अविज्ञात रहस्यों से भरी मानवी चेताना
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मानवी काया का बहिरंग अस्थि चर्म से विनिर्मित दिखता है, जिसके साथ जुड़ी हुई ज्ञानेन्द्रियाँ अपना-अपना कार्य करती रहती है और जिस-तिस प्रकार जीवन की गाड़ी आगे धकेलती रहती हैं। सामान्यजनों की जानकारी में यही है- स्थूल काया का स्वरूप और उसका उपयोग।
किन्तु सूक्ष्मदर्शी जानते हैं कि स्थूल की तुलना में सूक्ष्म की सत्ता, प्राण चेतना की क्षमा असीम, अपरिमित है। जितना कुछ मनुष्य को अपने शरीर एवं ज्ञानेन्द्रियों के बारे में ज्ञात है, उसकी तुलना में अविज्ञात बहुत अधिक है। यह समय-समय पर भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट होकर अपनी सामर्थ्य-क्षमता का परिचय देता रहता है।
मूर्धन्य परामनोविज्ञानवेत्ता डॉ. पाल गेल्डीन का कहना है कि ज्ञानेन्द्रियों के सुनने, बोलने, देखने, सूँघने तथा स्पर्शानुभूति की क्षमता से हम सभी परिचित हैं, पर इससे भी महत्वपूर्ण एवं अत्यंत सामर्थ्यवान एक और शक्ति है जिसके बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी है। इसे छठी इंद्रिय या पराचेतना शक्ति कहते हैं। प्रयत्नपूर्वक इसे जागृत एवं अभिवर्धित किया जा सकता है। किन्हीं-किन्हीं में यह संयोगवश भी प्रकट हो जाती है।
नवम्बर 1965 में जर्मनी के बवेरिया क्षेत्र के राषेनहेम स्थिति एक पदाधिकारी के मकान की ट्यूब लाइटों का प्रकाश एकाएक मंद पड़ गया। बिजली के सभी स्विच अपने आप आफ हो गये। कार्यालय के चारों टेलीफोन एक साथ घनघना उठे और उनके रिकार्ड में हजारों लोगों के बातचीत करने का लेखा बिल पर अंकित होने लगा। कारणों की छानबीन बहुत की गई, पर सुराग कुछ भी हाथ नहीं लगा। अंततः प्रो. हंस वेन्डर जैसे मूर्धन्य मनोवैज्ञानिक की सहायता ली गई। उन्होंने पता लगाया कि यह सब परिवर्तन 12 वर्षीय नौकर एनीमैरी की उपस्थिति में घटित होती हैं। उसकी प्राण विद्युतीय ऊर्जा असाधारण रूप से बढ़ी हुई हैं जो काया से निस्सृत होकर आस-पास के वातावरण को प्रभावित करती है। एनीमैरी की यह क्षमता अनायास ही फूट पड़ी थी जिसने उसे असाधारण सामर्थ्य वाला व्यक्ति बना दिया। वैज्ञानिकों ने परखने पर पाया कि उसकी उपस्थिति के कारण दीवाल पर टँगी तस्वीरें उलटी हो जाती हैं। बल्ब फ्यूज होने लगते हैं। मेजों की दराजें स्वयमेव खुल जाती है। फाइलों से खचाखच भरी लौह अलमारियाँ अपने स्थान से एक फुट दूर तक खिसक जाती हैं। घड़ी की सुइयाँ अपनी गति को तीव्र करके 20 मीटर में ही एक घण्टा पूरा कर लेती हैं। विद्युत सप्लाई काट देने पर भी विद्युतीय उपकरण 50 एंपीयर की करेंट को रिकार्ड करते देखा गया। टेलीविजन से जुड़े एक वीडियो रिकार्डर ने तत्कालीन वातावरण का जा चित्राँकन किया, उससे स्पष्ट भुतहा दृश्य दिखाई देने लगा। राशेनहेम में फोटो कैमरे में प्रयुक्त होने वाली बैटरी बिना पावर हाउस कनेक्शन के चला करती थी। इतना ही नहीं मैरी के चलने पर बिजली के बल्ब हिलने से लगते थे।
चैकोस्लोवाकिया के परामनोविज्ञान संस्थान के प्राध्यापक मेलिन रिज्ल एवं लेनिनग्राड विश्वविद्यालय के प्राध्यापक वासिलियेव ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि मनुष्य में इस तरह की अनेकानेक क्षमताओं का अस्तित्व होता है। किन्हीं-किन्हीं में यह अचानक विकसित हो जाती हैं और मनुष्य आँखों या कारे का काम शरीर के अन्य अंगों से लेने जैसे चमत्कृत करने वाले अनेकों करतब करने लगा है। विश्व में ऐसे अनेकों उदाहरण विद्यमान हैं।
सोवियत संघ में कुलेशोवा नामक एक महिला आँखें रहते हुए भी देखने का काम उँगलियों के पोरुओं से कर लेती थी। परखने पर वैज्ञानिकों ने पाया कि आँख पर पट्टी बाँधने के पश्चात् भी वह न केवल अक्षरों को सही रूप में पढ़ लेती वरन् उनके रंग, डाक टिकटों के अक्षर, मूल्य आदि ज्यों का त्यों बता देती थी। बाद में जाँच करने पर यह और ज्ञात हुआ कि इस प्रकार की विलक्षण शक्ति उसके बायें पैर की उंगलियों, जीभ और टखनों में बहुलता से विद्यमान थी।
इसी प्रकार सेन्ट्रल चीन के वुहन क्षेत्र में रहने वाली 23 वर्षीय लू विंग नामक एक किशोरी किसी भी लिखावट को कान से पढ़ सकती है। वैज्ञानिकों ने ‘इंग’, ‘इलेक्ट्रीसिटी’ जैसे कठिन शब्द कागज पर लिखकर उसे आठ बार मोड़ा और उनका पुलिन्दा बनाकर लू विंग के कान के पास छोड़ दिया। उसने इन शब्दों कर्ण नेत्रों से पढ़ कर स्पष्ट बता दिया। किसी भी कठिन शब्द को समझने में उसे सात से दस मिनट का समय लग जाता है।
चीनी पत्रकारों के एक दल ने अपने देश के कई प्रान्तों में ऐसे अद्भुत क्षमता सम्पन्न बीस बच्चों का अध्ययन किया हैं जो कान, नाक, हाथ, पैर, पेट या आँख द्वारा पढ़ लेते हैं।
दिव्य दृष्टि के अस्तित्व के सम्बंध में अनुसंधानरत मूर्धन्य वैज्ञानिक गेविन मैक्सवेल ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया हैं कि यह क्षमता सभी मनुष्यों में होती हैं। लगातार प्रयत्न और अभ्यास करने पर उसे जागृत एवं विकसित किया जा सकता है। अपवाद स्वरूप ऐसे व्यक्ति भी देखे जाते हैं जिनमें दूरदर्शन की सामर्थ्य सहज ही विकसित होती हैं। उदाहरण के लिए वेलरुयोयाँग नामक 12 वर्षीय चीनी बालक को लिया जा सकता है। इसमें विलक्षण दूरदर्शन क्षमता है। 1971 से वह वैज्ञानिकों के लिए चुनौती बना हुआ है। उसकी आंखें इतनी तीक्ष्ण हैं कि पत्थर की मोटी दीवार के दूसरी और देखने में भी सक्षम है। वैज्ञानिकों के एक दल ने जब इस तथ्य का परीक्षण करना चाहा तो उसने सात मंजिले एक मकान की छत पर चढ़कर सबसे नीचे वाली मंजिल में रखे हुए सभी वस्तुओं का यथावत् वर्णन कर दिया। वेल कानों से भी भली-भाँति देख लेता है। जब उसके कान में एक कागज पर कुछ लिखकर बाँध दिया गया तो उसने अपनी कर्ण दृष्टि से पढ़कर लिखे गए अंश को अक्षरशः सुना दिया। मनुष्य तो क्या अन्य प्राणियों के शरीर से निकलने वाले प्रभामंडल को भी वह अपनी सूक्ष्म दृष्टि से देख लेता है और उनके रंगों को बता देता है। भूगर्भ में बहने वाले जल स्रोतों का पता लगा लेना और उनके नक्शे बनाना उसके लिए सामान्य-सी बात हैं। किसी भी व्यक्ति के अंतर्मन के विचारों-भावनाओं को वह आसानी से पढ़ लेता है।
लेनिनग्राड के सुविख्यात परामनोविज्ञानी डॉ. वासिलियोव का कहना है कि यदि हम अपनी मूलशक्ति प्राण चेतना की खोज कर सके तो भौतिक शक्तियों की तुलना में अनन्तगुना सामर्थ्यवान बन सकते हैं। पिछले दिनों विश्व की विभिन्न संस्थाओं द्वारा किये जा रहे अनुसंधानों से जो तथ्य सामने आये हैं उनसे यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य यदि अपनी चेतना को ब्रह्मांडीय चेतना की सूक्ष्म धारा प्रवाह के साथ जोड़ सके तो वह ऐसे उच्चस्तरीय लाभ प्राप्त कर सकता है जो अभी तक काल्पनिक और अविश्वसनीय समझे जाते रहे हैं।
मनः शास्त्री विक्टर ई. क्रोमर मानवी प्राण ऊर्जा की चर्चा करते हुए कहते हैं कि यह ब्रह्मांडीय चेतना के साथ सम्बंध जोड़ने वाली ऐसी चाबी हैं जिसका सही उपयोग करने पर भौतिक जगत में भारी उथल-पुथल उत्पन्न की जा सकती है और अपनी निजी क्षमता में विशिष्ट स्तर की भारी मात्रा में अभिवृद्धि की जा सकती हैं।
मनुष्य अपनी प्राण चेतना को परिष्कृत एवं अभिवर्धित करके उसे स्थूल काया से अलग कर सकता है। परामनोविज्ञानी कर्नल टाइन सेंड ने प्राणायाम के अभ्यास से प्राणमय शरीर के नियंत्रण में सफलता प्राप्त की थी। एक बार उन्होंने सैकड़ों वैज्ञानिकों एवं साहित्यकारों से खचाखच भरे हाल में इस प्रकार का प्रदर्शन किया। वह ब्लैक बोर्ड के साथ एक चाक का टुकड़ा बाँध दिया गया। संड अपने स्थान पर बैठे-बैठे ही अपनी प्राण चेतना को स्थूल काया से बाहर निकाल कर अदृश्य सूक्ष्म शरीर से बोले गये अक्षरों को बोर्ड पर लिखने लगे। बीच-बीच में वे अपने स्थूल शरीर में भी आ जाते और वस्तुस्थिति भी लोगों को समझाते जाते।
यदि हम उपरोक्त घटनाक्रमों को पूर्वार्त्त मान्यताओं के परिप्रेक्ष्य में देखे तो पाते हैं कि योगविज्ञान में प्राण साधना द्वारा मिलने वाली अणिमा-शरीर को भार रहित कर लेना। गरिमा-भारी भरकम वजन बढ़ा लेना। लघिमा-छोटा हो जाना। प्राप्तव्य-कठिन वस्तुओं की सरलता से प्राप्ति। प्राकाम्य-इच्छापूर्ति। ईषत्व-सर्वज्ञता। वषित्व-सभी को वशवर्ती कर लेना इन आठ सिद्धियों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों ने जो अतींद्रिय क्षमताएं खोजी हैं, वे उन्हें चार वर्णों में विभक्त करते हैं- (1) क्लेअर वायेन्स - परोक्ष दर्शन, अर्थात् वस्तुओं या घटनाओं की वह जानकारी जो ज्ञान प्राप्ति के सामान्य आधारों के बिना ही उपलब्ध हो जाये। (2) प्रीकागनीशन-भविष्य ज्ञान-बिना किसी मान्य आधार के भविष्य की घटनाओं के ज्ञान। (3) रेट्रोकाग्नीशन-भूतकालिक ज्ञान-बिना किन्हीं मान्य साधनों के अविज्ञात भूतकालीन घटनाओं की प्रामाणिक जानकारी। (4) टेलीपैथी-विचार-सम्प्रेषण बिना किसी आधार या यंत्र के अपने विचार दूसरों के पास पहुँचाना तथा दूसरों के विचार ग्रहण करना। इस वर्गीकरण को और भी अधिक विस्तृत किया जाये तो उन्हें 11 प्रकार की गतिविधियों में बाँटा जा सकता है। चमत्कारी अनुभवों का यह वर्गीकरण इस प्रकार हैं- (1) बिना किन्हीं ज्ञातव्य साधनों के सुदूर स्थानों में घटित घटनाओं की जानकारी मिलना। (2) एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति की मनःस्थिति तथा परिस्थिति का ज्ञान होना। (3) भविष्य में घटित घटनाओं का बहुत समय पहले पूर्वाभास। (4) मृतात्माओं के क्रिया-कलाप जिससे उनके अस्तित्व का प्रत्यक्ष परिचय मिलता हो। (5) पुनर्जन्म की वह घटनाएँ जो किन्हीं बच्चों, किशोरों या व्यक्तियों द्वारा बिना सिखाये-समझाये बताई जाती हों और उनका उपलब्ध तथ्यों से मेल खाता हो। (6) किसी व्यक्ति द्वारा अनायास ही अपना ज्ञान तथा अनुभव इस प्रकार व्यक्त करना जो उसके अपने व्यक्तित्व और क्षमता से भिन्न व उच्च श्रेणी का हो। (7) शरीरों में अनायास ही उभरने वाली ऐसी शक्ति जो संपर्क में आने वालों को प्रभावित करती हो। (8) ऐसा प्रचण्ड मनोबल जो असाधारण दुस्साहस के कार्य विनोद की साधारण स्थिति में कर गुजरे और अपनी तत्परता से अद्भुत पराक्रम कर दिखाए। (9) अदृश्य आत्माओं के संपर्क से असाधारण सहयोग सहायता प्राप्त करना। (10) शाप और वरदान जिससे दीर्घकाल तक व्यक्तियों व वस्तुओं पर प्रभाव बना रहता है। (11) परकाया प्रवेश या एक आत्मा में अन्य आत्मा का सामयिक प्रवेश सिद्ध होता है।
इन समस्त सिद्धियों का आधार प्राण साधना हैं, जिसके आधार पर प्राणमय कोश या प्राणमय शरीर का विकास, नियंत्रण और उपयोग किया जाता है। यह तथ्य अब तक भले ही श्रद्धाभूत रहे हों किन्तु अब विज्ञान उन तथ्यों को स्वीकारने लगा हैं। प्राण चेतना एक ऐसी ऊर्जा है, जिसके पूरी तरह उद्घाटन किया जा सके तो मनुष्य उन दिव्य शक्तियों का चमत्कार जैसी लगती हैं। चूँकि सामान्य व्यक्ति भी इन क्षमताओं से युक्त पाये गये हैं। यह सम्भावना कपोल कल्पित नहीं लगती कि पुरुषार्थ द्वारा इन्हें अर्जित किया जा सके। विज्ञान के विकास की चरमावस्था में भी ऐसे घटनाक्रमों का कोई विज्ञान सम्मत प्रतिपादन न प्रस्तुत किया जाना क्या उसे बौना नहीं ठहराता?

