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Books - अमृत वचन जीवन के सिद्ध सूत्र

Media: TEXT
Language: HINDI
TEXT


देवता बनिये, स्वर्ग में रहिये

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          उस आदमी का नाम देवता है, जो अपनी सुविधाएँ और अपनी सम्पदाओं को मिल- बाँटकर खाता है। देवता अकेले नहीं खाते। मिल- बाँट के खाते हैं और आपके पास कोई चीज है तो आप मिल- बाँट के खाइये। ज्ञान आपके पास है, तो उसका फायदा औरों को मिलने दीजिए। आपके पास पैसा है, तो मिल- बाँट के खाइये। हरेक को फायदा उठाने दीजिए। अपनी सम्पदा को बाँट के खाइये और दूसरों की मुसीबतों को बँटा लीजिए। देवता यही काम करते हैं। देवता देखे हैं न आपने। देवता के अंदर यही गुण होता है। देवता को पुकारते हैं। हे भगवान् जी, हमारी सहायता कीजिए। गणेश जी, हमको बुद्धि दीजिए। लक्ष्मी जी, हमको पैसा दीजिए। ये उनका स्वभाव है। क्या स्वभाव है? देते रहते हैं। देते रहते हैं, क्या मतलब। देते रहने का मतलब है, अगर उनके पास कोई चीज है तो लोगों को बाँटते रहते हैं और लोगों की मुसीबतों में हिस्सा बँटाते रहते हैं। हम को बुखार आ गया है, हम बीमार हैं, हे हनुमान् जी! हमारे बुखार को दूर कर दीजिए। करते हैं कि नहीं करते, यह बात अलग है; पर आपकी मान्यता तो यही है न, आपके दुःखों में हिस्सा बँटायेंगे। आपकी मुसीबत को दूर करेंगे। आपकी कठिनाइयों को ठीक कर देंगे और उनके पास कोई ज्ञान है, विद्या है तो वो आपको देंगे। देवता इन्हीं दो वजह से देवता हैं। आपकी मुसीबतों में हिस्सा बँटाते हैं- एक ओर अगर उनके पास कोई वैभव है तो आसानी से बाँट देते हैं। बस, मिल- बाँट के खाने का मजा देखा  है आपने। इक्कड़- इक्कड़ जो अकेला ही खाता रहता है, वो पाप खाता रहता है। जो अकेले ही संचय करता रहता है, वो आदमी पाप संचय करता रहता है। जो अकेले की खुशी चाहता है, वो आदमी पाप संचय करता रहता है। इसीलिये हमारे यहाँ एक संयुक्त कुटुम्ब की प्रणाली है। सब मिल- बाँट कर खायेंगे, मिल- जुल कर रहेंगे, हिल- मिल के खायेंगे। 
          कमाने वाला अकेला थोड़े ही खाता है, सब मिल- बाँट के खा लेते हैं। कोई बच्चा है, कोई बीमार है, कोई बूढ़ा है। बस, ये जो पारिवारिक वृत्ति है, इसमें वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता जुड़ी हुई है। वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता क्या है- आत्मवत् सर्वभूतेषु। आत्मवत् सर्वभूतेषु क्या है? एक ही है, आप दूसरों की मुसीबतों में हिस्सेदार हो जाइये- एक ओर अपनी सुविधाओं को बाँट दीजिए। हो गया आत्मवत् सर्वभूतेषु और हो गया वसुधैव कुटुम्बकम्। 
          ये सारे सिद्धांतों का निर्वाह इसी तरीके से होता है। इसीलिये आपकी कार्य पद्धति में और आपके चिंतन में ये बातें जुड़ी रहनी चाहिए कि हम किस तरीके से मिल- बाँट के खायेंगे और दूसरों की मुसीबतों में किस तरीके से हाथ बँटायेंगे। इसीलिये आपको अपना स्व, संकीर्ण स्व जो आपने कूपमण्डूक के तरीके से सीमित कर रखा है। फिर आप  उसको विशाल बना देंगे। आप सबके हो जायेंगे, सब आपके हो जायेंगे। देवता हो जायेंगे। आपके लिये स्वर्ग आ जायेगा। अगर आप यह स्वर्ग नहीं खरीद नहीं सकते और आपने सीमा बन्धन, सीमा बन्धन अपना ही खाना, अपना ही पहनना, अपना ही पैसा, अपना ही बेटा, अपना ही देश, अपना ही नाम करते रहेंगे तो आप बहुत छोटे रहेंगे, जलील आदमी रहेंगे और नरक में रहने वाली आत्माएँ जो यातनाएँ भुगतती हैं, मानसिक दृष्टि से वे सारी यातनाएँ आपको भुगतनी पड़ेंगी। शारीरिक दृष्टि से ठीक है, यह हो भी सकता है कि आप खाने- पीने का सामान इकट्ठा कर लें, कुछ पैसा इकट्ठा कर लें, लेकिन आप दुःखी रहेंगे। क्या करना चाहिए आपको? 
          एक और काम करना चाहिए। कौन- सा? खिलाड़ी की जिन्दगी जीनी चाहिए। खिलाड़ी की जिन्दगी आप जीयें। खिलाड़ी हारते भी रहते हैं और जीतते भी रहते हैं। टीम बना  के खेलते रहते हैं। हार गया, ये हार गया। हार गया तो क्या है? चेहरे पर कोई शिकन ही नहीं। आप अपने चेहरे पे शिकन मत आने दीजिए। चिंताओं को और मुसीबतों की कल्पनाएँ करके, संदेह करके और भविष्य की आशंकाएँ करके हर समय आपका दिल घुटता रहता है। आप निश्चिन्त रहिए, निर्द्वन्द्व रहिए, हँसते रहिए, मुस्कुराते रहिए। आप हँसते और मुस्कुराते रहेंगे, निश्चिन्त रहेंगे तब, खिलाड़ी की तरह जिन्दगी जीयेंगे, तब। तब फिर, आपको मैं देवता कहूँगा। ये नाटक है, आप इसके पात्र हैं। दुनिया में आपको एक नाटक अदा करना है। आप नट के तरीके से तमाशा कीजिए। लोगों को मनोरंजन करने दीजिए। लेकिन आप निश्चिन्त होकर के राजा जनक के तरीके से अपनी मनःस्थिति को बनाये रखिए। फिर, मैं आपको स्वर्ग में निवास करने वाला कहूँगा। 
          भूत का चिंतन मत कीजिए। पिछली जो घटनाएँ हो गईं तो ठीक है। आपने कोई अच्छे काम कर लिये तो बार- बार प्रशंसा करने की जरूरत क्या है, आपके साथ में किसी ने कोई बुराई कर ली या दुःख भुगत लिया तो बार- बार कहने की जरूरत क्या है? भूत सो भूत, गया सो गया। आप भूत पर मत विचार कीजिए। भूत से आप अनुभव तो इकट्ठा कर सकते हैं, लेकिन चिंता भविष्य की कीजिए। करना हमको क्या है, करना हमको क्या है, ये सोचते रहेंगे तो फिर मजा आ जायेगा। 
          बूढ़े आदमी भूतकाल का चिन्तन करते रहते हैं। बच्चे भविष्य की बात सोचते रहते हैं, लेकिन जवान आदमी वर्तमान की बात सोचते रहते हैं। आपको वर्तमान में क्या करना चाहिए? आज का दिन आप किस तरीके से बेहतरीन बना सकते हैं? अगर ये विचार आपके जी में आ जाये तो फिर मैं आपको यह कहूँगा कि आप स्वर्ग में निवास करने वाले आदमी हैं। 
          भविष्य की क्यों अनावश्यक कल्पना करें। योजना बना लीजिए। योजना बनाना अलग बात है। महत्त्वाकांक्षा बात अलग है। हमको एम. ए. करना है तो आप स्कीम बनाइये। एम. ए. नहीं हुए तो मर जायेंगे, एम. ए. नहीं हुए तो नाक कट जायेगी, एम. ए. नहीं हुए तो बात बिगड़ जायेगी, क्या बात बिगड़ जायेगी? दुनिया में बिना पढ़े- लिखे लोग भी तो हैं। आप मैट्रिक पास रह गये तो क्या आफत आ गई? नहीं साहब, हमारा ये हो जायेगा, हमारा वो हो जायेगा, ऐसे विचार करते रहेंगे तो मैं आपको नर्कगामी कहूँगा। स्वर्ग में रहने वाले अपने वर्तमान का ध्यान करते हैं, भविष्य की तैयारी करते हैं, भूतकाल को भूल जाते हैं और खिलाड़ी के तरीके से जिन्दगी जीते हैं। अपने जीवन के तौर- तरीकों में ऐसा मौलिक परिवर्तन आप करके जाइये यहाँ से। मेरी आशा है, आप यही करेंगे। 
आज की बात समाप्त ।। ॥ॐ शान्तिः॥ 
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