सम्मिलित प्रगति प्रयास
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परिवार और समाज के विकास के लिए नर-नारी का संयुक्त प्रयास अनिवार्य होगा। अविकसित नारी छोटे-मोटे कामों में ही इतना उलझ कर रह जाती है कि कुछ विशेष न सोच पाती और न कर पाती है। परिवार को सुसंस्कृत, सद्गुणी और सुविकसित बनाने की योजना एवं रूपरेखा उसके मस्तिष्क में नहीं रहती, फिर वह ऐसा कुछ कर पाये—वैसी आशा कैसे की जाय? सन्तानों के शरीर, मन प्रायः माता के ही शरीर का एक भाग होते हैं। यदि जननी स्वयं अविकसित है, पिछड़ेपन के साथ जुड़े रहने वाले दुर्गुणों से ग्रसित है तो फिर यह कैसे आशा की जाय कि वह अपने प्रयास-पुरुषार्थ के सहारे नई पीढ़ियों को ऐसी बना सकेगी जो सुसंस्कृत नागरिक की भूमिका सम्पन्न कर सके और समाज को सुविकसित बनाने में कोई कारगर योगदान दे सके। परिवारों का समूह ही समाज है। परिवार की मेरुदण्ड नारी होती है। यदि नारी का स्तर समुन्नत न रह सका तो फिर परिवारों में धरती के स्वर्ग के दर्शन कहां हो सकेंगे और पिछड़े परिवारों का समुदाय समर्थ–सुविकसित राष्ट्र के रूप में कैसे परिणित हो सकेंगे? तथ्य पर विचार करने से इस निष्कर्ष पर पहुंचा जाता है कि राष्ट्र निर्माण का शुभारम्भ परिवारों की व्यवस्था के आधार पर होना चाहिए और सुनियोजित परिवारों की तारतम्य नारी को सुयोग्य, सुशिक्षित, समुन्नत बनाने से होना चाहिए। ऐसा न बन पड़ने पर यही समझा जायेगा कि जड़ सींचने की अपेक्षा पत्ते सींचकर पेड़ को हरा-भरा बनाने का प्रयत्न किया जा रहा है।विकसित देश अपनी समूची जनसंख्या को सुयोग्य नागरिक बनाने में जो परिपूर्ण प्रयास करते हैं, उसमें पिछड़े वर्गों को समान स्थिति में लाने की प्रधानता देते हैं। इस सन्दर्भ में नारी समस्या को प्राथमिकता देने की बात सामने आती है। उसी को प्रमुखता देने पर यह स्थिति उत्पन्न हुई है। विभिन्न क्षेत्रों का राष्ट्रीय विकास सर्वांगपूर्ण बन सका है। इस हेतु प्रधान रूप से जो कार्य किया है—नारी के अवमूल्यन का समापन। इसका अर्थ है नर की तरह नारी को भी कर्तव्यों और अधिकारों के निर्वाह में सुयोग्य स्तर तक पहुंचाया जाय। असमानता के व्यवधान को समाप्त करना। शिक्षा, स्वावलम्बन, कौशल और स्तर की दृष्टि से अन्य नागरिकों के समान सुविधा प्रदान करना। नर और नारी में से इस प्रकार से प्रगति में किसी को भी पीछे नहीं रहने दिया गया है।जापान, इजराइल, जर्मनी, रूस, चीन, कनाडा जैसे देशों की महिलायें पुरुषों के कन्धे से कन्धा मिलाकर काम करती हैं। कृषि प्रधान देशों की समुन्नत महिलायें घर-परिवार सम्हालने की तरह कृषि, पशु पालन, बागवानी जैसे उन उद्योगों को सम्हालती हैं जो घर की साज सम्हाल के साथ उत्पादन भी बढ़ाती हैं और स्वावलम्बन का पथ प्रशस्त करती हैं। घर के पुरुष अन्य महत्वपूर्ण कार्यों में लगते हैं और घर-परिवार की ओर से निश्चिन्त रहते हैं। घर में सम्पन्नता भी बढ़ती रहती है।अनेक विकसित देशों की शिक्षित महिलाओं ने अपने देश का चिकित्सा, शिक्षा एवं कला क्षेत्र अपने कन्धों पर सम्हाल लिया है। जापानी महिलायें परिवार में ही ऐसे कुटीर उद्योगों को चलाती रहती हैं जिसमें परिवार की सम्पन्नता और अर्थ व्यवस्था सुनियोजित होती रहे। अन्यान्य देशों के सम्बन्ध में भी यही बात है। वहां की स्थानीय परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुरूप महिलायें भी ठीक वैसी ही जिम्मेदारियां उठाती हैं जैसी कि पुरुष। दोनों पंखों से पंछी उड़ते हैं। नर और नारी के समान सहयोग एवं कौशल के सहारे ही सर्वतोमुखी प्रगति का वातावरण बनता है।जिन देशों पर अभी भी पिछड़ापन सवार है वहां अन्यान्य कारण भी रहे हो सकते हैं, पर सबसे बड़ा कारण उन सभी में एक जैसा पाया जायेगा वह है नारी का पिछड़ापन। यह अवरोध जहां भी अड़ा है वहां उस क्षेत्र के सभी प्रगति द्वार बन्द होकर रह गये हैं। स्पष्ट है कि जहां भी आधी जनसंख्या पिछड़ी स्थिति में रहेगी वहां उसका भार दूसरे पक्ष को वहन करना पड़ेगा और दोनों की शक्ति एक दूसरे से लड़ते-झगड़ते रहने में ही समाप्त हो जायगी। वे मिल-जुलकर कुछ ऐसा कर सकने की स्थिति में न रहेंगे जिसे महत्वपूर्ण कहा जा सके।नर के सुसंस्कृत होने का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि उसने अपने प्रभाव क्षेत्र की महिलाओं का व्यक्तित्व कितना सुविकसित एवं परिष्कृत किया है। घनिष्ठता के साथ भावनात्मक एवं बौद्धिक आदान-प्रदान का उपक्रम भी चलाया है। उत्कृष्टता भी निकृष्टता की भांति अपने क्षेत्र को प्रभावित करती है। यह हो ही नहीं सकता कि कोई व्यक्ति नारी समुदाय से सर्वथा पृथक रहे। अविवाहित या विधुर रहने पर भी माता, भगिनी, पुत्री के रूप में, साथी सहयोगी के रूप में उसका कहीं न कहीं, किसी न किसी महिला के साथ सम्पर्क होता ही है। इस आधार पर सुसंस्कृत पुरुष वरिष्ठ होने के नाते जहां तक उसका प्रभाव परिचय हो नारी को हर दृष्टि से ऊंचा उठाने का प्रयत्न करेगा। जहां इस दिशा में कुछ भी न किया गया हो समझना चाहिए वहां पशुता का साम्राज्य है। वहां पिछड़ापन व्याप्त होगा और प्रगति की वहां आशा नहीं की जा सकती।पुरुष की सद्भावना का एक महत्वपूर्ण प्रमाण परिचय यह है कि वह अन्य क्षेत्रों में भी नारी को समुन्नत बनाने का प्रयत्न करें। यह उच्चकोटि का परमार्थ भी है और सद्भाव भरा प्रायश्चित्त भी। परमार्थ यों कि उसने सृजन शक्ति को समर्थ बनाकर प्रकारान्तर से सारे समाज का सिंचन, पोषण, अभिवर्धन किया। प्रायश्चित्त इसलिए कि नर की अहंमन्यता और संकीर्णता के कारण नारी को वर्तमान दुर्गति तक पहुंचाने के पाप को उसने आगे बढ़कर परिमार्जन किया। क्षतिपूर्ति ही प्रायश्चित्त का तत्व-दर्शन है। पूर्ववर्ती पुरुषों की उपेक्षा, अवमानना ने नारी को गिराया है, उसे उठाने वाला प्रायश्चित्त द्वारा अपनी सद्भावना का प्रमाण परिचय देता है। यह व्यक्तिगत महानता भी है और समूची मानवता को समुन्नत बनाने वाला महानतम परमार्थ भी। इसमें देश-भक्ति, विश्व भक्ति का सघन समावेश है।पुरुषों से पुरुष सम्पर्क साधे और महिला महिलाओं से, व्यक्तिगत वार्तालाप, परामर्श, विचार विनिमय इसी प्रकार सम्भव है। सामूहिक रूप से विचार गोष्ठियों और सभा सम्मेलनों में दोनों को ही मार्गदर्शन दिया जा सकता है, परस्पर उत्साहवर्धन भी कर सकते हैं। किन्तु जहां रचनात्मक प्रयासों में दोनों को अपनी-अपनी भूमिका निभानी है, वहां अपने-अपने ढंग से समझना और समझाना पड़ता है। आगे बढ़ने में प्रधान रूप से नारी का उत्साह और साहस ही काम कर सकता है। इसलिए महिला वर्ग के साथ सम्पर्क साधने में भी उन्हें आगे आना चाहिए।यह काम पुरुषों का है कि अपने परिवार के प्रभाव क्षेत्र की महिलाओं को उसके लिए उत्साहित एवं प्रोत्साहित करें। उन्हें आगे रखें, स्वयं पीछे रहकर इस निमित्त वातावरण बनायें। जन सम्पर्क का अधिक अनुभव होने से पुरुष ही इस क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए अपने प्रभाव क्षेत्र की महिलाओं को अधिक प्रोत्साहित कर सकते हैं। पति-पत्नी दोनों मिलकर भी इस काम को आसानी से कर सकते हैं। दोनों ही वर्गों को उत्साहित और सहमत करके अनेक उतार-चढ़ावों से भी निपट सकते हैं। घर की बड़ी-बूढ़ी महिलायें और पुराने विचार के पुरुष प्रायः इस प्रयास में बाधक बनते देखे गये हैं। उन्हें जो कुछ चल रहा है उसी को चलने देने में परम्पराओं का निर्वाह लगता है। इसके अतिरिक्त और कुछ सुधारवादी चिन्तन उनके गले नहीं उतरता। इसलिए वे आमतौर से इन प्रयत्नों को निरुत्साहित करते रहते हैं। बन पड़े तो बाधक बनते हैं। इसलिए सम्भव हो तो समझा बुझाकर उन्हें किसी प्रकार नरम करना चाहिए। न मानें तो भी अपने बलबूते अपने प्रयास तो जारी रखने ही चाहिए। यह कार्य अवरोधों की उपेक्षा करते हुए भी जारी रखा जा सकता है। परिवर्तन की गति धीमी रखी जा सकती है और कलह क्लेश होने की स्थिति से बचा जा सकता है।अपने देश में नर और नारी का समीप आना, सम्पर्क बनाना सन्देह की दृष्टि से देखा जा सकता है। इस मानसिकता को बदलने में अभी समय लगेगा। इसलिए यदि पुनरुत्थान में सरलता और तीव्रता रखनी हो तो उचित यही होगा कि आन्दोलन में अग्रणी महिलायें ही रहें। प्रगति प्रयासों को गति देने में उन्हीं की भूमिका प्रधान रहे। श्रेय उन्हीं को मिले, नेतृत्व करने का अवसर उन्हीं को दिया जाय। किन्तु यह काम अकेली अपने बलबूते सम्भवतः वे नहीं कर सकेंगी। इसलिए आवश्यक यही है कि प्रगतिशील पुरुष इस प्रयास की समूची पृष्ठभूमि बनाने के लिए आवश्यक उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर उठाते रहे, हर दृष्टि से पथ प्रशस्त करते रहें, और आन्दोलन का संचालन प्रगतिशील महिला वर्ग को करने दे।इसके लिए उपयुक्त यह रहेगा कि पांच-पांच महिलाओं की ‘‘नारी जागरण मण्डली’’ गठित कर दी जाय। बड़े संगठन इसलिए कारगर नहीं होते कि उनमें वर्चस् की महत्वाकांक्षा के लिए खींचतान आरम्भ हो जाती है और विग्रह खड़े हो जाते हैं। अपने देश में पिछड़े समुदायों में जब कभी सामाजिक संगठन खड़े करना हो तो उन्हें पांच-पांच के घटकों में बांटना चाहिए। इस प्रकार एक से पांच और पांच से पच्चीस होने की परम्परा चल पड़ेगी। जब कभी बड़े प्रयास करने हों तो इन छोटे घटकों को एकत्रित कर बड़ा संगठन बनाया जा सकता है। सीमित सदस्यों वाले परिवार ही ठीक तरह चल पाते हैं। नारी संगठनों को यदि सशक्त और क्रियाशील बनाना है तो उन्हें पांच से पच्चीस बनाने का ही लक्ष्य रखना उपयुक्त होगा। पुरुष इस संदर्भ में आवश्यक वातावरण बनाने, कार्य करने और साधन जुटाने की तिहरी भूमिका सम्पन्न करें। इसी मिले-जुले सहयोग से प्रयास अग्रणी हो सकेंगे।

