जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति और तुर्या
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जब तक मनुष्य जीवित रहता है, तब तक उसकी चार अवस्थाओं में से एक बनी रहती है। इन्हें जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति और तुर्या कहा गया है। इनका स्तर क्रमशः एक से एक बढ़कर है।
जागृति वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति सोचना बोलता करता, चलता, देखता सुनता रहता है संक्षेप में इसे क्रियाशील स्थिति कहना चाहिए। विद्वत्ता, बलिष्ठता, सम्पदा, ख्याति आदि कमाने का अवसर इसी स्थिति में मिलता है। मनुष्य चाहता है कि अधिक से अधिक इसी स्थिति में बना रहे। क्योंकि वैभव उपार्जन से लेकर वासना, तृष्णा, लोभ मोह को चरितार्थ करने का रसास्वादन इसी स्थिति में हो पाता है, जीवन का बड़ा भाग इसी स्थिति में साथ रह पाते हैं। सम्पदा का उपार्जन और संग्रह भी इसी स्थिति में हो पाता है। जीवन का बड़ा भाग इसी स्थिति में रहते हुए गुजरता है। इच्छा भी इसी स्थिति में रहने की होती है। रात्रि की संरचना भगवान ने सोने के लिए की है। पर उसका भी बड़ा भाग जागते हुए ही बिताया जाता है आधी रात तक विविध विधि मनोरंजन विनोद चलते रहते हैं। जब नींद का बहुत दबाव पड़ता है, विवशता जैसी स्थित आ जाती है, तभी सोया जाता है।
जागृति के अतिरिक्त दूसरी स्थिति है स्वप्न। स्वप्न नींद की स्थिति में ही देखे जाते हैं। जागृति के अनुभवों को सोता हुआ मनुष्य स्वप्न नींद की स्थिति में ही देखे जाते हैं। जागृति के अनुभवों को सोता हुआ मनुष्य स्वप्न रूप से देखता है। अपनी कामनाओं और आकाँक्षाओं की पूर्ति इसी स्थिति में होती है। कल्पनाएं साकार बन कर दृश्यमान दीखने लगती है। स्वप्नों में से अनेक तो मात्र हास परिहास जैसे ही होते हैं। जो शरीर से नहीं बन पड़ता, कल्पना पक्ष का वह भाग दृश्यमान प्रतीत होता है। यह गरीब, अमीर संपन्न-विपन्न सभी के लिए चित्र विचित्र स्वादों वाला मनोरंजन है। इस स्थिति को जागृति का पूरक ही कहना चाहिए। इसे भी मस्तिष्क परिधि की एक आवश्यकता पूर्ति कहा जा सकता है।
सामान्य लोगों के लिए स्वप्न एक प्रकार से नाटक सिनेमा अर्थात् रंगीनी चित्र विचित्र कल्पनाओं की झलक झाँकी कह सकते हैं। वैज्ञानिक इसे “रैम स्लीप” (रैपीड आई मूवमेन्ट स्लीप) की स्थिति में मानते हैं। किन्तु जिनका चेतना स्तर असामान्य है, उनके लिए इसे अतीन्द्रिय क्षमताओं की जागृति वाली स्थिति कह सकते हैं। मन, बुद्धि तो जागृति में काम करती है किन्तु चित्त और अहंता निद्रित अर्धनिद्रित स्थिति में ही क्रियाशील होती है। इस स्थिति में मन के संयम एवं चित्त वृत्तियों निरोध द्वारा योग साधना जैसी स्थिति उत्पन्न करके प्राप्त किया जाता है। ज्ञानेन्द्रियाँ एवं कर्मेन्द्रियाँ तो जागृति के साथ जुड़ी हुई है। किन्तु सूक्ष्म इन्द्रियाँ जो सूक्ष्म शरीर से संबंधित है, चित्त के साथ जुड़ती है। अचेतन मन उसी स्थित में काम करता है जब जागृति गहरी निद्रा में विलीन हो जाती है। इसे योग निद्रा भी कहा जा सकता है। योग निद्रा में दीखने वाले स्वप्न निरर्थक नहीं सार्थक होते हैं। उनमें दूरदर्शन, दूरश्रवण, भविष्य कथन, विचार संचालन, पूर्वाभास, पितर जैसी दिव्यात्माओं के साथ संपर्क आदि अनेक ऐसी बाते दीख या सूझ पड़ती है जिन्हें अतीन्द्रिय ज्ञान कहा जाता है।
सभी जानते हैं कि निद्रा थकान मिटाती है। तनाव और भारीपन दूर करती है। मस्तिष्क को विश्राम देकर उसके मेधा, प्रज्ञा क्षेत्रों को विकसित, परिष्कृत करती है। नींद के अभाव में उत्पन्न होने वाली बेचैनी का दूर करने के लिए नशीले पदार्थ सेवन किये जाते हैं। उनसे भी आधी अधूरी, खुमारी आती और आँशिक पूर्ति भर होती है। नींद न आने पर मनुष्य, पागल खूँखार हो सकता है। मर भी सकता है, इस तथ्य को सामान्य शरीर विज्ञानी भी जानते हैं।
सुषुप्ति- जागृति और निद्रा का सम्मिश्रण हैं। उसमें इतना और होता है कि दिव्य विशिष्टता का एक अंश और जुड़ जाय। इस स्थिति में जो भाव संवेदनाएँ उठती है। उनमें आदर्शों का गहरा समन्वय रहता है। लोक-मंगल, जन-कल्याण, पुण्य-परमार्थ, त्याग, वैराग्य जैसी धर्मधारणाओं की अंतः प्रेरणाएं उठती हैं मानवी गरिमा की जीवन्त करने वाले राजमार्ग को अपनाने की उमंगे उठती है। उसी उभार में मनुष्य ऐसा चिन्तन चरित्र और व्यवहार विकसित करता है जिसे महामानव स्तर का देवात्माओं जैसा कहा जा सकें।
सुषुप्ति स्थिति में ही ऐसे विचार उठते हैं जिन्हें दार्शनिक या वैज्ञानिक स्तर का कहा जा सकें। भौतिक विज्ञानियों या वैज्ञानिकों को इसी स्थिति में अभिनव आविष्कारों की सूझ सूझती है। कवि कल्पनाएँ एवं साहित्यिक निर्धारणाएँ उसी स्थिति में प्रकट होती है। प्रेरणाप्रद सत्संग इसी स्थिति में बन पड़ता है सामान्य मनोरंजक चर्चा तो कोई भी विद्वान या वाचाल घण्टों करता रह सकता है पर जिस कथन का सुनने वालों के अन्तराल पर गहरा असर पड़े, उसे सुषुप्ति से अभिप्रेत मनः स्थिति ही कहा जा सकता है। शास्त्रों का लेखन इसी आवेश में होता है।
तुर्या चतुर्थ एवं अन्तिम स्थिति है। उसमें जीवात्मा परमात्मा के आवेश से भर जाता है। ईंधन में अग्नि के प्रवेश करने पर साधारण लकड़ी में ज्वाला प्रकट एवं प्रदीप्त होती है। यों उसका आकार पूर्ववर्ती लकड़ी जैसा ही बना रहता है, पर उसके हर भाग से ज्वालमाल फूटती है। उसमें न तो लकड़ी जैसी पूर्ववर्ती कठोरता रहती है और न काला कलूटा स्वरूप ही दृष्टिगोचर होता है। इस स्थिति में पहुँचा हुआ व्यक्ति नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम, आत्मा से परमात्मा, भक्त से भगवान, क्षुद्र से महान स्तर में विकसित परिलक्षित होता है। वह अपने भीतर दिव्य चेतना का आविर्भाव हुआ देखता है। ज्ञान चक्षु खुलते हैं और इसी विश्व उद्यान में समाहित विराट् ब्रह्म के दर्शन होते हैं। ईश्वर साक्षात्कार की यही स्थिति है।
तुर्यावस्था में पहुँचे हुए व्यक्ति योगी, तपस्वी न रहकर देवात्मा, सिद्धपुरुष बनते हैं। उनकी वाणी में शाप वरदान की शक्ति होती है। अपने पुण्य प्रताप की अभीष्ट मात्रा किसी दूसरे सत्पात्र को हस्तान्तरित कर सकते हैं। शक्तिपात के नाम से इसी अनुदान को जाना जाता है। रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानन्द को अपनी संचित दिव्य क्षमता का हस्तान्तरण किया था। विश्वामित्र ने राम लक्ष्मण को अपनी यही दिव्य चेतना बला और अतिबला विद्या की साधना कराते हुए उपलब्ध कराई थी।
तुर्यावस्था एक प्रकार की समाधि अवस्था है। जड़ समाधि में शरीर के अवयव निश्चेष्ट हो जाते हैं और गति विधियाँ रुक जाती है। किन्तु इस जागृति समाधि में क्रियाशीलता तो सामान्यजनों जैसी रहती है। किन्तु अन्तरात्मा में परमात्मा भाव का प्रकटीकरण उभर कर ऊपर आता है। व्यक्ति शारीरिक क्रियाएं तो सामान्य जनों जैसी करता रहता है, पर उसकी अन्त चेतना सर्वत्र दिव्य हो जाती है। अपना आपा साँसारिक जीव धारियों जैसा नहीं वरन् देवात्माओं जैसा परिलक्षित होता है। जीवन सृष्टा की धरोहर प्रतीत होता है और सतर्कता यह कहती है कि हर क्षण का ईश्वर की इच्छानुरूप श्रेष्ठतम सदुपयोग बन पड़े।
यह इच्छा कल्पना ही नहीं रहती वरन् क्रिया रूप में भी परिणति होती रहती है। अंग अवयवों की संरचना में कोई अन्तर नहीं आता। शरीर यात्रा भी सामान्य जनों जैसी चलती रहती है पर आदर्श और उद्देश्य असाधारण रूप में ऊँचे रहते हैं। आकाँक्षा, विचारणा, भावना और चेष्टा ऐसी होती है जैसी जीवनमुक्त दिव्य पुरुषों की होनी चाहिए।
तुर्यावस्था की खुमारी ऐसी होती है जो एक बार चढ़ जाने पर उतरती नहीं। प्रलोभनों, आकर्षणों ओर दबावों का कोई ऐसा प्रभाव नहीं पड़ता जो नीचे गिरा सकें और पथ भ्रष्ट कर सके। हर साधक का इसी स्थिति को प्राप्त करना मुख्य लक्ष्य रहता है। बशर्ते कि वह मार्ग में न भटके।

