आस्तिकता मानव जीवन की आधार शिला
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
अनीश्वरवादियों का कथन है कि विज्ञान द्वारा ईश्वर सिद्ध नहीं होता तो हम उसे क्यों माने? विचारणीय बात यह है कि क्या हम केवल उन्हें बातों को मानते हैं जो प्रत्यक्ष या विज्ञान सम्मत है? जीवन के कितने ही आदर्श और तथ्य ऐसे है, जिनका सीधा सम्बन्ध अन्तरात्मा से है। नीति शास्त्र का आधार यही है। धर्म सदाचार, नीति, कर्त्तव्य परमार्थ आदि को विज्ञान की कसौटी पर यदि कसा जाय तो यह सभी कुछ व्यर्थ प्रतीत होगा और मनुष्य को पशु की तरह आचरण करना ठीक प्रतीत होगा।
आधुनिक विज्ञान द्वारा ईश्वर को सिद्ध या असिद्ध करने का प्रयास हास्यास्पद है। जिस विज्ञान कहा जाता है- वह वस्तुतः पदार्थ विज्ञान है। पदार्थों के बारे में खोज करना, पदार्थों से जीवनोपयोगी प्रयोजन सिद्ध करना इस भौतिक विज्ञान की मर्यादा है। इसके अतिरिक्त वह अधिक सूक्ष्म तत्वों तक पहुँच सकने में असमर्थ है।
नीति, शास्त्र, सदाचार, त्याग, बलिदान, परोपकार, संयम जैसे आवश्यक विषयों में विज्ञान की कोई पहुँच नहीं, यदि विषयों को वान के आधार पर हल किया जाय तो उन उपयोगी मान्यताओं को त्यागना पड़ेगा जो मानवीय सामाजिक जीवन के लिए मेरुदण्ड के समान आवश्यक है।
विज्ञान की दृष्टि में नर और मादा का यौन सम्बन्ध स्वाभाविक है। उसमें बहिन, पुत्री या माता का कोई विचार नहीं होता। जब सृष्टि के अन्य सभी जीव-जन्तु अपनी बहिन, पुत्री या माता के साथ यौन संबंध करने में कोई संकोच नहीं करते तो मनुष्य ही क्यों करें। इस प्रतिबन्ध का, इन मर्यादाओं का विज्ञान समर्थन नहीं करता, वरन् उन्हें व्यर्थ बताता है। यदि विज्ञान की कसौटी पर यौन सदाचार व्यर्थ सिद्ध होता है तो क्या हम उसकी व्यर्थता स्वीकार कर लेंगे और पशुओं की तरह बहिन, पुत्री एवं माता की मर्यादा को छोड़ देने के लिए उद्यत होगे?
विज्ञान के अनुसार जीव, जीव का भोजन है। प्रत्येक प्राणी के लिये अपना स्वार्थ ही प्रधान है। फिर त्याग, बलिदान, उदारता, दान सेवा और परोपकार का महत्व कहाँ रहेगा? जीवधारियों के गुण-धर्म के बारे में विज्ञान की कसौटी प्राणी की स्वाभाविक प्रवृत्ति ही है। सभी जीवों को अपनी क्षुधाओं और वासनाओं की पूर्ति के लिए जो भी अवसर मिलता है, उससे बिना उचित अनुचित का विचार किए लाभ उठाते हैं, फिर मनुष्य भी यदि वैसा ही करता है तो उसमें क्या अनुचित है? स्वार्थपरता एवं स्वच्छन्द भोगवाद का विरोध विज्ञान के द्वारा नहीं हो सकता, वरन् उसके आधार पर तो समर्थन ही करना पड़ेगा। ऐसी दशा में क्या हम विज्ञान को ही सब कुछ मानकर परमार्थ की प्रवृत्ति को मानकर जीवन से बहिष्कृत करने को तत्पर होगा? और यदि होगे तो क्या उसके फलस्वरूप किसी सत्परिणाम की आशा करेंगे?
विज्ञान बताता है कि मौत से हर प्राणी डरता है, बचता है, लड़ता है और भागता है। यह जीव का स्वाभाविक धर्म है। यदि मनुष्य को भी इस स्वाभाविक धर्म है। यदि मनुष्य को इस स्वाभाविक धर्म से बँधा हुआ मान लिया जाय तो फिर मृत्यु के लिए हँसते हुये तैयार रहने वाले सैनिकों एवं देश धर्म पर बलिदान होने वाले महामानवों को प्रकृति विरोधी एवं मूर्ख ही मानना पड़ेगा। फाँसी का हुक्म सुनने के बाद जिसके वजन जेल की कोठरियों में आठ आठ पौण्ड बढ़ गए, उन क्राँतिकारियों को मौत से डर न लगने का विज्ञान के पास क्या उत्तर है।
इस प्रकार ईश्वर आँखों से न दिखाई देना या वैज्ञानिक यंत्रों से उसका प्रमाणित न होना इतना बड़ा कारण नहीं कि जिसके आधार पर उस महान सत्ता के अस्तित्व से इनकार किया जा सके। इस संसार में सभी कुछ तो प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर नहीं होता। फोटोन्स, लक्सान्स आँखों से कब देखे जा सके है।
ईश्वर दिखाई नहीं देता इसलिये उसे न माना जाय यह कोई युक्ति नहीं है। अनेकों वस्तुएं ऐसी है जो आँख से नहीं दीखती फिर भी उन्हें अन्य आधारों से अनुभव करते हैं और मानते हैं। कोई वस्तु बहुत दूर होने से दिखाई नहीं पड़ती, पक्षी जब आकाश में बहुत ऊँचा उड़ जाता है तो दीखता नहीं। कोई वस्तु नेत्रों के बहुत समीप हो तो भी वह नहीं दीखती। अपने पलक या आँखों में लगा हुआ काजल अपने को कहाँ दीखता है? यदि नेत्र न हों, कोई व्यक्ति अन्धा हो तो भी उसे वस्तुएं नहीं दीखेगी, इसका अर्थ यह नहीं कि वे वस्तुएँ है ही नहीं। चित्त उद्विग्न हो, मन कही दूसरी जगह पड़ा हो, किसी समस्या के चिन्तन लगा हो तो आँख के आगे से कोई चीज गुजर जाने पर भी वह दिखाई नहीं देती। बहुत सूक्ष्म वस्तुएँ भी कहाँ दिखाई देती है? परमाणु या रोग के कीटाणु बिना सूक्ष्मदर्शी यंत्र के दीखते नहीं। किसी पर्दे की आड़ में रखी हुई, सन्दूक आदि में बंद की हुई, जमीन में गढ़ी हुई वस्तुओं को भी आंखें कहाँ देख पाती है? सूर्य के प्रकाश के कारण दिन में तारे नहीं दिखते। पानी में नमक घुल जाता है तो फिर नमक दीखता नहीं, फिर भी पानी में उसका अस्तित्व तो रहता ही है।
जो वस्तु दिखाई न दे, वह है ही नहीं, यह मान्यता किसी प्रकार भी उचित नहीं ठहराई जा सकती। केवल आंखें ही किसी वस्तु के अस्तित्व को प्रमाणित करने का एकमात्र साधन नहीं है।
ईश्वर के अस्तित्व से केवल इस कारण इनकार करना कि वह आज के अल्प विकसित विज्ञान या बुद्धिवाद की कसौटी पर खरा नहीं उतरता, कोई ठोस कारण नहीं है। प्रत्यक्ष के आधार पर तो यह भी प्रमाणित नहीं किया जा सकता कि हमारा पिता वस्तुतः कौन है? माता की साक्षी को ही इसके लिये पर्याप्त प्रमाण मान लिया जाता है। मानव जीवन की अनेकों महत्वपूर्ण अवस्थायें उस विज्ञान के आधार पर निर्भर है, जिसे अध्यात्म विज्ञान करते हैं। पदार्थ विज्ञान से नहीं अध्यात्म-विज्ञान से ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है।
ईश्वर का अवलम्बन करके ही मानव जाति की अब तक प्रगति सम्भव हुई है। प्रेम करुणा, उदारता, दान संयम, सदाचार, पुण्य, परमार्थ जैसे सद्गुणों का विकास आस्तिकता के आधार पर ही सम्भव हो सका है और इन्हीं गुणों के द्वारा सामाजिकता की प्रवृत्ति बढ़ी है। यदि इस महान आदर्श का परित्याग कर दिया जाय तो व्यक्ति का आँतरिक स्तर इस प्रकार का ही बनेगा जिससे द्वेष, घृणा संघर्ष और आतंक का मार्ग अपनाने के लिये मन मचलने लगे।
आदर्शवादिता का ही दूसरा नाम आस्तिकता है। जो आस्तिकता छोड़ चुका उसके लिये छल, असत्य आक्रमण, उत्पीड़न आदि नाम की भी कोई वस्तु नहीं रह जाती। आतंक की नीति ही उसके लिये सब कुछ है। नैतिक प्रवृत्तियों से रहित विचारधारा कितनी भयावह होती है, उसका अनुभव पग-पग पर होता रहता है। नास्तिकता का बाँध आस्तिकता की चट्टानों से ही बनता है। यदि यह बाँध तोड़ दिया गया तो फिर व्यक्ति या सरकारें अपनी-अपनी सनकें पूरे करने के लिए कुछ भी कर गुजरेगी और शाँतिप्रिय लोगों के लिये जीवन धारण कर सकना भी एक समस्या बन जायेगा।
आस्तिकता मानव जीवन की आधारशिला है। उसका परित्याग करना एक प्रकार से नैतिकता की व्यवस्था को ही चौपट कर डालने जैसी विपत्ति खड़ी करना होगा। मानव- जाति के भविष्य को खतरे में डालने वाली इस विभीषिका से हम जितनी जल्दी सावधान हो जावे, उतना ही उत्तम है। भोगवाद में लिप्त आज के वैभवशाली युग को इसकी संजीवनी की तरह आवश्यकता है, यह तथ्य इक्कीसवीं सदी में हर व्यक्ति को भली-भाँति हृदयंगम कर लेना चाहिए।

