क्रिया-कौशल का व्यावहारिक शिक्षण
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बौद्धिक शिक्षण के अतिरिक्त महिलाओं को ऐसा व्यवहारिक क्रियात्मक शिक्षण मिलना चाहिए, जिसके आधार पर वे व्यक्तित्व को परिष्कृत एवं प्रतिभावान बना सकें—प्रगति पथ पर अग्रसर हो सकें।इस संदर्भ में अधिक उपार्जन की क्षमता विकसित करने की प्रक्रिया को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, जिससे हर नारी में स्वावलम्बन की क्षमता का विकास हो सके—इससे आत्म विश्वास बढ़ता है। अतिरिक्त उपार्जन होने लगने से घर की समृद्धि बढ़ती है। आड़े समय में अपने पैरों पर खड़े हो सकने की क्षमता विकसित होती है। रचनात्मक काम करने का अभ्यास होता है और कुशलता में निरन्तर अभिवृद्धि होती है। यह सभी उपलब्धियां ऐसी हैं जिन पर गर्व किया और प्रसन्न रहा जा सकता है।नारी को आर्थिक दृष्टि से अनुत्पादक माना जाता है, इसलिए भी उसकी उपेक्षा होती है। यों वह दिन भर गृह कार्यों में संलग्न रहकर इतनी बचत करती है कि उसे कमाई से कम नहीं आंका जा सकता है। नारी श्रम से जो कार्य सम्पन्न होते हैं यदि उन्हें मजूरी पर कराया जाय—बाजार से खरीदा जाय तो प्रतीत होगा कि बचत के रूप में वह कितना अधिक उत्पादन करती है, फिर भी उसकी ओर ध्यान न देकर उसे अनुत्पादक माना और उपेक्षित रखा जाता है। समय आ गया है कि अब महिलाओं को उद्योगों के माध्यम से कुछ ऐसी अतिरिक्त कमाई भी आरम्भ करनी चाहिए जिनके आधार पर उन्हें ‘कमाऊ’ होने का श्रेय भी मिल सके।यदि गृह कार्यों को परिवार के सभी लोग मिल-जुलकर निपटाये, नियत समय पर ही सब काम निपटा लेने का क्रम चलायें तो निश्चय ही हर महिला को इतना अवकाश मिल सकता है, जिसमें वह बौद्धिक शिक्षण की आवश्यकतायें पूरी करने के अतिरिक्त कुटीर उद्योगों के लिए भी कुछ समय निकाल सके। आमतौर से मध्यान्ह का समय ऐसा बचता है जिसमें प्रगतिशीलता की दिशा में बढ़ाने वाले इन दोनों ही अतिरिक्त कार्यों को सम्पन्न करते रहा जा सकता है। पुरुषों के लिए रात्रि में और महिलाओं के लिए तीसरे प्रहर दिन में जो अवकाश रहता है उसमें उपरोक्त दोनों कार्यों के लिए प्रयुक्त करते हुए लाभान्वित रहा जा सकता है।स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ऐसे अनेक कार्य हो सकते हैं जिन्हें अपनी योग्यता के अनुरूप अपनाया जा सके। घरेलू शाक वाटिका, मधुमक्खी पालन, साबुन बनाना, सिलाई, कताई, धुनाई, अगरबत्ती बनाने जैसे अनेकों ऐसे काम किये जा सकते हैं जिनके लिए कच्चा माल आसानी से मिल जाता है और बनी चीजें इर्द-गिर्द ही खप जाती हैं। खादी ग्रामोद्योग जैसी संस्थाओं के माध्यम से इस दिशा में सहयोग लिया जा सकता है। जहां-तहां सहकारी समितियां अपने क्षेत्र में कुटीर उद्योगों के लिए प्रयत्न करती और साधन जुटाती हैं—इनसे सम्पर्क साधकर कोई आधार चुना जा सकता है। शांतिकुंज में भी ऐसे सर्वसुलभ प्रायः एक दर्जन उद्योगों के सिखाने की व्यवस्था है।समूचे परिवार की स्वास्थ्य संरक्षिका नारी है। आहार और बिहार का सुनियोजन करके वह सभी स्वजनों को स्वस्थ रख सकती है। आहार को स्वाद प्रधान बना देने से उसकी उपयोगिता में भारी व्यवधान पड़ता है। इसलिए प्रस्तुत पाक विद्या का एक प्रकार से कायाकल्प ही करना पड़ेगा। भाप से बने, बिना तले भुने, कम मसाले वाले, अंकुरित एवं हरित सन्तुलित स्थिति के खाद्य पदार्थों को अभ्यास में उतारना होगा—इसे आहार क्रान्ति कह सकते हैं। इसकी समूची रूपरेखा मस्तिष्क में रखकर अभ्यस्तों का नशा उतारने की समय साध्य योजना अपनानी पड़ेगी। श्रम का असन्तुलन दूर करना होगा। बच्चों से लेकर बूढ़ों तक को उनके अनुरूप श्रम साधना में लगना होगा ताकि अंग संचालन की प्रक्रिया ठीक चलती रहे। स्वास्थ्य को प्रमुखता देने वाली दिनचर्या को प्रकृति अनुशासन के साथ जोड़ देने पर बीमारियों, दवाओं और चिकित्सा से सहज छुटकारा पाया जा सकता है। घरेलू चिकित्सा कितनी निर्दोष और कितनी लाभदायक है इसका अभ्यास यदि महिलायें कर लें तो बिना फीस वाले सुयोग्य डॉक्टर का स्थान ग्रहण कर सकती हैं।परिवार का आर्थिक पक्ष और भावना पक्ष भी कम महत्व का नहीं है। अधिक उपार्जन और अधिक मितव्ययिता के आधार पर कोई भी खुशहाली संजोये रह सकता है। फैशन, ठाठ-बाट, शृंगार प्रदर्शन, दुर्व्यसन जैसे फिजूलखर्ची वाले कार्य जब स्वभाव का अंग बन जाते हैं तो मनुष्य को दरिद्र और बेईमान बनाकर छोड़ते हैं। इसलिए गृहलक्ष्मी होने के नाते उसे परिवार का बजट सन्तुलन रखने से लेकर आजीविका के स्रोतों तक अपनी पहुंच बनानी होगी। नशेबाजी जैसे दुर्व्यसनों से पूरी तरह छुट्टी दिलानी पड़ेगी। निर्धारित कार्य के अतिरिक्त बचे समय में समाज सेवा या अर्थोपार्जन में से किसी एक में या दोनों में अभिरुचि उत्पन्न करनी होगी—यह परिवार को समृद्ध बनाने वाला अर्थ पक्ष है।भावना पक्ष की अपनी विशेषता है। वह अनेक विग्रहों का सहज समाधान करती है। घर में अनेक प्रकृति के, अनेकों रुचि के, अनेक दृष्टिकोण वाले एक साथ रहते हैं। उनके स्वभाव और स्वार्थ आपस में टकराते रहते हैं। इन विभिन्नताओं को एक सूत्र में बांधे रहना प्रकारान्तर से राष्ट्रीय एकता और अखण्डता बनाये रहने का छोटा उपक्रम है। बच्चे, युवकों, बूढ़ों, लड़कियों, सम्बन्धियों को अपनी परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाने के लिए सहमत कर लेना एक मनोवैज्ञानिक का कार्य है। इतने पर भी उसे हर कुशल महिला को अध्ययन या अनुभव के आधार पर जानना ही होगा। इस कुशलता के अभाव में परिवार विघटन के ऐसे संकट खड़े होते हैं, जिनके कारण पारिवारिक शान्ति और प्रगति दोनों का अन्त हो जाता है। घृणा और द्वेष से, पीड़ा और पश्चाताप की आग से सभी को झुलसना पड़ता है। ऐसा न होने देने में गृह लक्ष्मी की उदारता और दूरदर्शिता ही बहुत कुछ कर सकने में समर्थ हो सकती है। विवेकशील महिलायें अपनी उदार बुद्धिमत्ता के आधार पर परिवार सेवा की इस उच्चतम आवश्यकता की पूर्ति किसी प्रकार कर लेती है। सृष्टा ने इसके लिए उन्हें विशिष्ट भाव संवेदना से संपन्न किया है, इसे और भी अधिक खरादा-निखारा जा सकता है।घर परिवार की स्वच्छता, सज्जा सुव्यवस्था अपने आप में बड़ी चीज है, उसे एक छोटे राष्ट्र का सूत्र संचालन कह सकते हैं। इसके अभाव में घर नरक बन जाते हैं। वस्तुयें कचरा बनकर अपनी दुर्दशा पर रोना रोती रहती है। टूट-फूट यदि समय रहते न संभाली जाय तो वह अच्छी-भली वस्तु को कुछ ही दिनों में कूड़े में बदल देती हैं। घर के मनुष्यों की तरह ही काम आने वाला हर पदार्थ बर्तन-उपकरण अपनी-अपनी उचित देखभाल और सुव्यवस्था चाहता है। कहावत है कि जो रूठे को मनाना और टूटे को बनाना जानता है वह लोक व्यवहार के क्षेत्र में बहुत कुछ जानता है। यह कौशल भी प्रत्येक महिला प्रतिभा के स्वभाव अभ्यास में आना चाहिए। मरम्मत और सफाई का हर पक्ष भी इसी प्रकार माना जाना चाहिए। जैसे भोजन बनाने, बच्चे पालने जैसे कार्यों को अनिवार्य रूप से जानना और करना पड़ता है।परिवार की संरचना और सुव्यवस्था अपने आप में एक समूचा विज्ञान है। उसे कब, कहां किस रूप में प्रयुक्त किया जाय—यह घर गृहणी की दिनचर्या का एक पक्ष है, जिसमें उसे अवगत-अभ्यस्त होना ही चाहिए। अपने घर में इन सत्प्रवृत्तियों के बीजारोपण का अर्थ है—भविष्य में शाखा प्रशाखाओं की तरह नये परिवारों की जो नई पीढ़ियां बनने वाली हैं उनके लिए उपयोगी परम्परा छोड़ जाना। पड़ौसी-सम्बन्धी किसी न किसी रूप में सम्पर्क में आते ही रहते हैं। यदि किसी सुगृहणी ने अपने परिवार को सुनियोजित कर लिया है तो समझना चाहिए कि समूचे सम्पर्क क्षेत्र में इस विज्ञान की सही दिशाधारा का विस्तार करने की योजना क्रियान्वित करने की अति महत्वपूर्ण सेवा साधना आरम्भ कर दी। संगीत-कहानी सुनाना, चित्रकला-खिलौना बनाना, स्वनिर्मित सज्जा उपकरण, टूटी वस्तुओं की मरम्मत जैसे अनेकों काम ऐसे हैं जिनसे अपनी सुरुचि का प्रकटीकरण हो सकता है। साथ ही उस कौशल का सम्पर्क में आने वाले दूसरों को भी अभ्यास कराया जा सकता है।कहा तो यह जाता है कि माता अपने बच्चे की न केवल शरीर की वरन् उनके स्वभाव और भविष्य की भी निर्माता है। यदि इसी बात को और भी स्पष्ट किया जाय तो यों भी कहा जा सकता है कि वह परिवार की अधिष्ठात्री, घर की निर्मात्री है। इस छोटी भूमिका के सम्पादित करने के साथ-साथ परोक्ष रूप में सम्भावना भी विद्यमान है कि वह अपने व्यक्तित्व और कर्तृत्व से समूचे समाज की, सुविस्तृत विश्व मानव की सेवा, अपने आदर्श और उदाहरण के सहारे सम्पन्न कर सकती है।

