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Magazine - Year 1984 - Version 2

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सुसंस्कारिता संवर्धन हेतु स्वावलम्बन प्रधान शिक्षण

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मानवों सत्ता दो हिस्सों में बँटी हुई है, एक काया, दूसरी चेतना। काया के लिए साधनों की आवश्यकता पड़ती है। साधनों में अन्न, वस्त्र, निवास जैसी वस्तुओं की गणना होती है। चेतना की आवश्यकता दो के साथ जुड़ी हुई है। एक अध्ययन-अध्यापन। दूसरा संपर्क वातावरण। व्यक्तित्व का विकास पूरी तरह चेतना के परिष्कार से सम्बन्धित है। उसका स्तर ऊँचा रहे तो अधिक सस्ते, हल्के और स्वल्प साधनों से काम चल जाता है। ऋषि-मुनियों की मनीषी-योगियों की जीवनचर्या पर दृष्टिपात करने से यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि औसत भारतीय स्तर का एवं ब्राह्मणोचित जीवन किस प्रकार मनस्वी लोगों के लिए सम्भव है।

इतने पर भी प्रश्न वहीं का वहीं है कि मनःशक्ति का स्तर केवल ऊँचा उठाने की व्यवस्था बनाते हुए भी शरीरगत आवश्यकताएँ बनी ही रहेंगी और वे जुटानी ही पड़ेंगी। इसके बिना किसी भी प्रकार गुजारा नहीं। ज्ञानविहीन व्यक्ति किसी प्रकार उल्टा-सीधा खाते हुए पशुओं की तरह भी जी सकता है पर ज्ञानवान के लिए अनशन रखकर जीवित रहना शक्य ही नहीं। विनोबा जैसे संत भी अनशन पर जीवित न रह सके।

प्रश्न सतयुग की वापसी का चल रहा है। देव मानवों की पुरातन परम्परा पुनर्जीवित करके धरती पर स्वर्ग के अवतरण का स्वप्न साकार करने के लिए शरीर रक्षा की आवश्यकता तो यथावत् रहेगी ही। आग को ईंधन दिये बिना चूल्हा कैसे जले? खेत की सिंचाई का प्रबन्ध किये बिना पौधों की हरियाली कैसे टिके? इस प्रकृति के जड़ नियमों के सामने ज्ञानी-अज्ञानी प्रायः सभी एक से हैं। गाय हो चाहे गधा घास तो सभी को चाहिए।

पिछले पृष्ठों पर गायत्री नगर बसने की ऐसी योजना का स्वरूप विकसित किया गया है। जिसमें परिजनों को सुसंस्कृत बनाने वाले वातावरण, प्रशिक्षण की पूरी-पूरी विधि-व्यवस्था बनाई गई है। शान्तिकुँज की व्यस्त दिन चर्या में संलग्न रहकर मनुष्य अपने गुण-कर्म-स्वभाव को निश्चित रूप से ऊँचा उठा सकता है। यहाँ की दिनचर्या ऐसी है जिसमें अवाँछनीयता की आदतें सीखने की कहीं गुँजाइश है ही नहीं। उठने से सोने तक का व्यस्त कार्यक्रम ऐसा है जिसमें साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा का पग-पग पर क्रियान्वयन करना पड़ता है। आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण के उभयपक्षीय क्रिया-कलाप उसमें पूरी तरह गुँथे हुए हैं। इसलिए यह खतरा है नहीं कि जो लोग गायत्री नगर में बसेंगे, वे कायिक दृष्टि से उत्कृष्टता-सम्पादन में पिछड़ जायेंगे।

प्रश्न आजीविका निर्वाह का है। सो भी इस जमाने का जबकि लम्बे समय तक ब्रह्मचारी रहने का प्रचलन चला गया। साथ ही वानप्रस्थ परम्परा भी तिरोहित हो गई, सोलह-अठारह वर्ष के लड़के भी बाप बनने लगे हैं और जब तक काया जीर्ण-शीर्ण होकर साठ तक की नहीं हो जाती, तब तक यह प्रजनन का सिलसिला जारी रहता है। कोई समय था जब इन वर्जनाओं पर पूरा ध्यान दिया जाता था। लक्ष्मण-राम जैसों ने भी दो से अधिक सन्ततियों को जन्म देने का साहस नहीं किया। आज कुत्तों, बिल्लियों और बकरियों की तरह लोग युवावस्था में ही अनेकानेक बच्चों के बाप बन जाते हैं। दुष्परिणाम भी उसके भुगतते हैं। परिवार और घर की दरिद्रता, अभिभावकों पर चिन्ता, बच्चों पर दुर्बलता और सारे समाज पर विपत्ति टूटती है। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि माँ-बाप का पूरा स्नेह-सान्निध्य पाये और साँस्कृतिक उत्कर्ष का पूरा प्रबन्ध किये बिना कोई भी बालक सुसंस्कारी नहीं बन सकता। जिसे संस्कार नहीं मिले वह माँ-बाप की कुबेर जैसी दौलत पा जाने पर भी दुर्दशा को ही प्राप्त होगा।

सतयुगी वातावरण में ढेरों व्यक्ति आजीवन ब्रह्मचारी, आजीवन वानप्रस्थ रहते थे। जो गृहस्थ बनते थे, वे विवाह के दिन ही दो बच्चों से अधिक को जन्म न देने की शपथ लेते थे। तब बड़े परिवारों में थोड़े बच्चे आर्थिक भार नहीं बनते थे। वे घर में खिलौना बनकर पूरे परिवार को अपनी उपस्थिति से सद्गुणी अध्यापन के लिए विवश करते थे। फिर उन दिनों कृषि, गो-पालन, शिल्प जैसे उद्योगों के माध्यम से छोटा परिवार भी दस का पेट पाल लेता था। आज तो परिस्थितियाँ उल्टी हो गयीं। आज सतयुग की वापसी का गंगावतरण सम्भव करने के लिए जो व्यक्ति इस प्रयोजन के लिए उत्साह प्रदर्शित करें उनके लिए नये सिरे से नई विचार पद्धति सोचनी पड़ेगी। ऐसे विकल्पों में एक यह हो सकता है कि पढ़ाई पूरी करने और वह आजीविका कमाने के बीच पाँच वर्ष का अन्तर रखा जाय और वह समय सतयुगी नव-निर्माण के लिए संकल्पित कर दिया जाय। दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि पैतृक व्यवसाय को सम्भालने योग्य जब बच्चा बड़ा हो जाय तब उसके जिम्मे गृह-व्यवसाय चलाने की जिम्मेदारी सुपुर्द की जाय। इस प्रकार गृहस्वामी वानप्रस्थ के लिए जल्दी निवृत्त हो सकता है। सभी छोटे बच्चों की जिम्मेदारी से निवृत्त होने की प्रतीक्षा किये बिना भी वह प्रायः आधा जीवन सतयुग की वापसी के लिए आवश्यक कार्यों में लगाना आरम्भ कर सकता है।

तीसरा विकल्प यह हो सकता है कि संचित पूँजी से लाभ उठाकर बैंक में इस शर्त पर जमा किया जाय कि बढ़ते खर्च के अनुसार उतने समय पर उतनी मात्रा में पैसा ब्याज या मूलधन मिलाकर मिलता रहे। जवान होने पर बच्चे अपने हाथों कमाने लगें। अभिभावकों की कमाई वयस्क लोग पहले भी नहीं खाया करते थे। उसे श्राद्ध कर्मों में लगा दिया करते थे। अब फिर उस सतयुगी प्रचलन को वापस लौटाया जाय।

चौथी प्राचीनकाल की बड़ी महत्वपूर्ण परम्परा थी दान-दक्षिणा की। यजमान और पुरोहितों की एक परिधि होती थी। यजमान उत्पादन का दसवाँ अंश पुरोहित के लिए निकालता था। इससे ब्राह्मण परिवारों और साधु सम्प्रदायों के अन्न-क्षेत्रों का गुजारा चलता था। सामान्य समय पर दी गयी राशि ‘दान’ कहलाती थी और विवाह, जन्मोत्सव, अंत्येष्टि, श्राद्ध, उपनयन आदि किसी विशेष पर्व पर दिया हुआ धन ‘दक्षिणा’। स्थिर यजमान और स्थिर पुरोहित इस प्रकार परस्पर एक-दूसरे का परिपोषण किया करते थे। ब्राह्मण अपने यजमानों की सर्वतोमुखी स्वास्थ्य, शिक्षा आदि का उत्तरदायित्व सम्भालते थे। गुजारे के लिए साधन दान-दक्षिणा में मिल जाता था। तीर्थयात्री, गुरुकुल के विद्यार्थी स्थिर नहीं रहते थे। उनके चलते-फिरते कार्यक्रम रहते थे। इसलिए वे एक रोटी भर भिक्षा माँग कर काम चला लेते थे।

परिस्थितियों को देखते हुए यह पांचों परम्पराएँ इन दिनों कठिन दिखती हैं। भिक्षा एक व्यवसाय बन गया है। कुपात्रों ने इस पर बुरी तरह कब्जा जमा लिया है। इसलिए दान-दक्षिणा माँगना और देना दोनों ही अवाँछनीय बन गए हैं।

गायत्री परिवार बढ़ाने की शान्ति-कुँज योजना में आरम्भ में 240 परिवार बसाने का संकल्प किया गया है। उन सबसे कहा गया है कि वे अपनी अब तक की संचित पूँजी बटोरकर अपने नाम से बैंक में जमाकर दें। उससे जो ब्याज आता है उससे खर्च चलता रहे। जो कमी पड़ेगी, उसकी पूर्ति शान्तिकुँज- गायत्रीनगर से की जाती रहेगी। जो बच्चे अपने पैरों खड़े नहीं हो पाये उनके लिए घर भेजते रहने का भी एक विकल्प है। दूसरा सर्वोत्तम विकल्प यह है कि बच्चे सहमत हों तो उन्हें भी साथ ले आया जाय।

शान्तिकुँज गायत्रीनगर में 240 परिवारों के रह सकने योग्य स्थान की व्यवस्था की गई है। उद्योग आदि भी इसी अनुपात में निर्धारित किये गये हैं। जिन्हें भविष्य में जो बनाना है, उसके निमित्त शिक्षा का समुचित प्रबन्ध भी है। बच्चों की शिक्षा में इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि उन्हें नौकरी तलाश करने के लिए ठोकरें न खानी पड़ें। ऐसा क्रम चलता रहे कि वे बड़े होने पर अपने माता-पिता, भाई-बहनों की सेवा सहायता करते हुए उसी प्रकार जीवन निर्वाह करें जिस प्रकार सतयुगी ग्रामीण जीवन में किया करते थे।

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