खोजों पर टिप्पणी करते हुए आर्थर कोसलर ने लिखा है कि “इस माध्यम से ब्रह्माण्डव्यापी अदृश्य शक्तियाँ शरीरधारी मनुष्यों से संपर्क साधतीं, उन्हें पूर्वाभास करातीं एवं संकट के समय मनोबल बढ़ाने वाला उत्कृष्ट चिन्तन देती हैं। इन्हीं को अदृश्य सहायक की उपमा भी दी जा सकती है। सम्भवतः उच्चस्तरीय सहायक आत्माएँ सूक्ष्म जगत का प्रत्यक्ष जगत से संपर्क जोड़ने के लिए यही माध्यम अपनाती हों।”

ऐसे अनेकों उदाहरण मिलते हैं जिनमें व्यक्तियों को ऐसे अप्रत्याशित लाभ मिले जो कि प्रयत्न करने पर सम्भवतः न मिल पाते। इन्हें दैवी अनुग्रह, भाग्य, पूर्व पुण्य अथवा वैज्ञानिकों की भाषा में संयोग कहा जाय पर वे हैं ऐसे जिनकी मानवी प्रयत्न पुरुषार्थ से कहीं कोई संगति नहीं बैठती। वैसी आशा-अपेक्षा भी नहीं रखी जाती पर जब विचित्र संयोग सामने आता है तब वह उलझन उठना स्वाभाविक है कि प्रयत्न की परिणति वाला सिद्धान्त यहाँ क्यों उलट गया?

वास्तव में अदृश्य जगत अपने आप में परिपूर्ण रहस्य रोमाँच से भरी एक दुनिया है। वह उतनी ही विलक्षण है जितनी कि हमारी निहारिका, सौर-मण्डल एवं ब्रह्माण्ड का यह पूरा दृश्य परिकर है। मनुष्य की स्वयं की अपनी दुनिया एवं समाज व्यवस्था है। उसी तरह जलचरों, सूक्ष्मजीवी, परजीवी, कृमि-कीटकों, वायरस, बैक्टीरिया आदि का भी अपना एक विलक्षण जगत है। उनकी भी अपनी रीति-नीति है एवं मनुष्य की दुनिया से सर्वथा भिन्न आवश्यकताएँ एवं कठिनाइयाँ हैं। जो दृश्यमान नहीं हैं, ऐसा अदृश्य लोक मरणोत्तर जीवनावधि में रह रहे जीवधारियों का भी है जिसके प्रमाण, उदाहरण आए दिन मिलते रहते हैं। पितर एवं अदृश्य सहायक यहीं रहते हुए निर्धारित समय व्यतीत करते हैं एवं समय आने पर समान गुणधर्मी आत्माओं से अपना संपर्क जोड़ कर स्नेह-सौजन्य- सहयोग का सिलसिला चलाते हैं। पितरगण अपने श्रेष्ठ जीवन काल की ही तरह मरणोत्तर स्थिति में भी किसी के काम आने- सहायता पहुँचाने अथवा हितकारी परिस्थितियां बनाने में योगदान करना चाहते हैं। आत्मिकी का यह अध्याय रहस्यपूर्ण तो है ही अपने आप में शोध का विषय भी है।

इस अदृश्य लोक की चर्चा के साथ-साथ यह भी बताना प्रासंगिक होगा कि कोई भी शरीरधारी साधना पराक्रम द्वारा मात्र अपनी इच्छा शक्ति के बल पर सूक्ष्म लोकों के एक छोर से दूसरे छोर तक परिभ्रमण कर इन आत्माओं से संपर्क स्थापित कर सकता है। सूक्ष्म शरीर को क्रियाशील बनाने पर सामान्य काया में कोई अन्तर नहीं दिखाई पड़ता। वेश-भूषा एवं जीवनचर्या यथावत् बनाये रखते हुए भी वे अपने सूक्ष्म शरीर से विभिन्न लोकों में आवागमन का क्रम बनाये रख सकते हैं। सूक्ष्मीकरण साधना के माध्यम से यही प्रयोजन पूरा किया जाता है। संतों, महामानवों, ऋषियों का अस्तित्व सदियों तक उनके इसी स्वरूप के कारण बना रहता है जो होता है विचार तरंगों से बने सूक्ष्म शरीर के रूप में। समय-समय पर जो विकट समस्याएँ मानवी पुरुषार्थ से सुलझती दिखाई देती हैं अथवा अदृश्य अनुदान पृथ्वी वासियों को मिलते हैं उनके मूल में सृष्टा की यही विधि-व्यवस्था काम करती है। अनास्था इसे संयोग कहती हैं पर आस्थावानों को दैवी सत्ता की अनुकम्पा के प्रति कृतज्ञ होने एवं परोक्ष के प्रति अपना श्रद्धा-विश्वास बढ़ाने का तथ्य भरा आधार उपलब्ध होता है।

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