स्वर्ग की प्राप्ति और बंधन मुक्ति
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कहा जाता है कि देवता स्वर्ग में रहते हैं और यज्ञकर्त्ताओं को सीधे स्वर्ग ले जाते हैं। शास्त्रों में ऐसी अनेक कथाएं आती हैं, जिनमें यज्ञ का माहात्म्य बताया गया है। यज्ञ करने वाले नहुष आदि सशरीर स्वर्ग को गये थे। स्वर्ग किसी लोक विशेष को समझा जाता है, किन्तु खोज कर्त्तागण सौर मंडल के अंतर्गत कोई ग्रह-उपग्रह ऐसा नहीं खोज पाए हैं, जिसमें स्वर्ग जैसी परिस्थितियाँ हों। सौर मण्डल के बाहर ऐसे किसी ग्रह नक्षत्र की आशा नहीं हैं जिसमें स्वर्ग या जन्नत जैसा कुछ हो। तो क्या स्वर्ग जाना, यज्ञ का प्रतिफल इस रूप में मिलना कपोल कल्पित है? वस्तुतः स्वर्ग उच्चस्तरीय दृष्टिकोण का नाम है, जिसके उपलब्ध होने से यह समस्त विश्व का, भगवान का, विराट स्वरूप दिखाई देता है और उसके बीच रहते हुए प्रसन्नता का अनुभव सदा बना रहता है। परब्रह्म के लोक में रहना-इस स्वर्गदचि गरीयसी धरती माता पर जन्म लेना किसी श्रेष्ठ सुख सौभाग्य से कम नहीं है। फिर देव संस्कृति में आत्मा को परमात्मा का अंश माना गया है। इन परमात्मा के अंश को आकाशस्थ नक्षत्र मंडल की तरह या दिवाली के दीपकों की तरह जाज्वल्यमान, शोभायमान समझा जा सकता है।
हर मनुष्य में कुछ न कुछ सद्गुण पाये जाते हैं। उतने अंश पर ध्यान केन्द्रित किया जाये तो अपना लोक ही देवलोक जैसा आनन्ददायक प्रतीत हो सकता है। उद्यान में पुष्प भी रहते हैं और खाद कूड़े की गंदगी भी। भौंरे, तितली, मधुमक्खियाँ केवल पुष्प ही देख पाती हैं। किन्तु गुबरीले कीड़े को वहाँ भी खाद गोबर ही दिखाई पड़ता है। वह कथा प्रसिद्ध है कि जिसमें गुरु ने दुर्योधन और युधिष्ठिर को एक ही गाँव के लोगों का गुण दोष ढूँढ़कर लाने को भेजा था। युधिष्ठिर को सब सज्जन ही मिले और दुर्योधन को सभी में बुराइयाँ दिखाई पड़ी। यह अपने दृष्टि कोण का अंतर है। भूले भटके पापी दुरात्माओं को अपनी सेवा का माध्यम माना जा सकता है और उनके सराहे अपनी सेवा तथा सुधारवृत्ति को विकसित किया जा सकता है है। बुरों की तुलना में ही अच्छों की कद्र होती है। यदि सभी अच्छे होते तो सुधारने और संघर्ष करने का अवसर ही न मिलता। दुनिया नीरस और हलचल विहीन हो जाती, किन्तु ऐसा नहीं हुआ। दुनिया विविधता से भरी-पूरी है। यहाँ अच्छे बुरे सभी हैं, किन्तु बुरों का उसी प्रकार उपचार करना चाहिए, जिस प्रकार एक डॉक्टर रोग को मारता है और रोगी को बचा लेता है।
स्वर्ग की भाँति मुक्ति की भी चर्चा होती है। मुक्ति अर्थात् भवबंधनों से छूटना। भवबंधन क्या हैं? किसने मनुष्य को हथकड़ी बेड़ी से जकड़ा हैं? किसमें ईश्वर के अंश को बाँधने या विवश करने की सामर्थ्य है? वस्तुतः काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, जैसे दुर्गुण ही वे भवबंधन हैं जिनमें मनुष्य स्वयं बँधता है। नशे की तरह इनकी आदत डालता है, पर यदि वह चाहे तो उन्हें छोड़ भी सकता है। मकड़ी अपने लिए जाला स्वयं ही बुनती है और उसमें अज्ञान स्वयं बँध जाती है। जब उसे इस बात का ज्ञान होता है कि यह सारा प्रपंच मेरा ही बुना हुआ है और मुझ में वह सामर्थ्य है कि पहले की तरह फिर समेट कर पेट में निगललूँ। तो वह फिर से नया कदम उठाती है और जाले को समेटकर कर उदरस्थ कर लेती है। स्वच्छंद विचरती है। यही मुक्ति है। यदि हम अपने दोष-दुर्गुणों भ्रम-जंजालों को समेट लें और अपने का विश्व उद्यान का माली समझकर उसकी हरीतिमा तथा फल फूल सम्पदा को देखते चखते हुए आनन्द उठायें तो प्रतीत होगा कि यह धरती ऐसी गौरवमयी है कि उस पर जन्म लेने के लिए देवता तरसते हैं और भाग-भाग कर यहाँ जन्म लेने के लिए आते हैं। यज्ञीय जीवन की यह शिक्षा है यज्ञकर्ता उसके साथ जुड़े हुए उपरोक्त तत्त्व ज्ञान को अपनाएँ तो उन्हें हर घड़ी हर परिस्थिति में संतोष और उल्लास उपलब्ध हो सकता है, यह है स्वर्ग और मुक्ति जो मुक्ति जो मनुष्य के पूरी तरह अपने हाथ में है।

