कुछ प्रारम्भिक और आवश्यक कदम
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नर और नारी के बीच विद्यमान भिन्नता-असमानता को मान्यताओं प्रचलनों में से उखाड़ना पड़ेगा। इनका आरम्भ हर परिवार अपने-अपने क्षेत्र में आरम्भ करके उसे व्यापक बना सकता है।पहल परिजनों से की जाय तो सरल पड़ेगा। नारी को सज-धजकर ऐसी आकर्षक बनाने का प्रचलन है जिससे वह अपने को किसी के हाथ का खिलौना बने रहने में अपनी सार्थकता समझे। नर भी उससे उत्तेजित-आकर्षित होता रहे। रंग-बिरंगे कपड़ों की अनेकानेक फैशनें इसीलिए चली हैं। आभूषणों का आकर्षण इसीलिए हुआ है। पशुओं के हाथ-पैरों में, गले में, नथुनों में रस्सी-जंजीर बांधी जाती है। गुलामों-कैदियों को भी इसी प्रकार जड़ा जाता है। संभव है वैसा ही कुछ नारी के सम्बन्ध में भी सोचा गया हो और उन्हें लोहे की न सही सोने-चांदी की जंजीरों से जकड़ा गया हो। पिछड़े कबीलों में नारी सीप, घोंघे, कांच, सिक्के, पंख आदि के आभूषण बनाकर उन्हें पहनती और प्रदर्शन करती हैं—यह आत्महीनता की अभिव्यक्ति है। लगता है ऐसी ही प्रवृत्ति जेवर पहनने के पीछे भी छिपी हुई है। इसमें नर और नारी की भिन्नता तो और भी भोंड़े रूप में प्रदर्शित होती है।जेवर जिस अंग पर पहने जाते हैं, उसकी रक्त संचार व्यवस्था में बाधा पहुंचती है। वे कठोरता लाते हैं और मैल जमा करते हैं। पैसा रुकता है और टूट-फूट से, घिसते रहने से पूंजी गलती जाती है। यदि वह बैंक में जमा किया जाता तो ब्याज मिलती। चोरी होने–खोने का खतरा न रहता। न अहंमन्यता उठती और न ईर्ष्या भड़कती। जेवर पहनने में तो यह सभी हानियां जुड़ी हुई हैं। नाक के जेवर तो सबसे भोंड़े लगते हैं, उनके कारण सांस में अवरोध पड़ता है। कफ सूखता है और उसमें भरता रहता है। जो पहनते हैं तो उन्हें सीप, घोंघे से, धुंधची, कांच से बने जेवर भी सुहाते हैं, पर सभ्य जन उसमें भोंड़ापन ही देखते हैं। संसार के सभ्य देशों में कहीं कोई नाक-कान नहीं छेदता, उनकी दृष्टि में यह सज्जा असभ्य लोगों जैसी ही दीखती होगी—हम भले ही उसमें सुन्दरता की कल्पना करें।यही बात आकर्षण के उद्देश्यों से पहने गये भिन्न-भिन्न फैशन वाली पोशाकों के सम्बन्ध में भी है। पहनने वाले इनके कारण भले ही इतराते और इठलाते चलते हों, पर समझदारों की दृष्टि में इसे स्वांग-नाटक के पात्रों द्वारा ओढ़ा हुआ आडम्बर ही माना जायेगा। इसमें पैसा भी ढेरों व्यर्थ ही खर्च होता है, जबकि वे रोज पहने जाते नहीं। यह प्रवृत्ति नर-नारी दोनों के लिए खराब है किन्तु नारियों में तो यह अत्यधिक है। इससे नारी की हैसियत आकर्षक गुड़िया-खिलौने जैसी बनती है—यह उसकी स्वाभाविक महानता का प्रत्यक्ष उपहास है।समता के युग में नर और नारी के परिधानों में इतना कम अन्तर रहना चाहिए जिससे उनकी समता-एकता में कोई अड़चन न पड़ती हो। अपने देश में मर्द आमतौर से धोती-कुर्ता पहनते हैं। महिलायें भी धोती को अपने ढंग से पहन सकती हैं। कुर्ता लम्बा न सही छोटा पहन सकती है, पर उनकी सिलाई ऐसी न हो जिससे भोंड़ा अंग प्रदर्शन होता हो। पेट-सीना आदि को खुला दीखने वाले वस्त्रों की अपेक्षा ब्लाउज भी ऐसे हों जो छोटे कुर्ते की आवश्यकता पूरी कर सकें। जेवरों की भरमार तो समाप्त होनी ही चाहिए इतना न बन पड़े तो भी उनका उपयोग कम से कम किया जाय। अगली पीढ़ी की लड़कियों के नाक-कान न छिदवाये जायं तो ठीक है। क्योंकि अगले दिनों उस प्रचलन को पिछड़ेपन का चिन्ह माना जाने लगेगा। नर और नारी की समता का आरम्भ वस्त्राभूषणों की अवांछनीय विडम्बना हटाने के साथ किया जाय तो वह आर्थिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टि से अच्छा ही रहेगा।जेवरों से नारी का शरीर सजाने की अपेक्षा परिवार के सभी सदस्यों का व्यक्तित्व सद्गुणों से सजाने का प्रयास किया जाय। इसके लिए परिवार निर्माण के पंचशीलों को आधार बनाया जा सकता है। वे इस प्रकार हैं—(1) श्रमशीलता (2) शिष्टता (3) मितव्ययता (4) सुव्यवस्था (5) सहकारिता। इन्हें अपनाने वाले घर ही सुयोग्य सुसंस्कृत नागरिकों की निर्माण करने वाली खदान बन सकते हैं, इन्हें सिखाने के लिए मौखिक उपदेश विशेष कारगर सिद्ध नहीं होते। इन सद्गुणों को साथ-साथ काम करते हुए उनको व्यावहारिक स्वरूप में उतारा और स्वभाव का अंग बनाया जा सकता है। नर नारी मिलकर काम करें, बच्चे भी उनमें सम्मिलित रहें। बच्चे उसे ध्यानपूर्वक देखते रहें तो उनके स्वभाव में उपरोक्त पंचशीलों का समावेश सहज रीति से होता रह सकता है और बड़े होने पर गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्ट से अधिक सुसंस्कृत बन सकते हैं, सुखी और समुन्नत जीवन यापन कर सकते हैं। इस प्रकार साथ-साथ काम करने की परम्परा बच्चों को अधिक सद्गुणी बनाने में सहायक हो सकती है।घर का काम-काज तुच्छ दृष्टि से देखा जाता है, उसी को करते रहने के कारण स्त्रियों का मूल्यांकन हल्का किया जाता है। बाहर का व्यवसाय-उपार्जन, जन सम्पर्क का काम, योग्यता और वरिष्ठता का चिन्ह माना जाता है। इस पत्थर की लकीर को भी हटाया और घटाया जाना चाहिए। गृह कार्यों को नर नारी मिल-जुलकर निपटायें। बाहर के कामों में भी नारी का सहयोग लिया जाय। इस आधार पर दोनों पक्षों की योग्यता दोनों क्षेत्रों में बढ़ेगी और सहकारिता का, समता का पथ प्रशस्त होगा। प्रगतिशील पुरुषों को चाहिए कि गृह कार्यों में महिलाओं का हाथ बंटायें, साथ दें। सभी काम मिल-जुलकर करें, अच्छा यही है कि भोजन आदि के समय भी साथ रहें। जिस काम में महिलाओं का सारा दिन गुजर जाता है वह आपसी सहयोग से कुछ ही समय में निपट जायेगा और बाहरी काम में दोनों के सम्मिलित रहने में जो कठिनाई प्रतीत होती है वह भी न रहेगी।गरम भोजन करने की आदत तभी सध सकती है जब सभी का समय एक हो। कोई कभी-कोई कभी गरम भोजन करना चाहे तो इस झंझट में चौका देर तक चलाना पड़ेगा और उसे सम्हालने वाला इसी निमित्त घिरा बैठा रहेगा, वह दूसरा कोई उपयोगी काम न कर सकेगा। महिलाओं में से अनेकों का समय इसी कारण बर्बाद होता रहता है—यह प्रचलन बदलना ही पड़ेगा। जो नियत समय पर चौके में नहीं पहुंच सकें वे गरम खाने का मोह छोड़ें और अपने लिए सुरक्षित रखा भोजन जब भी इच्छा व अवकाश हो तब कर लें। गरम और ठण्डे भोजन में स्वाद का अन्तर भले ही हो—गुणों की दृष्टि से अन्तर नहीं पड़ता। जहां वह बन्धनकारी आदत जड़ जमाये हुए हैं, वहां उसमें परिवर्तन करना चाहिए। चौका नियत समय पर ही चलना और नियत समय पर ही बन्द होना चाहिए, जिससे किसी की प्रतिक्षा में अनावश्यक बैठकर समय, श्रम और ईंधन बेकार न करना पड़े।नारी प्रगति का आन्दोलन यह अपेक्षा रखेगा कि महिलाओं को अन्य उपयोगी कार्यों के लिए समय मिले। वे घरेलू खिच-खिच में ही पूरा समय बर्बाद न करती रहें। इन उद्देश्यों को सुनिश्चित रूप से सम्पन्न करने के लिए सहकारी निर्वाह की ‘‘लार्जर फेमली’’ की परिपाटी अपनानी होगी। बृहत्तर परिवार ही समय की, शक्ति की, धन की बर्बादी को बहुत हद तक रोक सकने में समर्थ हो सकते हैं।हर महिला को सारे दिन बच्चों के रख-रखाव में ही जुटा रहना पड़ता है। यदि कई परिवार मिलकर बच्चे खिलाने की एक सामूहिक व्यवस्था कर लें तो बालकों का सुनियोजित विकास भी बन पड़ेगा और उन्हें खेलने, साथ रहने और सीखने का अवसर भी अधिक मिलेगा। इसी प्रकार भोजन पकाने, कपड़े धोने, सफाई करने आदि के लिए भी यदि भरोसे के अधिकारी रखे जा सकें और सहकारी स्तर बन सके तो ढेरों समय—जो इन छोटे कामों में हर महिला को खर्च करना पड़ता है, उसमें भारी बचत हो सकेगी। पैसा तो निश्चित रूप से बचेगा, सभी को सुविधा और निश्चितता भी रहेगी। उन गरीबों को काम मिलेगा जो कोई बड़ा काम कर सकने के योग्य नहीं है। अगले प्रगतिशील युग में परिवारों का सूत्र संचालन उपरोक्त ‘‘वृहत्तर परिवार’’ योजना के अनुसार ही संभव होगा। महत्वपूर्ण कार्य कर सकने का इससे अच्छा अवसर मिल भी नहीं सकता। विशेषतया सुयोग्य महिलायें अपनी प्रतिभा के अनुरूप उपयोगी कार्य और अधिक अच्छी तरह कर सकेंगी। देर सवेर में मानवी बुद्धिमत्ता परिवार व्यवस्था के लिए ऐसे ही तंत्र का चुनाव करेगी। अभी भी विकसित देशों में शिशु पालन और भोजन व्यवस्था के लिए ‘लार्जर फेमली’ प्रक्रिया ही पूरी या आंशिक रूप में अपनाई गई है। भविष्य में तो इसे अपनाये बिना और कोई चारा भी न रहेगा। पुराने समय में संयुक्त परिवार इसी आधार पर चलते थे। इन दिनों उनमें अस्त-व्यस्तता और अव्यवस्था छा जाने से ही लोग अलग-अलग परिवार बसाने लगे हैं—यह एक प्रकार का विद्रोह ही है। अगले दिनों हर क्षेत्र में सहकारिता की नीति ही अपनानी पड़ेगी। इसी को कम्यून पद्धति कहा गया है। हर व्यक्ति और हर परिवार के लिए यह सुविधाजनक एवं उपयोगी सिद्ध हो सकती है। महिला समुदाय को सर्वतोमुखी प्रगति के लिए अग्रसर होने में तो इसी स्तर की रीति-नीति अपनानी होगी।बाल विवाह मनुष्य जाति के लिए एक अभिशाप है। इसमें सभी को सर्व प्रकार हानि है। लड़कियों पर तो एक प्रकार से वज्रपात ही है, उन्हें शारीरिक-मानसिक दृष्टि से विकसित होने का जो समय मिलता है वह उठती उम्र का ही समय है। यदि उन्हीं दिनों विवाह हो जाय तो समझना चाहिए कि जीवन भर के लिए उनकी प्रगति का द्वार बन्द हो गया। इसी दृष्टि से सरकारी कानून में अट्ठारह वर्ष से कम आयु की लड़कियों की और इक्कीस वर्ष से कम आयु के लड़कों का विवाह रोका गया है। वस्तुतः इससे कहीं अधिक आयु में ही विवाह की बात सोची जानी चाहिए।नारी को समर्थ और सुयोग्य बनाने के लिए आवश्यक है कि लड़कियों के विवाह में उतावली न की जाय। किशोरावस्था समर्थता—संपादन का समय है, उसे गृहस्थ का भार लाद कर बेतरह बर्बाद न होने दिया जाय। जिन्हें लड़कियों के भविष्य का ध्यान है, उनमें लड़कों के जितनी ही योग्यता-सम्वर्धन के प्रयत्न किए जायं और तब तक उन्हें विवाह के लिए मजबूर न किया जाय। अपने समाज में किशोरी होते-होते लड़कियों का विवाह कर दिया जाता है। कहा जाता है कि बड़ी होने पर उसे अच्छे लड़के या तो मिलेंगे नहीं या मिलेंगे तो उनके दाम महंगे होंगे। इन दोनों समस्याओं का हल मात्र बाल विवाह ही नहीं है। एक मार्ग यह भी है कि लड़की से कम उम्र के लड़के के साथ विवाह कर दिया जाय। वयस्क होने के उपरान्त दोनों में से किसी के थोड़े बहुत छोटे-बड़े होने से अन्तर नहीं पड़ता। महात्मा गांधी, महर्षि कर्वे, नैपोलियन, लिंकन सभी की पत्नियां उम्र में उनसे बड़ी थीं। बड़े-छोटे होने की मानसिकता के पीछे कोई वजनदार तर्क-तथ्य नजर नहीं आता। योग्यता, वरिष्ठता के आधार पर ही लड़के को बड़ा होना देखा जाता है। यदि लड़की की योग्यता—अनुभव अधिक हो तो इसका लाभ लड़के को सहज ही मिलना सम्भव है। इसी लाभ और उपादेयता के आधार पर ‘बड़ी बहू बड़े भाग्य’ की कहावत आज तक प्रचलित है। प्रगतिशील विचारधारा के लोग इसमें कोई हानि या दोष नहीं देखते। यदि सुयोग्य लड़के बहुत महंगे मिलते हों तो यह क्या बुरा है कि कम योग्य लड़कों के साथ सुयोग्य लड़कियों का विवाह कर दिया जाय। जिस प्रकार विचारशील लड़के अपनी बहुओं को सुयोग्य बना लेते हैं, उसी प्रकार यह भी हो सकता है कि सुयोग्य लड़कियां अपने से कम योग्य लड़कों को अपनी योग्यता के बल पर अधिक योग्य एवं कमाऊ बना लें।विवाह के उपरान्त कुछ वर्ष ऐसे होते हैं जिनमें पिता के घर हुई प्रगति को नव वधू आगे बढ़ा सकती है और अपने लिए, परिवार के लिए, सम्पूर्ण समाज के लिए अधिक महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती है। अच्छा हो विवाह के उपरान्त कम से कम पांच वर्ष अगली प्रगति के लिए सुरक्षित रखे जायं और उस अवधि में सन्तानोत्पादन से बचा जाय।इस प्रसंग में एक बात और भी ध्यान रखने योग्य है कि जिन्हें नारी प्रगति का महत्व प्रतीत होता हो वे अधिक बच्चे उत्पन्न न करें। किसी जमाने में अधिक सन्तान का होना सौभाग्य माना जाता था, पर अब ऐसी स्थिति नहीं रही। जनसंख्या इतनी अधिक बढ़ गई है कि उसके निर्वाह के साधन कम पड़ने लगे हैं। यदि बाढ़ रुकी नहीं तो व्यक्ति और समुदाय सभी को ही संकट का सामना करना पड़ेगा।अधिक संतानोत्पादन से जननी का स्वास्थ्य खोखला होता है। पिता पर आर्थिक भार बढ़ता है। परिवार की सुविधा सामग्री में कटौती होती है। बच्चों को समुचित दुलार और समुन्नत होने का अवसर नहीं मिल पाता। इन सारी कठिनाइयों के रहते महिलाओं को प्रगतिशील होने का अवसर नहीं मिल पाता।प्रथा-परम्परायें तो इस सन्दर्भ में अभी अनेकों बदलनी पड़ेंगी। जिनमें से एक जाति-पाति, ऊंच-नीच के कारण बात न बनने का व्यवधान भी है, प्रगतिशीलता के इस माहौल में इस प्रकार के अड़ंगे बने रहे तो सुयोग्य जोड़े सरलतापूर्वक बन सकने की आवश्यकता इन दिनों की तरह जटिल ही बनी रहेगी। जोड़े गुण, कर्म, स्वभाव के आधार पर मिलाने चाहिए न कि जन्म कुण्डलियों की बाधा खड़ी करके अनेकों अवसर चुका देने की भूल आगे भी चलते रहने का अन्धविश्वास गले लगाकर।नारी प्रगति के साथ ऐसी अनेकों मूढ़ मान्यताओं का अन्त होगा जो प्रकारान्तर से इस मार्ग में अड़ंगा बनकर रही हैं। ये अवरोध जब तक बने। रहेंगे तब तक अभीष्ट उद्देश्य पूर्ति की आशा नहीं की जा सकती। नारी को उपरोक्त अवरोधों से उबारा जा सके और मानवीय गरिमा से सुसज्जित किया जा सके तो मानवता के प्रति सबसे बड़ा न्याय और सबसे बड़ा उपकार और समाज का पुनरुद्धार होगा।

