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Magazine - Year 1984 - Version 2

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प्राण ऊर्जा का वाष्पीकरण-सूक्ष्मीकरण

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भगवान को सृष्टि के आरम्भ में एक से अनेक बनना पड़ा था, तब इतना सृष्टि विस्तार सम्भव हो सका। विश्व में महान परिवर्तन करने वालों को भी अपने सहयोगियों की संख्या बढ़ाकर यही करना पड़ा है।

ऋषि कल्प व्यक्तियों को अपनी निज की क्षमता को ही कई खण्डों में विभाजित करके कई गुना करना पड़ता है। सभी जानते हैं कि चीरने, कूटने, तोड़ने, पीसने की प्रक्रिया द्वारा एक वस्तु के कई टुकड़े हो जाते हैं। आमतौर से इस कूट-पीस द्वारा प्रत्येक टुकड़ा कमजोर पड़ता जाता है, किन्तु अपवाद के रूप में कई बार अधिक सशक्त भी होता है। मिट्टी का ढेला एक होता है, पर यदि उसके अणु परमाणुओं को विखंडित करते चला जाय तो अन्ततः भयंकर ऊर्जा का विस्फोट होता है। छोटा कण बड़े टुकड़ों की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली होता है।

सभी जानते हैं कि पदार्थ की सूक्ष्म इकाई अणु है जो स्वतन्त्र अस्तित्व रखती है एवं उसमें पदार्थ के सभी गुण विद्यमान होते हैं। सभी अणुओं की सूक्ष्मता का स्पष्ट अनुमान अभी तक हो नहीं पाया है। अलग-अलग पदार्थों के अणु एक इंच के अरबवें भाग का हो सकता है तो किसी का इंच के दस लाखवें भाग के बराबर। यह तो पदार्थ की बात हुई। द्रव्य रूप में पोटेन्सी बढ़ने से इन सूक्ष्म अणुओं की संख्या व सामर्थ्य और बढ़ जाती है, इसका प्रतिपादन होम्योपैथी के विद्वानों ने किया है एवं प्रयोग परीक्षणों द्वारा उसे सिद्ध भी कर दिया है। द्रव्य से विरल एवं विराट रूप वाला स्वरूप गैस का है। हमारे चारों ओर स्थित अदृश्य हवा का जो जखीरा है, उसके एक घन इंच में लगभग पाँच हजार शंख अणु विद्यमान हैं।

पदार्थ जितना सूक्ष्म होता चला जाता है, इन अणुओं की संख्या भी बढ़ जाती है एवं ऊष्मा-ऊर्जा के कारण उसकी गति में अभिवृद्धि हो जाती है। गैस रूप में अणुओं की गति और तेज हो जाती है।

चूँकि अणुओं में परस्पर आकर्षक बल उन्हें बांधे रहकर अपने स्थान पर रोके रहता है, इसीलिये पदार्थ ठोस रूप में बना रहता है। ज्यों-ज्यों ऊष्मा से इन्हें विखण्डित करने का प्रयास किया जाता है, गति तीव्र हो जाती है एवं आकर्षण बल कम। ठोस-द्रव्य-गैस-प्लाज्मा क्रमशः ये अवस्थाएं इस प्रक्रिया के कारण जन्म लेती हैं एवं पदार्थ को अति सूक्ष्म बना देती हैं।

चेतना का स्वरूप इससे भिन्न है। लेकिन सूक्ष्मीकरण के प्रकरण में सूक्ष्मता के अनुपात में प्रखरता में अभिवृद्धि एवं सर्वव्यापकता का सिद्धान्त उस पर और भी समग्र रूप में लागू होता है। मानवी काया की सूक्ष्म संरचना को विकसित किया जा सकने पर वह उसे अत्यन्त सामर्थ्यवान बना देती है। मानव के अन्तराल में तीन शरीर, पाँच कोश एवं षट्चक्र इसी स्तर के हैं। इन्हें विकसित कर अन्तःसत्ता को विराट् बनाया जा सकता है। ये सभी एक ही शरीर के अंग अवयव होते हुए भी अपना अलग विशिष्ट अस्तित्व प्रदर्शित करने लगते हैं।

मानव की चार अवस्थाओं का वर्णन शास्त्रों में मिलता है। जागृतावस्था में सामान्य जीवन के क्रियाकलाप- इन्द्रिय व्यापार ही प्रमुख होते हैं। अधिकाँश व्यक्तियों के जीवन का बहुसंख्य भाग इसी में खप जाता है। दूसरी है- स्वप्नावस्था, जिसमें व्यक्ति का मन देखे हुए, स्मरण में संग्रही, सुने हुए अथवा पंच तन्मात्राओं सम्बन्धी सूक्ष्म क्रिया-कलापों में रमण करता है। कभी-कभी इन्द्रियातीत घटनाक्रम भी पूर्वाभास के रूप में इस अवस्था में विचरण करने लगते हैं। स्वप्नावस्था की कुछ बातें स्मरण रहती हैं, शेष विस्मृत हो जाती हैं।

सुषुप्ति वह तीसरी स्थिति है जिसमें बहिरंग जगत व अन्तः जगत दोनों ही से उसका संपर्क कट जाता है। बाह्य व अन्तःकरण दोनों ही सो जाते हैं। इन तीन से इतर एवं सर्वोच्च है- तुरीयावस्था, जिसे आत्म जागरण की स्थिति, आध्यात्मिक चेतना के उत्कर्ष की चरमावस्था माना जाता है। जीवात्मा के मानव से महामानव, ऋषि- देवमानव बनने के क्रम में जीवित अवस्था में जिस स्थिति की विकास पथ में अनुभूति होती है, इसमें यह स्थिति आती है। जितने भी महापुरुष इस पृथ्वी पर हुए हैं, उन्होंने योग साधना के उपक्रम से इस तुरीयावस्था को प्राप्त किया है एवं इस सूक्ष्मीकृत स्थिति में वे और भी विराट्, सर्वव्यापी होते चले गए हैं। विधाता की यह विधि व्यवस्था सृष्टि विकास के क्रम में सहज ही सबको उपलब्ध नहीं हो पाती, लेकिन जो इस स्थिति तक पहुँच पाते हैं, मानव कल्याण का एक महत्वपूर्ण पुरुषार्थ उनसे सम्पन्न होता है।

शास्त्रों में एक अमैथुनी सृष्टि का वर्णन आता है जो विकास की प्रारम्भावस्था में दृष्टिगोचर होती है। ऐसा वर्णन है कि जिन-व्यक्तियों ने पूर्व कल्पों में संयम साधना और योग-उपासना द्वारा अध्यात्म चेतना की सर्वोच्च स्थिति को प्राप्त कर लिया होता है, वे जन्मते हैं। ये दिव्यात्माएं ऋषि आत्माएं कहलाती हैं एवं आत्म सत्ता को ऊंचा उठाने वाले धर्म के मर्म का परिचय जन-साधारण को देती हैं। समय-समय पर परिस्थिति विशेषानुसार उनका प्राकट्य होता रहता है एवं उनके द्वारा प्रदत्त ज्ञान-सत्पथ के माध्यम से उस काल के सामान्य पुरुष, जिनका वर्णन प्रारम्भ में जागृतावस्था में समय व्यतीत करने वालों के नाम से किया गया, आत्मिक प्रगति के पथ पर बढ़ते एवं जीवनमुक्त होते जाते हैं। सृष्टि की कल्प- मन्वन्तर व्यवस्था कुछ ऐसी है कि हर समय ऐसी दिव्यात्माएं सूक्ष्म जगत में अपने क्रिया-कलापों में संलग्न रहती हैं। इसी कारण धर्म का- श्रेष्ठता का- आदर्श निष्ठा का सर्वथा लोप नहीं हो पाता।

उपनिषद्कारों ने कारण शरीर को, जिसे जागृत कर ऋषि कल्प आत्माएं कार्य करती हैं, परिभाषित करते हुए कहा है-

“अनिर्वांच्याऽनाद्यविद्यारूपा स्थूल सूक्ष्म शरीर कारण मात्रं स्वस्वरूपाज्ञानं यदस्ति तत् कारणशरीरम्।”

अर्थात्- “अवर्णनीय, अनादि, अविद्या स्वरूप, स्थूल एवं सूक्ष्म दोनों शरीरों का कारण मात्र अपने ही स्वरूप की अज्ञानमयी जो सत्ता है, उसे ही कारण शरीर कहते हैं। वस्तुतः यह जड़ कलेवर की काया में विद्यमान होते हुए भी सुषुप्ति की स्थिति में ही रहता है। इसकी जागृति का माध्यम है- सूक्ष्मीकरण।

आध्यात्मिक शरीर संरचना विज्ञान में सूक्ष्म शरीर सत्रह सूक्ष्म उपादानों से बना बताया गया है। पंचदशी में इसका वर्णन निम्नानुसार है -

“बुद्धि कर्मेन्द्रिय प्राण पन्चकैर्मनसाधिया। शरीरं सप्तदशभिः सूक्ष्मं तल्लिगमुच्यते॥

अर्थात्- “पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पंच प्राण, मन व बुद्धि इन सत्रह अवयवों से सूक्ष्म शरीर का निर्माण होता है।”

मानव शरीर में ऋषियों, देवताओं, अवतारों का निवास बताया गया है। विभिन्न स्थानों पर उनकी स्थापना है। दिव्य समुद्रों, दिव्य नदियों, दिव्य पर्वतों का निवास भी इस शरीर में है। यह साधारणतया मल-मूत्र की गठरी होते हुए भी उसकी सूक्ष्म सत्ता का पर्यवेक्षण करने पर लोक-लोकान्तरों की झलक झाँकी उनमें मिलती है। शरीर एक सर्वांगपूर्ण प्रयोगशाला है। इसमें वे सभी यन्त्र उपकरण फिट हैं, जो मनुष्य द्वारा अब तक बनाये जा चुके या भविष्य में जिनके बनने की सम्भावना है। ब्रह्मांड के एक पिण्ड में समग्र ब्रह्मांड सन्निहित है। इसका अर्थ यही हुआ कि विराट में जो विशेषताएं विद्यमान हैं, वे सभी छोटी आकृति बनाकर पिण्ड में भी निवास करती पायी जाती हैं। जो कुछ है प्रसुप्त स्थिति में है। इसे जागृत किया जा सके तो पिण्ड में से ही ब्रह्माण्ड प्रकट हो सकता है।

क्षुद्र को महान बनाने के लिए एक ही उपचार है- वाष्पीकरण। वायुभूत होकर कोई भी वस्तु बहुत फैल जाती है और दूर-दूर तक अपने प्रभाव अस्तित्व का परिचय देती है। जैसे एक मिर्च थोड़ी-सी जगह में ही रखी रहती है, पर यदि उसे आग में जलाया जाय तो वह वायुभूत होकर दूर-दूर तक फैलेगी और उस गंध से दूर-दूर तक के लोगों को खांसी उठेगी। यही सूक्ष्मीकरण हुआ। थोड़ा-सा तेल लेकर पानी की सतह पर डाल दिया जाय तो वह लहरों के साथ-साथ दूर-दूर तक फैल जायेगा।

आयुर्वेद में अधिक समय तक एक औषधि को लगातार घोंटते रहने पर उसमें विशेष सामर्थ्य के उत्पन्न होने का वर्णन है। होम्योपैथी में भी पोटेन्सी सिद्धान्त इसी आधार पर चलता है कि उस मूल द्रव्य को अधिकाधिक बारीक करके अधिक शक्तिशाली बनाया जाता है।

साधना में तपश्चर्या के अनेकानेक प्रयोग हैं। इससे शरीर की स्थिति तथा आदत परम्परा का विशेष रूप से ध्यान रखा जाता है। एक ही साधना हर किसी के लिए एक जैसा परिणाम उत्पन्न नहीं कर सकती। इससे उसकी वंश परम्परा- गुरु परम्परा तथा जन्म-जन्मान्तरों तक के संस्कारों का ध्यान रखते हुए निर्धारण करना होता है। ऐसे निर्धारणों में साधक की अपनी निजी बुद्धि ही सब कुछ नहीं होती। इसके लिए अधिक अनुभव और निष्णात मार्ग दर्शन की आवश्यकता पड़ती है। वह जिन्हें उपलब्ध हो सके वे सफल भी होते हैं।

हमारी सूक्ष्मीकरण साधना में क्या उपक्रम चल रहा है? क्या विधि व्यवस्था अपनाई जा रही है? यह पूछने की इसलिए आवश्यकता नहीं कि वह एक विशेष प्रयोग है और उसमें मार्गदर्शक का क्रमिक अनुशासन ही सब कुछ है। दूसरों का पूछना इसलिए व्यर्थ है कि इस विधि का अनुकरण किसी अन्य के लिए उपयोगी न पड़ेगा। उन्हें क्या करना है, किसलिए करना है, इन प्रश्नों के विस्तृत विवरण बताते हुए हमें अपने अनुभवी मार्गदर्शक के परामर्श पर चलना होगा।

मोटे तौर से सूक्ष्मीकरण साधना का एक ही स्वरूप है- वाष्पीकरण। इसमें अपनी ही प्राण ऊर्जा को इतना प्रचण्ड किया जाता है कि उससे अपने ही अन्तराल में सन्निहित पाँच कोश इतने गरम हो सकें कि एक स्वतंत्र इकाई के रूप में उनकी सत्ता विनिर्मित हो सके। पानी खौलता है तो उनमें अलग-अलग बबूले उठने लगते हैं। हर बबूला अपनी एक स्वतंत्र इकाई बनाता है और जब तक आवश्यकता रहती है अपना अस्तित्व बनाये रखकर दूसरों के साथ विलीन हो जाता है। कितना बड़ा बबूला किस कार्य के लिए, किस विधि से, कितनी शक्तिशाली बनाया या उठाया जाय यह निर्णय करना ऐसे प्रसंगों में साधक और उसके मार्गदर्शक का काम होता है। उसका सिद्धान्त जान लेना ही पर्याप्त है। विवरण की गहराई में जाना समीचीन न होगा।

सूक्ष्मीकरण की प्रक्रिया वस्तुतः जीवित अवस्था में साधक के सूक्ष्म एवं कारण शरीर की परिष्कृति एवं प्रगति का एक ऐसा राजमार्ग है, जिसे समय-समय पर उच्चस्तरीय आत्माओं ने अपनाया व अपनी मुक्ति हेतु नहीं, अन्यायों के हित साधन हेतु स्वयं को खपाया है।

यह प्रक्रिया ऋषि परम्परा की एक शाश्वत व्यवस्था है। मानव को मिली तीन शरीर रूपी विभूतियाँ ईश्वर प्रदत्त सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियाँ हैं जो विकृति- अनगढ़पन की स्थिति में जीव को दुर्गति की ओर ले जाती है। साधना समर में व्यष्टि और समष्टि के समन्वय एकात्म होने में दैनन्दिन जीवन के कषाय-कल्मष ही बाधक होते हैं। संस्कारों की संचित सम्पदा लेकर जन्मे देवपुरुषों को उनसे मुक्ति पाने हेतु अधिक संघर्ष नहीं करना पड़ता। वे स्वेच्छा से उस पथ पर चल पड़ते हैं। अदृश्य जगत उच्चस्तरीय आत्माएं धरित्री पर अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा करने के लिए उन्हें वाँछित आत्मबल देती हैं, सामयिक मार्गदर्शन देते हुए उनके प्रत्यक्ष क्रिया-कलापों में परिवर्तन करती रहती हैं। सामान्य बुद्धि सहज ही उन्हें समझ नहीं पाता, जबकि होना वह सब कुछ नियन्ता की विधि-व्यवस्था का एक अंग ही है।

सूक्ष्मीकरण- वाष्पीकरण की हमारी युग साधना से जन समुदाय को क्या कुछ मिलने वाला है, वर्तमान परिस्थितियों में कैसे परिवर्तन आने वाला है, यह असमंजस सहज ही किसी के मन में उठ सकता है। जो हमारे सहयोगी- सहभागी बने हैं, जिन्होंने हमसे साझेदारी की है एवं वह सब कुछ कर दिखाने को निष्ठापूर्वक संकल्पबद्ध हैं जो हमारे मार्गदर्शक ने हमारे माध्यम से कहलवाया, उन्हें यह बताना भी हमारा ही कर्तव्य है। हम उनके लिए क्या कुछ कर पाएंगे, उनका सहयोग भावी समय में कैसे वाँछित है, यह बताना भी अनिवार्य समझते हुए ये पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं।

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