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Magazine - Year 1987 - Version 2

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धर्मतंत्र-अपनी क्षमता प्रत्यक्ष कर दिखाये

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(गताँक से जारी)

राज तंत्र के उपरान्त जनजीवन में दूसरा स्थान धर्मतन्त्र का है राजतंत्र, सुरक्षा अर्थव्यवस्था, शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन, संचार आदि के सुविधा साधन जुटाता है। भौतिक क्षेत्र की सुव्यवस्था प्रजाजनों के लिए उपलब्ध कराता है। धर्मतंत्र अनगढ़ चेतना को परिष्कृत करता और सुसंस्कारित बनाता है। नीति, न्याय, संयम, सदाचार, आस्था, भावना जैसे अन्तः चेतना से सम्बन्धित क्षेत्रों में शालीनता, सज्जनता की स्थापना धर्म तंत्र ही करता है। मानवी गरिमा के अनुरूप चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को आदर्शवादिता के ढाँचे में ढालने की जिम्मेदारी उसकी की है। संयम बरतने और बचत को परमार्थ प्रयोजन में लगाने की शिक्षा, प्रेरणा उसी के तत्व दर्शन से उपलब्ध होती है। अन्तराल को परिष्कृत करना धर्म का काम है और भौतिक क्षेत्र की सुविधाएँ जुटाना, वैभव परक प्रगति का सरंजाम जुटाना राजतंत्र का। दोनों मिलकर ही एक दूसरे के पूरक बनते हैं। इस संयोग सुयोग से ही समग्रता बनती है। राजतंत्र को गतिशील, सुनियोजित रखने के लिए अनेकानेक प्रतिभाएँ विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत रहती है। टैक्सों के आधार पर जनता उसके लिए आवश्यक साधनों की व्यवस्था जुटाती है। धर्म तंत्र लोकश्रद्धा पर आधारित है। उसे धर्म सेवी, साधु-ब्राह्मण, परिव्राजक, दानशील मिल-जुल कर पोषण प्रदान करते हैं। दोनों का सुव्यवस्थित और सुसंचालित रहना आवश्यक है। गड़बड़ी इनमें से किसी भी क्षेत्र की सहन नहीं हो सकती।शासन अनीति अपनाये तो प्रजा को त्रास सहने पड़ेंगे, और अराजकता फैलेगी। धर्म धारणा में यदि गिरेगा। वे भ्रष्टाचार पर समावेश होगा तो व्यक्तित्वों का स्तर गिरेगा। वे भ्रष्टाचार पर उतरेंगे और मर्यादाओं, वर्जनाओं का उल्लंघन करते हुए मानवी गरिमा को पतन पराभव के गर्त में धकेलेंगे।

राजतंत्र को सम्भालने और उसमें प्रवेश पाने वाली अनुपयुक्तताओं को इंगित करने वाले राजनैतिक क्षेत्र में अनेक व्यक्ति रोकथाम करने और सुधारात्मक परामर्श देने के लिए तत्पर रहते हैं। इसलिये गड़बड़ियां एक सीमा तक ही चल पाती है संतुलन बनाये रहने के प्रयत्न चलते रहते हैं। फलतः बिगाड़ उस सीमा तक नहीं पहुँच पाता, जिसे गतिरोध कहा जा सके। किन्तु धर्मतंत्र को ऐसी सुविधा उपलब्ध नहीं है। धर्मध्वजी अपनी मनमर्जी चलाते रहते हैं। वे न सतयुगी मर्यादाओं का अवलोकन करते हैं न धर्म धुरीयों स्वार्थों के कुचक्र में फंसते हैं और जिस तिस प्रकार भावुक भक्तजनों को दिग्भ्रान्त करके अपना उल्लू सीधा करते हैं इस आधार को अपनाने पर धर्म क्षेत्र के मूर्धन्यों का उतना प्रभाव सर्वसाधारण के मन पर नहीं पड़ पाता कि उनके प्रतिपादनों प्रवचनों पर ध्यान दिया जा सके, उन्हें हृदयंगम किया जा कसे। दूसरी ओर साधारण धर्म प्रेमियों की भाव श्रद्धा धूमिल हो जाती है जिसके आधार पर उचित अनुचित का अन्तर कर सकना सम्भव हो सके। धूर्त्तता और मूर्खता का तालमेल सध जाने पर ऐसा कुछ चल पड़ता है जिसे धार्मिक क्षेत्र की विडम्बना ही कहा जा सकता है धर्म धारण नहीं। यही है वह दुर्भाग्य जो राजतंत्र की विकृतियों से भी अधिक मात्रा में धर्मतंत्र में घुस पड़ा है। उसी ने बिखराव उत्पन्न किया है। उसी कारण छोटे छोटे वर्ग समुदायों, मतान्तरों सम्प्रदायों से इस सशक्त क्षेत्र का विकेन्द्रीकरण हुआ है। इसका दुष्परिणाम सर्वसाधारण को भुगतना पड़ा है। सच्ची धर्मधारणा का अमृत दुर्लभ हो जाने से उसे अपनी प्यास ऐसे गंदे पानी से बुझानी पड़ रही है। जो समग्र आन्तरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से हितकर नहीं है।

लोगों को चित्र-विचित्र मान्यताओं और परम्पराओं के प्रति आग्रही देखा जाता है, पर यह सोचते नहीं बन पड़ता कि धर्म के मूलभूत प्रयोजनों को समझा और अपनाया जाय निजी जीवन में पवित्रता, प्रामाणिकता और प्रखरता के रूप में धर्म का परिचय मिलना चाहिए। सामूहिक जीवन में उसकी प्रतिक्रिया, सहकारिता, सामाजिकता, उदार, परमार्थ परायणता के रूप में सामने आनी चाहिए। इसी दिशाधारा में लोकचिंतन बह रहा है। आदर्शवादी क्रियाकलापों में उसकी प्रतिक्रिया जनजीवन में परिलक्षित हो रही हो तो समझना चाहिए कि धर्मतंत्र की विधा और प्रक्रिया अपने सही रूप में बनी हुई है। इस कसौटी पर धर्म क्षेत्र का काया कल्प किये जाने जैसी है।

सुधार उपक्रम विलगाव का केन्द्रीकरण होने की दिशा में होना चाहिए। निहित स्वार्थ के छोटे समुदाय को चंगुल में कसने की सुविधा में व्यवधान पड़ता दीख सकता है। वे विरोध पर उतारू होते और आड़े आते दीख पड़ सकते हैं। पर समग्र धर्म क्षेत्र की प्रतिष्ठा और गरिमा को ध्यान में रखते हुए संगठित होने के प्रयत्न जारी रहने चाहिए। बिखराव में नष्ट होती रहने वाली शक्ति एक लक्ष्य और एक केन्द्र पर समवेत हो सके तो इसमें सब का सब प्रकार से कल्याण ही है। धर्मतंत्र अपनी उपयोगिता बनाये रह सकेगा और कन्धों पर ली हुई जिम्मेदारी पूरी हो सकेगी। धर्म प्रेमी लोगों का सर्व साधारण की इस नीति को अपनाने से कल्याण ही होगा। उन्हें भ्रान्तियों में भटकते तथा स्वार्थों का शिकार बनते रहने से छुटकारा मिलेगा।

सार्वभौम धर्म न बन सके, मानव धर्म की एक रस व्यवस्था न बन पड़े तो कम से कम इतना तो होना ही चाहिए कि एक प्रकृति के समुदाय एक केन्द्र पर एकत्रित हो। इस दृष्टि से हिन्दू धर्म का एक संगठित तंत्र तो बन ही सकता है। उसके ऐसे नियम प्रचलन तो बन ही सकते हैं जिन्हें उस समुदाय के लोग बिना मतभेद के सरलता पूर्वक स्वीकार कर सके। सभी धर्मों के सूत्र संचालक यदि इस प्रकार का प्रयत्न सच्चे मन से करे, विलगाव वादी मतभेदों को उठाकर एक कोने में रखे तो एक निष्ठा को विकसित होने में फिर कोई अड़चन शेष नहीं रह जाती।

रुचि के अनुकूल पूजा उपासना में, तत्व दर्शन में विभिन्नताओं को अपनाये रहने की भी छूट मिल सकती है। पर चरित्रनिष्ठा और समाज निष्ठा के परमार्थ वादी सिद्धांतों में तो एकरूपता रह सकती हैं प्रथा प्रचलनों को भी यथासम्भव एकता और समता के ढांचे में ढाला जा सकता है। भिन्नताएँ जितनी कम हो, उतना ही अच्छा।

धार्मिक तत्व ज्ञान के उच्चस्तरीय स्वरूप का अध्ययन करने के लिए ऐसे शोध संस्थानों को सुविधा होनी चाहिए जो भिन्नताओं के बीच पाई जाने वाली एकता को खोजकर उसे उजागर कर सके। सर्वसाधारण के लिए प्रस्तुत कर सके।

धर्म प्रचार के लिए प्रामाणिक प्रवक्ता तैयार किये जायं, जो इस विषय पर अधिकारपूर्ण लिख सके और प्रचार प्रवचन के क्षेत्र में उतर सके। स्थान स्थान पर ऐसे केन्द्र स्थापित कर सके तो अपने क्षेत्र में धर्म धारणा को जीवन्त एवं गतिशील बनाये रहने की जिम्मेदारी सँभाले। हर गाँव में एक प्रामाणिक धर्म केन्द्र होना चाहिए जो विचार देने के साथ साथ ऐसे सेवा कार्यों की भी व्यवस्था बनाये रहे जो जन साधारण की सहानुभूति आकर्षित करती हो। सभी ईसाई चर्चों में शिक्षा, चिकित्सा, पीड़ितों की सामयिक सहायता की व्यवस्था रहती है। अपने धर्म केन्द्रों में भी ऐसा कुछ रहना चाहिए। मात्र कथा प्रवचनों, सत्संगों कर्मकाण्डों तक ही सीमित न रहा जाये।

लोक मंगल के लिए धर्म धारणा को किन-किन क्षेत्रों में किस किस प्रकार प्रयुक्त किया जा सकता है। इसके लिए प्रान्तीय भाषाओं के क्षेत्रों में अलग अलग विश्व विद्यालयों की स्थापना हो सकती है। भाषायी कठिनाइयों के करण एक क्षेत्र दूसरे क्षेत्र के लोगों तक अपनी बात नहीं पहुँचा पाते। इस कठिनाई को दूर करने के लिए भाषायी क्षेत्रों के धर्म प्रशिक्षण विद्यापीठ अपनी कार्य विधि अपनी भाषाओं में भी सिखा सकती है। पर सभी की नीति एक हो। केन्द्रीय तंत्र से ही सभी को मार्ग दर्शन मिले। सभी एक शैली को अपनाएं।

दूसरा विकल्प यह भी हो सकता है कि एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय में विभिन्न भाषाओं के माध्यम से एक ही स्थान पर एक ही शैली में भाषायी माध्यम अपनाते हुए शिक्षा व्यवस्था चलती रहे। इस प्रकार एक ही स्थान से विभिन्न भाषायी क्षेत्रों में काम करने वाले कार्यकर्ता उपलब्ध होते रहेंगे। धर्म तंत्र की प्रभाव क्षमता, व्यापकता, सम्पन्नता को देखते हुए उसे अनेकानेक लोकोपयोगी कार्यों का दायित्व सौंपा जा सकता है। उसे छोटी परिधि में सीमित नहीं रखा जा सकता। अभ्यर्थना, कथावार्ता एवं कर्मकाण्डों परम्पराओं का निर्वाह भर होता रहे, यह उचित न होगा। सामयिक आवश्यकताओं के अनुरूप जनकल्याण के कार्यों में उसकी क्षमता को नियोजित किया जा सकता है, किया जाना चाहिएं। शिक्षा सम्वर्धन स्वावलम्बन सत्प्रवृत्ति संवर्धन दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन जैसे क्रियाकलापों के अनेक स्वरूप हो सकते हैं और वे धर्मतंत्र के माध्यम से सुविस्तृत क्षेत्र में क्रियान्वित हो सकेंगे।

अपने देश में सात लाख गाँव है। साठ लाख सन्त। हर गाँव पीछे उनका औसत साठे आठ आता है जब जनता उनके निर्वाह का भार उठाती है तो उसे यह अधिकार है कि उनसे कुछ सेवा सहायता की आशा भी करे।

धर्म सेवी समुदाय यदि चाहे ते अशिक्षा की समस्या का सहज समाधान निकल सकता है। इतने सन्त अध्यापक यदि चाहे तो अपने अपने कार्य क्षेत्र बनाकर उसमें निरक्षरता उन्मूलन के लिए इतना अधिक काम कर सकते हैं। कि कुछ ही समय में देश के माथे से निरक्षरता का कलंक मिट जाए। शेखावटी के स्वामी केशवानन्द ने यही कार्य अपने हाथ में लिया था और गाँव गाँव प्राथमिक शालाएं स्थापित करके उन्हें हाईस्कूल कालेज तक पहुँचा दिया था। यह कार्य कोई भी धर्म क्षेत्र का व्यक्ति बड़ी सरलता से पूर्वक हाथ में ले सकता है और से सरलतापूर्वक पूरा भी कर सकता है।

गली कूंचों में सड़ती रहने वाली गंदगी न केवल कुरुचि दुर्गन्ध बखेरती है वरन् बीमारियाँ उत्पन्न करके अनेकों के लिए प्राण संकट भी खड़ा करती है। सरकारी श्रमदान के बलबूते कोई भी सेवा भावी संगठन अग्रगमन का मार्गदर्शक बनते हुए बिना सफाई कर्मचारियों के ढूंढ़े अपने बलबूते उस प्रयोजन को पूरा कर सकता है। श्रमदान संगठन के माध्यम से अनेकों उपयोगी कार्य स्थानीय आवश्यकता के अनुरूप सहज ही पूरे किये जा सकते हैं।

चरित्र निष्ठा, समाज निष्ठा, जीवन कला, पारिवारिक सुसंगठन जैसे विषयों की जानकारी लोगों को नगण्य जितनी है उसे सुविस्तृत करने पर व्यक्तित्व के विकास का मार्ग खुलता है। यह बड़ी उपलब्धि है, जिसे राष्ट्रीय विकास की आधारशिला समझा जा सकता है कुरीतियों का उन्मूलन भी इतना ही महत्वपूर्ण कार्य है नशा, दहेज छूतछात पर्दा आदि कितने ही प्रचलन ऐसे है जो विकास के मार्ग से सबसे बड़े अवरोध है इसके विरुद्ध उन्मूलन अभियान चलाने में धर्मतंत्र के अधिष्ठाता, पुरोहितों धर्मोपदेशकों को जितनी सफलता मिल सकती है उतनी और किसी को नहीं। राजतंत्र अपनी उपयोगिता और समर्थता का परिचय दे। किन्तु धर्मतंत्र को भी उपेक्षित एवं निष्क्रिय नहीं रहना चाहिए। बिखराव को समेट कर एक केन्द्रीय अनुशासन में योजनाबद्ध रूप में इस प्रकार जुटना चाहिए, जिससे धर्म तंत्र की गरिमा प्राचीन काल की तरह प्रतिष्ठा के उच्च शिखर तक जा पहुँचे।

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