आरम्भ अपने घर से किया जाय
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
महिला जागरण के लिए, उस वर्ग को समुन्नत बनाने के लिए कई संगठन पिछले दिनों उत्साहपूर्वक कार्य करते रहे हैं। सरकारी विभाग भी इस निमित्त बजट में अच्छी राशि रखते हैं, पर कुछ कहने लायक काम नहीं हो पाता। कागजी कार्यवाही भर चलती रहती है। छुट-पुट आयोजन सम्मेलन होते रहते है। थोड़ी बहुत उपस्थिति हो जाती हैं। भाषण, उद्घाटन आदि की रस्में पूरी होती हैं। समाचार छपते हैं, लैटर पैड बनते हैं, साइन बोर्ड भी लगाये जाते हैं, पर जब कभी ठीक काम करने का अवसर आता है तो गाड़ी यहां आकर रुक जाती है कि कार्य महिलाओं को करना है और वे अपने-अपने घरेलू काम-काजों में इस प्रकार व्यस्त रहती हैं कि उन्हें न तो बार-बार एकत्रित होने का अवसर रहता है, न घर वाले उन्हें इसके लिए छूट देते हैं। जब तब की बात दूसरी है, पर जुटकर इस प्रयास में संलग्न रहने के लिए नियमित समय कौन किस प्रकार निकाले? यदि उसकी व्यवस्था न बने तो फिर आन्दोलन गति किस प्रकार पकड़े? इसी शिथिलता की चट्टान से टकराकर अक्सर प्रगति प्रयासों की नावें डूबती रहती हैं। ऊपर से थोपे हुए आन्दोलन जीवित नहीं रह सकते। उथली जड़ों को गहराई तक प्रवेश कराना चाहिए। वह इसलिए नहीं बन पाता कि न बड़ी संख्या में महिलायें आगे आती हैं, न पुरुष वर्ग उनके लिए सहयोग के खाद पानी की व्यवस्था बना पाता है।इस संदर्भ में कारगर कदम उठाने के लिए शान्ति कुञ्ज का साहस इसलिए हुआ है कि उसने पिछले पचास वर्षों से इसके लिए कुछ सोचा, किया, वातावरण बनाया और अनुभव सम्पादित किया है। इस आधार पर मान्यता बनी है कि इस बार अधिक गहरे संकल्प के साथ जो कदम उठाये जा रहे हैं, उसके कुछ ऐसे ठोस परिणाम निकलेंगे जो वातावरण में नया प्रवाह उत्पन्न कर सकेंगे।अखण्ड ज्योति मासिक पत्रिका अपनी टहनियों-सहेलियों समेत लगभग पांच लाख की संख्या में हर माह छपती है। इनका प्रत्येक अंक उस परिवार के लोगों, पड़ोसियों, सम्पर्क के लोगों द्वारा न्यूनतम पांच की संख्या में अत्यन्त रुचिपूर्वक अवश्य पढ़ा जाता है। इस प्रकार पांच लाख ग्राहक पच्चीस लाख पाठकों में विकसित हो जाते हैं। यही है शान्ति कुञ्ज का प्रज्ञा परिवार। जिसे प्रगतिशील प्रबुद्ध लोगों के परिकर कह सकते हैं। इन्हें लम्बे समय से विचार क्रान्ति की शिक्षा दी जाती रही है। नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक सुधार परिष्कार के लिए हर पाठक को प्राण प्रेरणा से भरा पूरा प्रोत्साहन सतत् दिया जाता रहा है। इसी का प्रभाव है कि सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन की दिशा में इतने ठोस काम होते रहे हैं, जिन पर अजनबी के लिए तो महज विश्वास करना तक कठिन हो जाता है।युग निर्माण योजना मथुरा में नव जीवन के भाव संचार को प्राण फूंकने वाला साहित्य छपता है और संगठन के लिए अभिनव प्रयास होता रहता है। देश के कोने-कोने में इस प्रबल प्रदाह को अग्रगामी बनाने के लिए हजारों प्रज्ञा केन्द्र चल रहे हैं और उनमें समयदानी कार्यकर्ता अपने-अपने क्षेत्र में युगान्तर चेतना आलोक वितरण करने के लिए कार्य करते रहते हैं। यही है वह जन शक्ति जिसके द्वारा एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य देने का उपक्रम नव निर्माण की अनेकों योजनाओं को अग्रगामी बनाता रहा है। इसी परिकर को नये सिरे से नारी जागरण का कार्य सौंपा गया है। सभी से कहा गया है कि वे अपने प्रभाव क्षेत्र में, विशेषतया अपने निजी परिवार में, महिला जागरण के लिए वातावरण बनायें। ठोस प्रयास आरम्भ करें। आशा की गई है कि इस आधार पर हजारों की संख्या में छोटे-बड़े संगठन खड़े होंगे और इस दायित्व का समग्र उत्साह के साथ पालन करेंगे।इस कार्य के लिए सर्वत्र संगठन खड़े किए जाने चाहिए। अच्छा होता बड़े संगठन बनते। पर आज के जनमानस को देखते हुए अपने देश में बड़े संगठनों का सफल होना कठिन ही दिखाई देता है। पिछड़े लोगों को जब भी उभरने का मौका मिला है तो वे तुरन्त महत्वाकांक्षी हो उठते हैं। अहंता की पूर्ति के लिए आकुल-व्याकुल हो उठते हैं। अपने स्वार्थ के लिए साथियों की टांग पकड़कर पीछे खींचते हैं। मनोमालिन्य बरतते हैं और अन्त में उस संगठन को तहस नहस करने पर उतारू हो जाते हैं, जिसे बनाने में कभी उनने योगदान दिया था। अनेक उपयोगी संस्थाओं का अपने देश में इसी आधार पर सर्वनाश होते देखा गया है। लम्बे समय से अर्जित इस कटु अनुभव के आधार पर वर्तमान परिस्थितियों में अपने देश के लिए यही उपयुक्त समझा गया है कि छोटे-मोटे संगठन बने। उनमें एक मन के घनिष्ठता वाले व्यक्ति पांच की संख्या में एकत्रित हों। ऐसी इकाइयां एक क्षेत्र में अनेकों हो सकती हैं। जरूरत पड़ने पर मिलकर वे बड़े काम कर सकती हैं। नारंगी, कटहल के छोटे-छोटे घटक अलग-अलग होते हुए भी मिलकर समूचे फल के रूप में अपनी एक पहचान बनाये रहते हैं। छोटे-छोटे संगठन मिल-जुल कर क्षेत्र बांट लें और समय आने पर अपनी सम्मिलित शक्ति का प्रदर्शन करते रहें।इस प्रयोजन के लिए एक से पांच, पांच से पच्चीस की युक्ति का अपनाया जाना अधिक श्रेयस्कर रहेगा। एक प्रतिभा उभरे और अपने जैसे चार और समीपवर्ती लोगों को मिलाकर एक इकाई बना ले। वही पांच व्यक्ति अपने-अपने चार साथी ढूंढ़ें। इस प्रकार पांच सदस्यों को पच्चीस में विकसित होने में कोई कठिनाई नहीं होगी और सीमित क्षेत्र निर्धारित कर कार्य करने पर उसके ठोस परिणाम निकलेंगे। पच्चीस लाख का परिकर यदि पच्चीस-पच्चीस के संगठनों में विभाजित हो तो एक लाख युनिट बनते हैं। यह बहुत बड़ी संख्या है। लहरें उठती हैं तो उनके दबाव से और भी नयी उठती जाती हैं। उनके प्रभाव से सारा जलाशय हलचल से भर जाता है। अपने संगठन से ऐसे ही अन्यान्य घटकों का निर्धारण करते हुए समूचे समाज को प्रभावित कर सकते हैं। एक में अनेक होने की उक्ति सही अर्थों में चरितार्थ हो सकती है। इतने संगठन घटक न बन सकें, उसके चौथाई भी बनें तो भी उनकी क्षमता एक शक्तिशाली आन्दोलन का आधार बन सकती है।हर नारी सदस्य और नर संरक्षक को न्यूनतम योगदान प्रस्तुत करना पड़ता है। उसमें एक घण्टे का समयदान और दस पैसे नित्य का अंशदान आवश्यक रखा गया है। एक लाख घण्टे 12 हजार कार्य दिनों के बराबर होते हैं। इतनी जन शक्ति इस कार्य में प्रतिदिन लगे और उनके सहारे ठोस काम हर दिन होता रहे, तो स्पष्ट है कि महीने में, वर्ष में कितनी अधिक प्रगति प्रक्रिया सम्पन्न हो सकेगी। इसी प्रकार अंशदान के दस पैसे इकट्ठे होते रहें और अपने-अपने क्षेत्र में अभियान के लिए आवश्यक साधन जुटाते रहें तो उतने भर से पुनरुत्थान के साथ जुड़े हुए। अनेकों काम पूरे हो सकते हैं।इस संदर्भ में सबसे पहला कार्य भावना क्षेत्र में परिवर्तन का होना चाहिये। हर प्रगतिशील को अपने परिवार में, सम्पर्क क्षेत्र में ऐसा वातावरण बनाना चाहिये जिसमें नर-नारी को समता की दृष्टि से देखा जाय। दोनों को समान सम्मान मिले। इसके लिए पुरुष को पहल करनी चाहिये और नारी को यह दायित्व सम्हालने के लिये आवश्यक क्षमता उत्पन्न करने के लिये तैयार रहना चाहिए। उन्हें समझना और समझाया जाना चाहिये कि ‘‘ईश्वर भी उन्हीं की सहायता करता है जो अपनी सहायता आप करने के लिये तत्परता प्रदर्शित करते हैं।’’ थोपी गई प्रगतिशीलता न तो गहराई तक उतरती है न उसे समग्र रूप से फलित होने का ही अवसर मिलता है। इसलिये नर को जहां उदार एवं विचारशील बनना है, वहीं नारी को गिरी स्थिति से ऊपर उठने के लिये तो प्रयास स्वयं भी करना पड़ेगा। उसके लिये आवश्यक उत्साह उभारने के लिए सच्चे मन से प्रयत्न करना चाहिये। नारी जागरण के लिए शान्ति कुञ्ज परिवार का हर सदस्य, नर-नारी इस अभिनव संकल्प को पूरा करने के लिये अपने निजी दृष्टिकोण और जीवनचर्या में अधिकाधिक परिवर्तन करने की पहल करे।नर-नारी के मध्य ममता की स्थिति उत्पन्न करने के लिये यह आवश्यक है कि दोनों को समान महत्व मिले। कन्या पुत्र में कोई अन्तर न माना जाय। न कोई कन्या जन्म पर उदासी अनुभव करे और न पुत्र जन्म पर बधाई गाये। दोनों को दो नेत्रों की तरह अत्यन्त महत्व का माना जाय। उन्हें हर स्तर की समान सुविधा उपलब्ध करायी जायें। दुलार, सम्मान में ही नहीं शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलम्बन, कौशल की दृष्टि से भी लड़के और लड़कियों को समान स्तर तक विकसित करने का प्रयत्न किया जाय।माता, पत्नी, भगिनी, पुत्री आदि रिश्तों से बंधी हुई महिलायें हर परिवार में रहती हैं। आमतौर से ये पुरुषों की तुलना में कई प्रकार से पिछड़ी स्थिति में रहती हैं। प्रयत्न यह होना चाहिए कि एक समग्र मनुष्य स्तर की बनने योग्य विशेषताओं से उन्हें सम्पन्न किया जाय। उनमें जो भी कमी दिखाई पड़े उसे दूर करने का सच्चे मन से प्रयत्न किया जाना चाहिये। 25 लाख परिवारों में से प्रत्येक की स्थिति सहयोग समर्थन और उत्कर्ष की होनी चाहिये।नारी जागरण के संदर्भ में यों अनेकों योजनायें कार्यान्वित करने को पड़ी हैं। पर उनमें से जो अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं उन्हें प्राथमिकता दी गयी है और इस पुस्तक में उल्लेख किया गया है। प्रज्ञा परिवार के प्रत्येक सदस्य से अनुरोध किया गया है कि वे अपने परिवार के साथ ही प्रभाव क्षेत्र में भी ऐसा वातावरण उत्पन्न करें, जिससे जो आग्रह अनुरोध किया जा रहा है, उसे चरितार्थ होते देखा जा सके। आरम्भ अपने आप से करना चाहिये अपने निज का दृष्टिकोण बदला जाय। पुरुष अनुभव करे कि उन्हें महिला वर्ग को अपने समान सुयोग्य स्तर पर लाना है। नर को थोड़ा-सा झुकना है और नारी को उठना है। ममता का स्तर तभी बन सकता है। व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व को सच्चे अर्थों में न्याय तभी दिया जा सकेगा। यह कार्य शान्ति कुञ्ज को अपने परिजनों से आरम्भ करके उसे इतना विस्तार देना है जिसमें छोटी चिनगारी दावानल का रूप धारण करके समूचे समाज को ही मार्ग अपनाने के लिए उद्यत करा सके।

