कुरीतियों का उन्मूलन आवश्यक
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
पिछड़ेपन की परिस्थितियों में रहते-रहते मनुष्य स्वतन्त्र चिन्तन की क्षमता गंवा बैठता है। अभ्यस्त ढर्रा ही उसके लिए पत्थर की लकीर बन जाता है। प्रचलन के ढांचे में उसका एक प्रकार से मानस ऐसा प्रतिबंधित हो जाता है कि स्वतन्त्र चिन्तन के लिए गुंजाइश ही नहीं बचती। जो देखा, जाना और किया है वही सब कुछ सही प्रतीत होता है, भले ही अभ्यस्त ढर्रा कितना ही अनुपयुक्त और हानिकारक क्यों न हो। सभ्यता के वातावरण से दूर रहने वाले वनवासी कबीले प्रायः ऐसी ही जिन्दगी गुजारते हैं जैसी कि उनके पूर्वज और सहवासी अपनाये रहते हैं।अशिक्षा और पिछड़ेपन से घिरी हुई महिलाओं के लिए उनकी देखी, जानी दुनियां ही सब कुछ होती है। उसी में जो कुछ उछलता-उभरता रहता है। उसी का अनुकरण करते रहने में उन्हें भलाई प्रतीत होती है, उसमें खोट ढूंढ़ने के लिए विवेक भी साथ नहीं देता। एक विशेष प्रकार की भीरुता अपना आधिपत्य जमा लेती है, जिसके कारण वर्तमान का पर्यवेक्षण और अभिनव चिंतन का साहस जुट ही नहीं पाता।कुरीतियां अपने समाज में सर्वत्र संव्याप्त दीखती हैं। अन्ध मान्यताओं, अन्ध विश्वासों का सर्वत्र बोलवाला दिखाई देता है। इसमें शिक्षित और अशिक्षित पुरुष वर्ग भी समान रूप से धंसा और फंसा पाया जाता है, पर इस प्रसंग में महिलायें और भी आगे पाई जाती है—उन्हें कुरीतियां धर्म परम्परा जैसी लगती हैं। यह सोचने की न तो फुरसत रहती है न आवश्यकता प्रतीत होती है कि जो माना-अपनाया जा रहा है, उसमें कुछ परिवर्तन की आवश्यकता भी है क्या? नई और पुरानी पीढ़ी वाला अन्तर इसीलिए तालमेल नहीं बिठा पाता और आये दिन विग्रह खड़े होते रहते हैं। सास-बहू के, देवरानी-जिठानी के, ननद-भावज के बीच पनपते मनोमालिन्य इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। कारण कोई बहुत बड़े नहीं होते, पुराने और नये ढर्रे का असंतुलन विसंगतियां खड़ी करता रहता है—इसी आधार पर चख चख होती रहती है।इसी रूढ़िवादिता के कारण महिलायें भी महिलाओं के प्रति अनुदार पाई जाती हैं। अपनी ही जाति की कन्या का जन्म लेने पर पुरुषों से भी अधिक घर की महिलायें ही बुरा मानती हैं, यहां तक कि माता तक उदास हो जाती है—जबकि होना इसके ठीक विपरीत चाहिए। अपने वर्ग की हिमायत करने का आम प्रचलन है, पर महिलायें अपने ही वर्ग के प्रति पुरुषों की तुलना में अधिक अनुदार पाई जाती हैं। दहेज मांगने में, कोई सुन्दर बहू घर में लाने के लिए महिलायें जितना आग्रह करती हैं उसकी तुलना में पुरुषों का हठ कुछ कम ही होता है।अपने समाज में जातिगत, ऊंच-नीच, मृतक-भोज, पर्दा प्रथा, भाग्यवाद, भिक्षा व्यवसाय, भूत-पलीत जैसी कितनी ही कुरीतियां प्रचलित हैं—इनमें महिलायें ही अधिक अग्रणी पाई जाती हैं। यों पुरुष भी प्रकारान्तर से समर्थन ही करते रहते हैं। अनावश्यक ढर्रे के विरोध में किसी का मुंह नहीं खुलता। आवश्यकता इस बात की है कि उचित-अनुचित का निर्णय करने वाली विवेक बुद्धि जागे और अवांछनीय मूढ़ मान्यताओं के विरुद्ध परिवर्तनकारी साहस नये सिरे से जागे। इस सन्दर्भ में अनेकों विचारणीय प्रसंग हैं, पर उनमें सबसे कष्टकारक कुप्रथा विवाह शादियों में होने वाले अपव्यय की है। सर्वविदित है कि खर्चीली शादियां हमें दरिद्र और बेईमान बनाती हैं। क्योंकि उनमें बर्बाद होने वाली राशि को सामान्य श्रम से उपार्जित कर सकना संभव नहीं।इस महंगाई के जमाने में औसत व्यक्ति के लिए घर खर्च चलाना ही कठिन पड़ता है। फिर जेवर, दहेज, प्रदर्शन, ठाट-बाट, बारात-प्रीतिभोज, बाजे-गाजे में खर्च होने वाली राशि कहां से आये? जिस गृहस्थ को कई लड़के-लड़कियों की शादी करनी पड़ती है, उनकी बचत पूंजी तो इसी में खप जाती है। कई बार तो कर्ज लेने और बेईमानी पर उतरने की मजबूरी भी सामने आ खड़ी होती है। इस कुचक्र से घर के सदस्यों को स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यवसाय आदि भौतिक आवश्यकताओं से भी वंचित रहना पड़ता है। इन दिनों कन्या पक्ष के लिए शादियां वज्रपात और वर पक्ष के लिए अभिशाप बनकर रह रही हैं। नफे में कोई भी नहीं रहता, दोनों ही अपनी पूंजी निरर्थक धूमधाम में गंवा बैठते हैं।यों दहेज के सम्बन्ध में कानूनी प्रतिबंध है और बाल विवाह के संबंध में भी। फिर भी सामाजिक विरोध न होने से वे अवांछनीयतायें यथावत जमी रहती हैं। इन्हें उखड़ने के लिए साहसपूर्वक कदम उठने चाहिए। इसके लिए महिला वर्ग को अगली पंक्ति में खड़ा होना चाहिए। क्योंकि इसी समुदाय को इन कुप्रथाओं के कारण भारी त्रास विशेष रूप से सहना पड़ता है। जिस प्रकार दाम-दासी प्रथा, सती प्रथा समय के दबाव में समाप्त हो गई उसी प्रकार कन्या पुत्र का अन्तर भी समाप्त होना चाहिए और धूमधाम से दहेज जेवर की शादियों का भी उन्मूलन होना चाहिए।सभी विवेकवान् महिलायें प्रतिज्ञा करें कि वे अपने लड़कों पर न तो दहेज लेंगी और न लड़कियों को देंगी। जो देना हो उसे दोनों पक्ष मिलाकर कन्या के नाम बैंक में जमा करें, जिससे वह पूंजी बढ़ती रहे और उससे लड़की के भविष्य निधि के रूप में आड़े समय के लिए कुछ ढाढ़स बंधा रहे। दिखावा करने, प्रीति भोज, बैण्ड-बाजे जैसे आडम्बर तो पूरी तरह समाप्त होने चाहिए। दोनों पक्षों के प्रमुख परिजन मिल-जुलकर एक छोटा पारिवारिक उत्सव संजो लिया करें। इसके लिए वयस्क लड़के लड़कियों को भी धूमधाम वाली खर्चीली शादियां न करने की प्रतिज्ञायें करनी चाहिए।अपने समाज की सबसे बड़ी कुरीति खर्चीली शादियां हैं। इसके कारण बचत के आधार पर होने वाली आर्थिक प्रगति के द्वार बन्द हो जाते हैं। दरिद्रता अभिशाप की तरह लदी रहती है, और भी अनेकों दुष्परिणाम इस कारण भुगतने पड़ते है। नर और नारी के बीच समता का वातावरण भी बनाने के मार्ग में सबसे बड़ा व्यवधान यह खर्चीली शादियों वाले अवरोध ही हैं। वस्तुस्थिति समझी जानी चाहिए और हर विचारशील नर-नारी को इसका अन्त करने के लिए कटिबद्ध होना चाहिए। जो इस कुरीति पर अड़े रहें उनको समझाना-बुझाना, रोकना और दबाव देना चाहिए। तब भी बात न बने तो कम से कम इतना तो करना ही चाहिए कि इन विवाहों से असहयोग किया जाय। उसमें सम्मिलित न हुआ जाय, भले ही वे अपने इष्ट-मित्रों या सगे-सम्बन्धियों के यहां ही क्यों न हो रही हों।गांधी जी ने स्वतन्त्रता संग्राम नमक सत्याग्रह से आरम्भ किया था। हमें भी अपने समाज में संव्याप्त अनेकानेक कुरीतियों के समापन हेतु अग्रसर होने के लिए प्रारम्भिक कदम खर्चीली शादियां समाप्त करने से आरम्भ करना चाहिए। अपने देश की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में सुधार करने के लिए आवश्यक है कि कुरीतियों के विरोध में बगावत खड़ी की जाय। जहां जो कुप्रचलन हों वहां उनसे स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार निपटने की समयानुसार योजना बनती रहे।

