प्रभु-प्राप्ति (Kavita)
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मुझे कोई नाच कर गाकर रिझाता है।
और कोई शंख, झालर भी बजाता है।
कई ऊँचे चढ़ मुझे आवाज हैं देते।
बन्द आंखें कर, मुझे कोई बुलाता है॥1॥
सोचता हूँ मैं, किधर जाऊँ, सुनू किसकी।
कौन है वह बात मानी जा सके जिसकी।
देखता है जा हृदय के द्वार पर जब मैं
तो वहाँ पर और ही कुछ नजर आता है॥2॥
कहीं पर भी मनुजता दिखती नहीं मुझको।
प्यार अपना दे सकूँ दिल खोलकर जिसको।
दिख न पाती है मुझे ऐसी जगह कोई।
जहाँ मेरा मन सहज आनन्द पाता है॥3॥
मानवी भाषा नहीं अब बोलता कोई।
स्नेह, समता रस नहीं घोलता कोई।
पास जिसके भी तनिक सा ठहर जाता है।
बस मुझे वह राग अपना ही सुनाता है॥4॥
बहुत हिन्दू, मुसलमान ईसाई मिल जाते।
भीड़ में लेकिन नहीं इंसान मिल पाते।
जहाँ भी इंसानियत का जिक्र करता हूँ।
हर बशर इंसानियत से मुकर जाता है॥5॥
धड़कता हूँ प्राणियों की धड़कनों में मैं।
दीन दुखियों के दिलों की सिसकनों में मैं।
राम और रहीम उनको हो मिला करते।,
प्राणियों से प्यार करता आता है॥6॥
*समाप्त*

