अभियान की दूरगामी परिणति
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संसार के इतिहास में समय-समय पर अनेकानेक आन्दोलन उभरते रहे हैं। उनमें से कुछ सफल, कुछ असफल भी होते रहे हैं। इनमें से अनेक अनीति विरोधी और अधिकारों की मांग से सम्बन्धित रहे हैं। कुछ का सृजनात्मक पक्ष रहा है, पर वे सभी सामयिक या क्षेत्रीय ही रहे हैं। अपनी तत्कालिक आवश्यकता पूरी करने के उपरान्त उनका समापन भी होता है। ऐसा आन्दोलन कदाचित् ही कभी उभरा हो, जिसकी समूची मानवता के साथ चिरन्तन सम्बन्ध रहा हो। इस संदर्भ में पहला और अन्तिम आन्दोलन नारी जागरण को माना जाये तो उसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी।आन्दोलनों की दुनिया का निरीक्षण-परीक्षण किया जाय तो उनका प्रभाव किसी क्षेत्र विशेष, वर्ग, समाज के किसी एक पक्ष तक सीमित कहा जा सकता है, पर नारी जागरण अभियान ऐसा है जिसमें समस्याओं के सभी पक्षों का समावेश होता है। जन-जन से इसका प्रगाढ़ सम्बन्ध है। वह मनुष्य मात्र को प्रभावित करता है। इसलिए उसे सार्वजनीन सार्वभौम भी कह सकते हैं। इतना ही नहीं इसके साथ अवांछनीयताओं का अत्यान्तिक समाधान भी जुड़ा हुआ है और उसे उज्ज्वल भविष्य की संरचना का महानतम आधार भी कहा जा सकता है।नारी के पिछड़ेपन का कारण कुछ भी हो सकता है। नारी की उदारता, सेवा और क्षमाशीलता उसका एक कारण हो सकता है। समर्थों द्वारा समय-समय पर अपनाया जाने वाला मत्स्य न्याय भी नारी पर आधिपत्य जमाने के लिए प्रोत्साहित करता है। प्रजनन का एकाकी उत्तरदायित्व वहन करते रहने के कारण उसकी विवशता भी उसे अधिकार सम्पादन से वंचित करती रही हो? पुरुष ने उद्धत कामुकता के रसास्वादन में अधिक लाभ देखा हो? आतताइयों के अपहरण से बचाने के लिए उसे सुरक्षा दी गई हो? आर्थिक दरिद्रता ने यह विषमता उत्पन्न की हो? सामाजिक कुप्रचलन उसके लिए उत्तरदायी रहे हों? जो भी हो, पर आज की स्थिति में उसके निवारण के ठोस प्रयास तत्काल होने चाहिए।समता मानवी न्याय की मौलिक मांग है। मानवी मौलिक अधिकारों से न किसी को वंचित किया जाना चाहिए न उनको किसी को अतिक्रमण करना चाहिए। विषमता के कारण समय-समय पर अधिक विग्रह उभरे हैं। संघर्ष हुए हैं और सुधार परिष्कार के आन्दोलन उभरे हैं। अपराधों के बढ़ने से लेकर ईर्ष्या उभरने तक यह विषमता ही प्रधान कारण रही है। जिसे अध्यात्मवाद कहते हैं, उसका प्रमुख प्रयोजन भी समता की उस स्थिति को उत्पन्न करना है जो सुव्यवस्था, एकता, प्रगति और शालीनता की जन्मदात्री है। जिओ और जीने दो की बात सोचने वालों को इस तथ्य को इच्छा या अनिच्छा से हृदयंगम करना ही पड़ेगा।नारी जागरण इस प्रयोजन को पूरा करने के लिए उभरा, मानवता का पक्षधर, न्याय की आकांक्षा से ओतप्रोत सार्वभौम आन्दोलन है। जिसका मन्तव्य एक ही है, उसे क्रियान्वित करने की क्षेत्रीय आवश्यकतायें भिन्न-भिन्न हो सकती हैं। उस दिशा में उठने वाले कदम धीमे और तेज हो सकते हैं। योजनायें भी अलग-अलग ढंग को बन सकती हैं, पर मानवी न्याय का सबसे बड़ा और सबसे व्यापक क्षेत्र वही है कि नर-नारी समता और एकता-जन्य सहकारी आधार पर सद्भावपूर्वक सज्जनोचित जीवन जियें।अच्छा हो इसके लिए वर्ग संघर्ष न उभरे। पाश्चात्य जगत में उफन रहे नारी मुक्ति आन्दोलन की तरह शोषित वर्ग को यह न कहना पड़े कि हम मुर्गियों की तरह मालिकों के लिए न जियेंगी। अनाचार अन्ततः विग्रह ही उभारता है और करने-स्वीकारने वाले दोषी को साथ लेकर स्वयं बेमौत मरता है। हर दिशा में इन दिनों औचित्य अपनाये जाने की मांग उठ रही है। इस समय की पुकार को दबाया न जा सकेगा। समय रहते इसका समाधान करना होगा।शोषितों को अपनी आवाज बुलन्द करनी पड़ी है, साथ ही शोषकों को भी न्याय देने के लिए झुकना पड़ा है। यथास्थिति बने रहने में दोष दोनों के सिर पर मढ़ा जा सकता है। अनीति करने वाले की तरह उसे सहने वाला भी दोषी होता है। आधी जनसंख्या अपने दर्प और स्वार्थ की पूर्ति करने के लिए दूसरे पक्ष को दबाव सहने के लिए बाधित करती है। आधी जनसंख्या इसे किसी कारण सहती है—असहयोग, आग्रह, अनुरोध कुछ भी नहीं करती। इसलिए प्रकारान्तर से दोषी वह भी बनती है, भले ही शोषित होने के नाते न्याय की सहानुभूति उसके पक्ष में जाती हो। आधी जनसंख्या शोषक, आधी शोषित रहे यह बहुत बुरी बात है। इसका अन्त करने के लिये जो उफान अन्तरिक्ष के गर्भ में उभर रहा है, उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। वह उफान आन्दोलन बनकर उभरे और समता की मांग करे, इसे समूची मानव जाति के सिर पर लगे कलंक का परिमार्जन ही कहना चाहिए।नारी जागरण, अनाचार के परिमार्जन का विश्वव्यापी आन्दोलन है। समता का पक्षधर सघन सहयोग जब भी बन पड़ेगा तब परस्पर खींचतान में लगी हुई शक्तियां मिल-जुलकर उस सृजन में संलग्न होंगी जिसके सत्परिणामों की कल्पना करने भर से पुलकन उत्पन्न होती है। समुन्नत नारी जब अपनी स्वाभाविक प्रतिभा से सम्पन्न होगी तो उसे पुरुष से किसी भी प्रकार कम नहीं वरन् हर क्षेत्र में अधिक सफल होते देखा जायेगा। अभी भी छात्रायें छात्रों की तुलना में अधिक संख्या व अच्छे नम्बरों से परीक्षा में उत्तीर्ण होती हैं। जब उन्हें समान सुविधा मिलने लगेगी तो उनके विकास की प्रक्रिया तेज होगी और तब वही वर्ग अधिक लाभान्वित होगा जो आज नारी वर्ग को प्रगति करने और विकसित होने में अपना घाटा समझकर अवरोध उत्पन्न करता है।नारी का जागरण और नर का उदात्तीकरण यह दोनों ही पक्ष मिल कर एक समग्र इकाई बनाते हैं। इसलिए वस्तुतः इसे दोनों पक्षों का प्रायश्चित और साथ ही क्षति पूर्ति के लिए किया गया सृजन प्रयास कहा जा सकता है। इसे महान परिवर्तन भी कह सकते हैं। यह प्रक्रिया चल पड़ने पर उसके दूरगामी परिणाम होंगे। एक आदर्श उभरेगा तो उसका प्रभाव अन्य क्षेत्रों पर भी पड़े बिना न रहेगा। अनेक दुष्प्रवृत्तियों का परिमार्जन, कुरीतियों और कुप्रथाओं का उन्मूलन होगा और समानान्तर सत्प्रवृत्तियों का संस्थापन अनायास ही चल पड़ेगा। व्यक्ति और समाज में इसकी असाधारण प्रतिक्रिया दृष्टिगोचर होगी। नीति निष्ठा अपनाने के लिए सभी क्षेत्रों में उमंग उभरेगी। एक के साथ दूसरा गति चक्र घूमने लगेगा। युग परिवर्तन का सुनियोजित आधार खड़ा होगा।इक्कीसवीं सदी महान परिवर्तनों की धुरी है। इसे राजनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री, विज्ञानवेत्ता और अध्यात्मवादी सभी वर्ग स्वीकार करते हैं। इस महान परिवर्तन का एक सबसे बड़ा पक्ष यह है कि अगली शताब्दी से आरंभ होने वाला नवयुग नारी प्रधान रहेगा। समाज की सभी शिक्षा धाराओं पर उनका वर्चस् होगा। इस नियति निर्धारण का कारण यह है कि नारी की श्रद्धा, सद्भावना, करुणा, उदारता, समूचे सत्ता तंत्र का मार्गदर्शन कर सकेगी। इन दिनों अनास्था, निष्ठुरता, उच्छृंखलता, संकीर्ण स्वार्थपरता, आक्रामकता जैसी दुष्प्रवृत्तियों ने ही संसार में अनेकानेक समस्यायें, विपत्तियां उत्पन्न की हैं, उन्हें प्रायः पुरुष वर्ग ने पनपाया है। भूतकाल में भी यही होता रहा है। तब भी महिला वर्ग ने सर्वत्र सदैव शालीनता और सद्भावना जीवित रखी है। अगले दिनों शान्ति और समाधान के लिए समन्वित भूमिका निभानी होगी। इसी बात को प्रकारान्तर से यों भी कहा जा सकता है कि नारी का देवत्व ही नवसृजन के उपयोग परिवर्तन की भूमिका सम्भव करेगा। अगली शताब्दी की प्रमुख घटना यह होगी कि नारी तत्व को अपने असली रूप में प्रगट होना ही होगा।इन दिनों नारी जागरण का महान आन्दोलन उपरोक्त सभी विसंगतियों को असंगतियों में बदलने के लिए हो रहा है, उसे उथला उफान अथवा बाजारू आन्दोलन न समझा जाय। इसके दूरगामी परिणाम को समझा जाय और माना जाय कि प्रस्तुत अभियान युग परिवर्तन की महती भूमिका सम्पन्न करने के लिए अवतरित हो रहा है।

