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Magazine - Year 1987 - Version 2

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दिव्य प्राण ऊर्जा के भाण्डागार षट्चक्र

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मानव शरीर शक्तियों का भण्डार है। उसमें जहाँ-तहाँ ऐसे विद्युत उत्पादन केन्द्र है जो चेतन ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। मनुष्य इन्हीं के सहारे महत्वपूर्ण कार्य कर सकने में समर्थ होता है। बहुचर्चित षट्चक्र ऐसे ही उत्पादक भाण्डागार है।

भारतीय योगियों ने स्पाइनल कालम -सुषुम्ना स्थित जिन षट्-चक्रों की खोज की है उनमें मूलाधार के ऊपर मेरुदण्ड के सहारे क्रमशः ऊपर उठते हुए छः चक्र है।यह ब्रह्मरंध्र से जुड़े हुए शक्ति-सामर्थ्यों के विशिष्ट पावर हाउस या माइक्रोवेव स्टेशन कहे जा सकते हैं। जननेन्द्रिय के मूल में मेरुदण्ड का जहाँ अन्त होता है, उस बीच जितना पोला स्थान है उसे साधनात्मक भाषा में ‘योनि कन्द’ कहते हैं। स्थूल शरीर शास्त्र-एनाटॉमी के अनुसार वहाँ सुषुम्ना नाडी गुच्छक भर है, पर सूक्ष्म शरीर रचना विज्ञान के अनुसार यहाँ एक विशेषज्ञ अवयव है जिसे मूलाधार चक्र करते हैं। इसके नीचे की पीठ कछुए जैसे है इसे कूर्म कहते हैं। इसके ऊपर एक छोटा मेरुदण्ड है उसे सुमेरु कहते हैं। इसके चारों ओर साढ़े तीन फेरे लगाये हुए एक शक्ति सूत्र विद्यमान है, जिसे ‘कुण्डलिनी’ कहते हैं। यही प्रथम मूलाधार चक्र है। कुण्डलिनी का मूल स्थान यही है प्राण ऊर्जा का यह भण्डार प्रसुप्त स्थिति में ठीक उसी तरह पड़ रहता है जिसे प्रकार अग्निकुण्ड में बुझी हुई आग ईंधन के अभाव में पड़ी तो रहती है पर वहाँ गरमी बनी रहती है। प्रयत्न करने पर इसकी लौ ऊपर उठती है तथा अन्य चक्रों को जागृत करने में सहायक होती है। इसकी प्राण ऊर्जा शरीर के समस्त अंगों को शक्ति प्रदान करती है।

मूलाधार से ऊपर पेडू की सीध में स्वाधिष्ठान चक्र स्थित होता है। नाभि की सीध में मणि पर, हृदय स्थित अनाहत, कण्ठ में विशुद्धि तथा भ्रूमध्य में आज्ञा चक्र है। ब्रह्म रंध्र में अवस्थित सहस्रार को गिना जाय तो इनकी संख्या सात हो जाती है। पर उसे सबका अधिपति मानकर गणना से बाहर रखा गया है। सुप्रसिद्ध परामनोवैज्ञानिक आर्थर ई॰ पावेल ने अपनी कृति ‘द एस्ट्रल बॉडी एण्ड एस्ट्रल फिनामेना ‘ में कहा है कि ये चक्र मानव शरीर में सूक्ष्म रूप से स्थित है और विपुल शक्तियों के भाण्डागार है। इन्हें ‘फोर्स सेंटर्स’ भी कहते हैं। स्नायु मण्डलों से घिरे हुए ये चक्र चार आयामी होते हैं। इनसे सतत् प्रस्फुटित होते रहने वाली ऊर्जा शारीरिक -मानसिक गतिविधियों का संचालन करती है।

योग विद्या के ज्ञाताओं ने सहस्रार कमल को सर्वप्रभुता सम्पन्न माना है। यह स्थान कनपटियों से दो-दो इंच अन्दर भृकुटि से लगभग ढाई तीन इंच अंदर छोटे से पोले में प्रकाश पुँज के रूप में है। तत्वदर्शियों के अनुसार यह उलटे छाते या कटोरे के समान सत्रह प्रधान प्रकाश तत्वों से बना होता है, देखने में मर्करी लाइट के समान दिखाई देता है। छान्दोग्य उपनिषद् में सहस्रार दर्शन की सिद्धि का वर्णित करते हुए कहा गया है। “तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारों भवति” अर्थात् सहस्रार प्राप्त कर लेने वाला सम्पूर्ण भौतिक विज्ञान की सिद्धि हस्तगत कर लेते हैं। यही वह शक्ति केन्द्र है जहाँ से मस्तिष्क शरीर का नियंत्रण करता है और विश्व में जो कुछ भी मानवकृत विलक्षण विज्ञान दिखाई देता है। उनका सम्पादन करता है।

सहस्रार क्या है? इसका उत्तर शरीर शास्त्र के अनुसार अब इतना मात्र जाना जा सका है कि मस्तिष्क के माध्यम से समस्त शरीर के संचालन के लिए जो विद्युत उन्मेष पैदा होते हैं, वे आहार से नहीं वरन् मस्तिष्क के एक विशेष संस्थान से उद्भूत होते हैं। वह मनुष्य का अपना उत्पादन नहीं वरन् दैवी अनुदान है। आमाशय, हृदय आदि तो उसी ऊर्जा से अपने काम कर सकने की क्षमता प्राप्त करते हैं। रक्त से शरीर के अवयवों को पोषण मिलता है, यह सत्य है। फेफड़े-साँस का और पाचन तन्त्र आहार का साधन जुटाते हैं, यह भी सही है, पर यह देखना फिर भी शेष रह जाता है कि यह सारी मशीन जो निर्वाह की आवश्यकता पूरी करने में जुटी हुई है वह अपने लिए मूल ऊर्जा कहाँ से पाती है? यह समाधान सही नहीं है कि आहार एवं साँस आदि से ही जीवन ऊर्जा मिलती है। यदि ऐसा रहा होता तो भूख या दम घुटने के बिना किसी मृत्यु न होती।

मस्तिष्क के मध्य भाग से यह विद्युत उन्मेष रह रह कर सतत् प्रस्फुटित होते रहते हैं। इससे एक विलक्षण विद्युतीय फव्वारा कहा जा सकता है। वहाँ से तनिक तनिक रुक-रुक कर एक फुलझड़ी-सी जलती रहती है। हृदय की धड़कन में भी ऐसे ही मध्यवर्ती विराम रहते हैं। ताप, ध्वनि आदि की प्रवाहमान तरंगों में भी उतार चढ़ाव होते हैं। मस्तिष्कीय मध्य बिंदु में अवस्थित ऊर्जा उद्गम की गतिविधि भी ठीक उसी प्रकार की है। वैज्ञानिक इन उन्मेषों को मस्तिष्क के विभिन्न केन्द्रों की सक्रियता स्फुरणा का मुख्य आधार मानते हैं। संत कबीर ने कहा है “ दिरदय बीच अनहत बाजे, मस्तक बीच फवारा।” यह फवारा ही “रेटिकुलर एक्टीवेंटिंग सिस्टम” या सहस्रार है।

सहस्रार कमल का पौराणिक वर्णन बहुत ही मनोरम एवं सारगर्भित है। कहा गया है कि क्षीरसागर में विष्णु भगवान सहस्र फन वाले शेषनाग पर शयन कर रहे हैं। उनके हाथ में शंख, चक्र, गदा, पद्म है। लक्ष्मी उनके पैर दबाती है। कुछ पार्षद उनके पास खड़े है। क्षीर सागर मस्तिष्क में भरा हुआ भूरा चिकना पदार्थ- ग्रे मैटर है। हजार फन वाला सर्प यह चपटा खुरदरा ब्रह्म रंध्र सेन्ट्रल कैनाल स्थित विशेष क्षेत्र है। मनुष्य शरीर में अवस्थित ब्रह्म- सत्ता का केन्द्र यही है। इसी से यहाँ विष्णु भगवान का निवास बताया गया है। यहाँ विष्णु सोते रहते हैं। अर्थात् सर्वसाधारण में होता तो ईश्वर का अंश समान रूप से है पर वह जागृत स्थिति में नहीं देखा जाता। आमतौर पर लोग हेय, पशु पक्षियों-प्रवृत्तियों जैसा निम्न स्तर का जीवन यापन करते हैं। उसे देखते हुए लगता है कि इनके भीतर या तो ईश्वर है ही नहीं अथवा यदि है तो वह प्रसुप्त स्थिति में पड़ा है। जिसका ईश्वर जागृत होगा, उसकी विचारणा, क्रिया-शीलता, आकाँक्षा एवं स्थिति उत्कृष्ट स्तर की दिखाई देगी। वह प्रबुद्ध और प्रकाशवान जीवन जी रहा होगा, अपने प्रकाश से स्वयं ही प्रकाशवान न हो रहा होगा, वरन् दूसरों को भी मार्गदर्शन कर सकने में समर्थ ही रहा होगा।

शरीर रचना की दृष्टि से इस स्थल पर केवल हड्डियों का जोड़ ही नहीं होता, उसी सीध में नीचे अन्य संगतियाँ भी बैठती है। कपाल की हड्डियों के नीचे मस्तिष्क को आच्छादित किये हुए एक सेरिब्रल कार्टेक्स होता है। इसमें खेत में हल चलाने से बने हुए चिह्न जैसे होते हैं, जो उसे विभिन्न भागों में विभक्त करते हैं, जिसे सल्कस कहते हैं। कार्टेक्स अर्थात् ब्राह्मक को लम्बाई में फिशर तथा चौड़ाई में बीच से विभाजित करने वाली को सेन्ट्रल सल्कस-केन्द्रीय सीता कहते हैं। इन दोनों जोड़ों को केन्द्र ठीक उसी स्थल पर होता है, जहाँ ब्रह्मरंध्र कहा गया है। इसी रंध्र की सीध में मस्तिष्क की सबसे रहस्यमय कही जाने वाली संरचना पीनियल ग्लैण्ड होती है।

यह ब्रह्मरंध्र काय स्थित सत्ता को महत चेतना से संबंधित करने का विशिष्ट मार्ग द्वार है। योगी अंत समय में इसी मार्ग से प्राण का निष्कासन करके ब्रह्मरंध्र मस्तिष्क के अनुभूतियों के आदान-प्रदान का कार्य करता है। सहस्रार चक्र और ब्रह्मरंध्र मिलकर एक संयुक्त इकाई के रूप में कार्य करते हैं। अतः योग साधना में भी इन्हें संयुक्त रूप से प्रभावित करने का विधान है।

चक्र संस्थानों को भँवर, चक्रवात की ही तरह एक उपमा झरना फटने की भी दी जा सकती है। ज्वालामुखी के छेद अक्सर अग्नि, धुआँ या दूसरी चीजें उगलते रहते हैं। चक्रों से भी उसी प्रकार का प्रकटीकरण होता रहता है। समुद्री लहरों से आज असीम विद्युत शक्ति उपलब्ध करने की तैयारियाँ हो रही हैं। चक्र संस्थानों से उफनती शक्ति का उपयोग कर सकना जिनके लिए संभव होता है वे उसका ऐसा लाभ उठा सकते हैं जिसे दैवी क्षमता अथवा सिद्धों की सामर्थ्य कह कर सम्बोधित किया जाता है।

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