नारी जागरण एक अनिवार्यता
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व्यक्ति और समाज की मध्यवर्ती कड़ी है—परिवार। व्यक्ति परिष्कार का कार्य अध्यात्म दर्शन और उपासना विज्ञान के माध्यम से सम्भव होता है। समाज को धर्मतंत्र और राजतंत्र के समन्वित प्रयासों से नियंत्रित किया जाता है। उसे सभ्य और समृद्ध बनाने का कार्य यह दोनों तंत्र मिल-जुल कर सम्पन्न करते हैं। व्यक्ति और समाज की ही तरह तीसरी इकाई है—परिवार। उसे जिस सृजन सत्ता द्वारा सुनियोजित किया जाता है, उसका नाम है—‘नारी’ वही विवाह के साथ नया परिवार बनाती है और प्रजनन के साथ उसे और भी अधिक प्रत्यक्ष करती है। यों नारी व्यक्ति भी है और समाज भी, पर यदि उसकी स्वतन्त्र सत्ता का अधिक विश्लेषण किया जाय तो उसे गृहलक्ष्मी कहा जा सकता है। उसे समृद्धि, शक्ति और संस्कृति की अधिष्ठात्री कहा जा सकता है। परा और अपरा शक्ति के रूप में भी उसी की चर्चा तत्वज्ञानी करते रहे हैं। सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा के रूप में उसी की अभ्यर्थना होती रही है। इसी शक्ति का संयुक्त एवं मूर्तिमान रूप नारी है। मनु ने ठीक ही कहा है कि जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं, वरदान और अनुदान बरसते हैं। यह विश्व उसी की कृति है। यदि नारी न होती तो मनुष्य का अस्तित्व ही प्रकट न होता। वह न रहे तो समझना चाहिए कि कुछ ही दिनों में प्रस्तुत प्रजाति का समापन हो जायेगा। वह सृष्टा भी है और पोष्या भी? नर को सदा उसका कृतज्ञ रहना पड़ेगा। नारी का जो उचित स्थान है, वह उसे नहीं मिल रहा—इसे एक दुर्भाग्य ही कहना चाहिए। वरिष्ठता तो छिन ही गयी, समता से भी उसे वंचित रहना पड़ रहा है। फलतः न केवल वह स्वयं दुर्बल हुई वरन् उसका अधिकार क्षेत्र, परिवार और समूचा मनुष्य समुदाय ही दुर्बल हो गया। दिव्यता का नियंत्रण हट जाने से उच्छृङ्खलता और आक्रामकता ही पनपती है, उसी का आज बोलवाला है। परिणाम सामने है। चतुरता और सम्पदा में दिन-दिन अभिवृद्धि होने पर भी सर्वत्र पतन और पराभव के दृश्य उपस्थित हो रहे हैं। नारी का माता, सहधर्मिणी, भगिनी और पुत्री का जो दीप्तिमान स्वरूप जीवन्त रहना चाहिए था, उसका लोप जैसा हो चला है। अब वह दासी बनकर रह गयी है, उसकी उपयोगिता रमणी के रूप में ही आंकी जाती है। मांसलता को ही सराहा जाता है। आकर्षण और उत्तेजना के लिए ही लोग उसके इर्द-गिर्द फिरते हैं। इस कुचक्र के कारण नारी अपंग-असहाय जैसी स्थिति में फंस गयी। फलस्वरूप उसका प्रभाव क्षेत्र—व्यक्ति, परिवार और समाज भी रोग-शोक से घिर कर गयी गुजरी स्थिति में जा पहुंचा है। स्थिति को इसी रूप में रहने दिया गया तो मनुष्य समाज पशुओं और प्रेत-पिशाचों से भरा-घिरा दीखेगा, बेमौत मरेगा और इस विश्व वसुधा को भी विनाश के गर्त में धकेल देगा। आवश्यकता है कि समय रहते प्रवाह को बदला जाय। नारी को वरिष्ठता का न सही, कम से कम समता का अधिकार तो उपलब्ध करने दिया जाय। यह समय की महती आवश्यकता है। इसी की पूर्ति के लिए नारी जागरण अभियान है। इसके अन्तर्गत उन अवांछनीयताओं को निरस्त किया जाना है, जिनके कारण आज नारी मात्र दासी बनकर रह गयी है और किसी प्रकार भारभूत होकर जी रही है। परिवार संस्था को निजी रूप में नर-रत्नों की खदान कहा जा सकता है। समाज के संदर्भ में उसे सर्वतोमुखी प्रगति का उद्गम कहा जा सकता है। परिवार को संभालने में यों नर का भी कर्तव्य और उत्तरदायित्व है, पर उसे सही रूप में, देवमानवों का धरती पर दृष्टिगोचर होने की स्थिति में पहुंचाने का श्रेय नारी को ही मिल सकता है। वह उसका अधिकार क्षेत्र जो है। परिवार को सभ्य-समुन्नत बनाना है तो नारी की स्थिति सुधारना अनिवार्य रूप से आवश्यक है—यही है नारी जागरण की पृष्ठभूमि। ***

