बड़े कदम भी उठने चाहिए
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बनी वस्तु को बिगाड़ना सुगम है, पर बिगड़ी को बनाना कठिन। माचिस की एक तीली झोपड़ियों वाले किसी गांव को पूरी तरह स्वाहा कर सकती है। यदि उसे फिर नये सिरे से बनाना हो तो ढेरों समय, श्रम, कौशल और साधन चाहिए। जब कि जलाने वाला उस विनाश कार्य को सेकेंडों में ही कर डालता है। नारी समस्या के बारे में भी यही बात है, उसे वरिष्ठता के उच्च शिखर से दुर्गति के गर्त में जिसने धकेला—उसी तुलना में प्रयास हजारों-लाखों गुने अधिक समर्थ और विस्तृत होने चाहिए, जिनसे कि पुनरुत्थान का प्रयोजन पूरा किया जा सके।इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए असंख्यों ऐसे भावनाशील नर-नारियों की तत्परता नियोजित होनी चाहिए, जिन्हें प्रस्तुत अवांछनीयता को हटाने और उज्ज्वल भविष्य के निर्धारण का महत्व विदित है। ऐसे लोग अपने घरेलू कार्यों को यथासम्भव जल्दी निपटाने का प्रयत्न करें और युग की इस महती आवश्यकता को पूरा करने के लिए जुट पड़ें। इसके लिए दो कार्य प्रधान हैं—एक जन सम्पर्क साधना, दूसरा उत्साह भरा वातावरण बनाना।नारी पुनरुत्थान के संदर्भ में प्रारम्भिक और अनिवार्य कदम क्या उठे, किस प्रकार उठे?—इसकी चर्चा पिछले पृष्ठों पर हो चुकी है। इतना आवश्यक तो है पर पर्याप्त नहीं। इतिहास का सबसे बड़ा एवं समस्त जनसमाज को प्रभावित करने वाला आन्दोलन होने के नाते कितने ही बड़े कदम उठाने भी आवश्यक हैं। बड़े काम के लिए बड़े आयोजन और बड़े साधन आवश्यक होते हैं।आन्दोलन की पृष्ठभूमि और उसकी क्रिया-प्रक्रिया का अभ्यास कराने के लिए अभी शांतिकुंज में एक महीने के महिला प्रशिक्षण सत्र चलते हैं। उनमें प्रायः डेढ़ सौ शिक्षार्थियों के निवास, प्रशिक्षण एवं भोजन की निःशुल्क व्यवस्था रहती है, पर यह तो एक छोटा शुभारम्भ मात्र मार्गदर्शन की एक छोटी इकाई कहा जा सकता है। ऐसे सत्रों की हर क्षेत्र में व्यवस्था होनी चाहिए ताकि स्थानीय सेवाभावी उसका लाभ अपने घर का कामकाज निपटाते हुए भी उठा सकें। व्यापक आवश्यकता की पूर्ति के लिए सृजन शिल्पियों की हर क्षेत्र में बहुत बड़ी आवश्यकता है। शांतिकुंज स्तर के सत्रों की व्यवस्था बड़ी संख्या में हर क्षेत्र में होनी चाहिए।भारत की परिस्थितियों के साथ तालमेल खाता हुआ साहित्य अभी नाममात्र का छपा है। इस अभाव की पूर्ति के लिए एक ऐसा समर्थ तन्त्र खड़ा होना चाहिए जो समस्या के अनेकानेक पक्षों पर उपयोगी साहित्य लिखने-छापने और बेचने की सुनियोजित व्यवस्था को अग्रगामी बना सके। यह सृजन देश की सभी भाषाओं में होना चाहिए। इस प्रयोजन के लिए संगीत सृजन का कार्य भी हाथ में लिया जाना चाहिए। हर भाषा में गीत लिखे जायें। लोक संगीत का अभ्यास कराने के लिए स्थान-स्थान पर संगीत शालाओं की स्थापना भी होनी चाहिए, जिसमें शिक्षितों-अशिक्षितों को उनके स्तर का लाभ मिले।इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए हजारों की संख्या में जीवनदानी कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होगी। उनके प्रशिक्षण और निर्वाह की वैसी ही व्यवस्था होनी चाहिए जैसी कि प्राचीनकाल के वानप्रस्थ आश्रमों—तीर्थों और आरण्यकों में हुआ करती थी। इसके लिए आवश्यक साधन जुटाना भी एक बड़ा काम है, जिनके लिए साधन सम्पन्नों का ध्यान आकर्षित किया जाना चाहिए और उनकी उदारता को झकझोरा जाना चाहिए।परित्यक्ताओं, निराश्रितों, असहायों, विधवाओं के लिए ऐसे आश्रय स्थल बनने चाहिए जिन्हें ‘बाप का घर’ कहा जा सके। उनमें निराश्रित महिलाओं के लिए निवास की, शिक्षा की व्यवस्था तो हो ही, साथ ही ऐसे उद्योग तंत्र भी उनके साथ जोड़े जायं जिनसे वे अपनी आजीविका की अधिकांश पूर्ति अपने पुरुषार्थ के आधार पर कर सकें। जो कमी पड़े उसका भार समाज वहन करे। इनके बच्चों को भी शिक्षित, स्वावलम्बी बनाने का प्रबन्ध किया जाय। इन आश्रमों को विकसित अनाथाश्रमों की संज्ञा दी जा सकती है।अनेकों उद्योगों को खड़ा करने वाले आधार इन दिनों प्रचलन में हैं। स्थान-स्थान पर ऐसे उद्योग तंत्र भी खड़े किये जायं जिनमें स्थानीय महिलायें अपने बचे हुए समय का सदुपयोग कुछ कमाने में कर सकें, साथ ही कुछ शिक्षा भी प्राप्त करती रह सकें। ऐसी उद्योगशालायें नारी जागृति की महती भूमिका सम्पादित करती रह सकती हैं। यह प्रयास सहकारी समितियों जैसे आधार पर खड़े किये जा सकते हैं। इनका विनिर्मित माल लोग उसी भावना से लेंगे जैसे असहयोग आन्दोलन के जमाने में खादी को प्रधानता दी गई थी।प्रचार के लिए इन दिनों पत्र-पत्रिकाओं और फिल्में असाधारण प्रभाव के साथ उभर रही हैं। महिला समस्याओं से जन साधारण को अवगत कराने के लिए सभी भाषाओं में ऐसी पत्रिकायें निकल सकती हैं और फिल्में बन सकती हैं। जहां सम्भव हो वहां रेडियो-टेलीविजन को भी इस ओर ध्यान देने के लिए सहमत किया जाय।प्रयाग महिला विद्यापीठ ने एक समय महिला शिक्षा के लिए उपयोगी पाठ्यक्रम बनाये थे और उनको पढ़ाने, परीक्षायें लेने का प्रबन्ध किया था। सरकारी मान्यता के फेर में वह तन्त्र लड़खड़ा गया। इसे फिर से विशुद्ध जनाधार पर खड़ा किया जा सकता है। भले ही सरकारी मान्यता उसे न मिले, पर इसे अपनाकर इस संदर्भ का समुचित ज्ञान शिक्षित समुदाय तक नये उत्साह के साथ पहुंचाया जा सकता है।बड़े फिल्म निर्माता शायद कम लाभ होने की आशंका से इस क्षेत्र में प्रवेश करने से झिझकें, पर सोलह मिलीमीटर की फिल्में तो निजी उद्योग के रूप में भी बन सकती हैं और उन्हें दिखाने के लिए जगह-जगह खुले सिनेमाघर खुल सकते हैं। जिनमें प्रवेश निःशुल्क हो, पर उस संस्थान को हर सदस्य कुछ मासिक शुल्क अदा करें जिससे स्थानीय सिनेमाघर की व्यवस्था भी चले और दूसरी ओर नई फिल्में बनते रहने का उपक्रम भी नियमित रूप से चलता रहे। लोकसेवी समुदाय यदि इस कार्य को भी हाथ में ले लें तो समानान्तर सिनेमा प्रदर्शन की प्रक्रिया देहातों कस्बों में भी योजनाबद्ध रूप से खड़ी की जा सकती है। महाराष्ट्र सरकार ने ऐसा कुछ सोचा और किया भी है, अन्य सरकारें भी लोक शिक्षण के लिए यह कदम उठा सकती हैं। समाजसेवी संस्थाओं के लिए भी यह एक करने योग्य बड़ा काम है।नारी उत्पीड़न के विग्रहों से निपटने के लिए पुरातनकाल जैसी पंचायतें फिर जीवित और सक्रिय हों। सामाजिक दबाव भी कम सशक्त नहीं है, उसे पुनर्जीवित किया जाये तो इस प्रकार के अनाचार से स्थानीय स्तर पर निपटा जा सकता है। आवश्यकतानुसार इसके लिए धरना देने वाला स्वयंसेवक दल भी गठित किया जाता हैं। जहां कानूनी सहायता की आवश्यकता है, वहां उसके लिए भी यह तंत्र कारगर भूमिकायें निभा सकता है। इसके लिए उदार वकीलों से बिना फीस काम करने के लिए भी अनुरोध किया जा सकता है। सरकारी या गैर सरकारी पंचायतें अनेक क्षेत्र में नारी उत्पीड़न से निपटने के लिए समर्थता प्राप्त करें।यह कुछ सुझाव हैं जिन्हें जन सहयोग से खड़ा किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त भी बहुत-सी बातें ऐसी और प्रयोग में लाई जा सकती हैं। यों सरकारी विभाग भी इन प्रसंगों में कुछ सुविधा जुटाने का प्रयत्न करते रहते हैं। अफसरों की ढिलाई से उनका समुचित लाभ तो जनता को नहीं मिल पाता, फिर भी जहां वैसे प्रयत्न चल पड़े हों उनसे यथासम्भव सहायता लेनी चाहिए।विश्व की किन्हीं भी समस्याओं पर राजनीति, धर्म, विज्ञान, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र आदि के माध्यम से प्रकाश डाला जा सकता है, विवेचना हो सकती है। इन दिनों यह होना चाहिए कि नारी को माध्यम मानकर व्यक्ति, परिवार और समाज में सम्बन्धित सभी समस्याओं पर प्रकाश डाला जाय और उनके समाधान में विकसित नारी का क्या योगदान हो सकता है?****समाप्त*

