बौद्धिक प्रशिक्षण की पृष्ठभूमि
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शरीर रक्षा के लिए जिस प्रकार भोजन की आवश्यकता है, उसी प्रकार मानसिक विकास की आवश्यकता शिक्षा के माध्यम से पूरी होती है। इसके बिना मनुष्य की जानकारी इतनी सीमित और अस्त-व्यस्त रहती है, जिसके सहारे न तो वस्तुस्थिति का समझ पाना सम्भव होता है और न सर्वतोमुखी प्रगति का मार्ग ढूंढ़ सकना। इन दिनों जीवन में विविधता का अतिशय विस्तार हुआ है। समस्याओं और आवश्यकताओं में भी वृद्धि हुई है। शिक्षा के बिना उनके समाधान खोज पाना सम्भव नहीं है। अशिक्षितों की स्थिति अनगढ़ों जैसी ही बनी रहती है, उससे उबरने और उबारने का सर्वत्र प्रबल प्रयास होना चाहिए।अपने देश में दो तिहाई से अधिक अशिक्षित हैं। नर की तुलना में अनपढ़ नारियों की संख्या और भी अधिक है। उन्हें विकासोन्मुख बनाने के लिए शिक्षा संवर्धन के उपाय अपनाये ही जाने चाहिए। लड़कों की तरह लड़कियों को भी पढ़ाना चाहिए। जिनकी आयु बड़ी हो गई है, जिन्हें पढ़ने का अवसर ही नहीं मिला उन्हें बड़ी आयु में भी पढ़ाने का प्रयत्न होना चाहिए। ऐसे नर नारी प्रौढ़ शिक्षा में सम्मिलित हो सकते हैं। साक्षर कहलाने योग्य प्राथमिक शिक्षा नित्य कुछ घन्टे अभ्यास करते रहने पर प्रायः एक वर्ष में पूरी हो जाती है। उसे एक धर्म कृत्य की तरह व्रत-अनुष्ठान की तरह उन सभी को अपनाना चाहिए जो बचपन में शिक्षा प्राप्त नहीं कर सके।इसके लिए हर शिक्षक को विद्याऋण चुकाने के लिए व्रत लेना चाहिए। अपने सम्पर्क क्षेत्र में कम से कम पांच अशिक्षितों को शिक्षित बनाने का निश्चय करना चाहिए और उसे कितनी ही व्यस्तता रहने पर भी पूरा करना चाहिए। नारी शिक्षा के लिए शिक्षित महिलाओं को आगे आना चाहिए। वयोवृद्ध पुरुष भी इनके लिए उपयुक्त हो सकते हैं। नर नारियों का सान्निध्य अपने देश में आशंका की दृष्टि से देखा जाता है। उसका बचाव करते हुए भी नारी शिक्षा के लिए उत्कण्ठा होने पर कोई न कोई प्रबन्ध हो ही सकता है। प्रौढ़ शिक्षा से लाभ तो पुरुष भी उठायें, पर महिलाओं के लिए तो यह एक प्रकार से अनिवार्य ही समझा जाना चाहिए। क्योंकि उन्हें जीवन के, समाज के जितने क्षेत्र को प्रभावित करना पड़ता है उसके लिए बहुमुखी जानकारियों की आवश्यकता पग-पग पर पड़ेगी। गांव-गांव, गली-गली, मुहल्ले-मुहल्ले यह प्रौढ़शाला का उपक्रम चल पड़ना चाहिए। कोई अशिक्षित ऐसा न रहे जिसे साक्षरता के अभ्यास से वंचित रहना पड़े। कोई शिक्षित ऐसा न रहे जिसने न्यूनतम पांच को साक्षर न बना दिया हो। यह कार्य तो स्कूली बच्चे भी कर सकते हैं और अपने-अपने घरों की उन सब महिलाओं में प्राथमिक स्तर की पढ़ाई पूरी करा सकते हैं—जो उससे अब तक वंचित रही हैं।प्रौढ़ शिक्षा की महती आवश्यकता इसी प्रकार जन सहयोग से संपन्न हो सकेगी। सरकार के लिए तो स्थापित स्कूलों की व्यवस्था बना सकना ही कठिन पड़ रहा है, फिर वह दो तिहाई अशिक्षितों को शिक्षित करने का व्यय भार कैसे वहन कर सकेगी?इस संदर्भ में सबसे बड़ी कठिनाई है—निरक्षरों में शिक्षित बनने का अनुत्साह। समझा यह जाता रहा है कि नौकरी के लिए पढ़ा जाता है, जिन्हें नौकरी नहीं करनी है वे क्यों पढ़ें? इसके अतिरिक्त आयु बढ़ जाने पर पढ़ने में संकोच लगता है और बड़प्पन पर आंच आती है। इन भ्रान्तियों को दूर करने के लिए ऐसा प्रबल आंदोलन चलाया जाना चाहिए जो शिक्षा की महत्ता समझ सके और यह हृदयंगम करा सके कि अशिक्षा से कितनी हानियां हैं। पढ़ने के लिए कोई आयु बड़ी नहीं होती, यह तो ऐसा लाभ है जिसे उठाने के लिए हर बाल-वृद्ध को तत्पर रहना चाहिए। जन सम्पर्क हो या प्रचार आन्दोलन, किसी माध्यम से शिक्षा के लिए व्यापक उत्साह जगाना और वातावरण बनाना आवश्यक है। इसके उपरान्त ही शिक्षण की व्यवस्था बनाने, सरंजाम जुटाने पर सफलता मिलने की बात बन सकती है।साक्षरता प्रथम चरण है। उसके उपरान्त आवश्यक है जीवनोपयोगी ज्ञान सम्पदा सम्पादन करने की व्यवस्था बनाना। अपने देशवासियों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे उपयोगी सभी पुस्तकें खरीदते रह सकें। ऐसी दशा में सद्ज्ञान से भरे-पूरे पुस्तकालय ही उस आवश्यकता की पूर्ति कर सकते हैं। हर चैतन्य क्षेत्र में पाठशालाओं की तरह पुस्तकालयों की व्यवस्था होनी चाहिए। अभिरुचि के अभाव को देखते हुए इस व्यवस्था में इतना और जोड़ा जाय कि चल पुस्तकालयों की व्यवस्था हो। हर शिक्षित नर नारी को उसकी आवश्यकता के अनुरूप घर बैठे पहुंचाने और वापिस लेने की निःशुल्क व्यवस्था करनी चाहिए। इन दिनों ऐसे विषयों की पुस्तकें बहुत कम छपी हैं, जो छपी हैं उनका मूल्य उचित से कहीं अधिक है। सस्ता और उपयोगी साहित्य युग निर्माण योजना मथुरा ने प्रकाशित किया है। चल पुस्तकालय के लिए उसकी अपनी उपयोगिता है। साक्षरता उपलब्ध करने के उपरान्त हर विचारशील नर-नारी को सभी जीवनोपयोगी विषयों में आवश्यक एवं आदर्शवादी साहित्य निरन्तर पढ़ाते रहने का क्रम चल पड़े, ऐसे प्रयत्नों से ही शिक्षा का समग्र प्रयोजन पूरा होता है। शिक्षण एवं स्वाध्याय के अतिरिक्त तीसरा माध्यम है—सत्संग। जिसमें प्रवचन और संगीत दोनों का समावेश है। इसके लिए साप्ताहिक सत्संग, पर्व संस्कारों के विशेष आयोजन तथा छोटे-बड़े सभा सम्मेलनों का उपक्रम चलता रहना चाहिए। सावधानी इतनी ही बरती जानी चाहिए कि उसमें नर और नारी के संबंधों में उत्कृष्टता , विवेकशीलता एवं न्याय-निष्ठा का समावेश रहे।नारी जागरण आन्दोलन के अन्तर्गत इस सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण कड़ी यह जोड़ी गई है कि इस गठन में सम्मिलित होने वाली महिलाओं के घरों पर बारी-बारी से साप्ताहिक सत्संग होते रहें। इन्हें धार्मिक रूप देना हो तो सीमित व्यक्तियों का दीप यज्ञ, सहपाठ एवं प्रेरक संगीत की व्यवस्था रखी जा सकती है। साथ में नारी जीवन से सम्बन्धित सभी विषयों पर प्रवचन या प्रश्नोत्तरी के रूप में आवश्यक ज्ञान वृद्धि शृंखला चलती रह सकती है। जहां यह सत्संग हों वहां की समीपवर्ती महिलाओं को विशेष रूप से आमंत्रित किया जाय ताकि मिशन का कार्यक्षेत्र अधिक व्यापक होने की बात बनती रहे। पुस्तकालय की पुस्तकें लेने और वापिस करने का क्रम भी इन्हीं सत्संगों के साथ चलता रह सकता है।पिछड़े वर्ग में नव चेतना संचार के लिए प्रवचनों की अपेक्षा संगीत की उपयोगिता कहीं अधिक होती है, इसलिए नारी शिक्षा संवर्धन के साथ जुड़ा हुआ एक विषय संगीत भी है—यह नारी का प्रिय विषय भी है। कमी यही रही है कि न तो उपयोगी विषयों पर गीत रचे गये और न सुलभ संगीत की ऐसी शिक्षण व्यवस्था ही बन पड़ी जिसके आधार पर महिला समाज को गायन-वादन का अभ्यास करने का अवसर मिल सके। इस अभाव की पूर्ति अपने आंदोलन को करनी चाहिए।शांतिकुंज में एक-एक महीने के नारी कार्यकर्ता शिक्षण शिविर चलते हैं, जिसमें नारी शिक्षा की सभी विधायें अभ्यास में उतार दी जाती हैं। उस में लोकमंगल के साथ लोकरंजन को जोड़ देने वाली सुगम संगीत शिक्षा भी सम्मिलित है। लोकगीत, लोक वाद्य हर किसी के लिए सुलभ हैं। क्षेत्रीय भाषाओं में तथा हिन्दी में उपयोगी गीत लिखने और छापने का क्रम भी चल पड़ा है। इस माध्यम से महिला वर्ग को युगान्तरीय चेतना से अवगत-प्रभावित कराया जा सकता है। संगीत स्वभावतः हृदयग्राही होते हैं। गायन के साथ-साथ टिप्पणियां जोड़ते हुए अभिप्राय को भी अच्छी तरह स्पष्ट करते चलने पर और भी अधिक शानदार बन सकते हैं। साप्ताहिक सत्संगों को भी उस माध्यम से और भी अधिक आकर्षक एवं उद्देश्यपूर्ण बनाया जा सकता है।महिलाओं को अनेक अवसरों पर अपनी संगीत कला प्रदर्शित करने का अवसर मिलता रहता है। पर्व-त्यौहारों पर, विवाह शादियों पर, श्रावण फाल्गुन में, प्रसन्नता के अवसरों पर घर में पूजा-आरती के समय उन्हें गायन वादन का अवसर मिलता रहता है। इन सभी अवसरों पर निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने वाले गीत गाये जाते रहें तो इस प्रकार का बहुत ही सरल महत्वपूर्ण तथा व्यापक प्रभाव डालने वाला उपक्रम बैठ सकता है। नारी जीवन अनेक कुण्ठाओं से संव्याप्त रहता है। उन्हें दूर करने में संगीत बहुत सहायक होता है, उसे एकाकी भी गाया गुनगुनाया भी जा सकता है। इसमें थोड़ा धार्मिकता का पुट रहने पर उसे कीर्तन के साथ भी मिला सकते हैं। अब तक इन प्रयोजनों के लिए कुछ योजनाबद्ध प्रयास नहीं हुए हैं। अपना आन्दोलन अब इस प्रक्रिया को भी हाथ में लेकर आगे बढ़ रहा है।शिक्षा संवर्धन, झोला पुस्तकालय, संगीत, साप्ताहिक सत्संग के चार उपक्रमों के अतिरिक्त नारी जागरण की बौद्धिक शिक्षा योजना का एक अंग है चित्रों का माध्यम। इसके लिए स्लाइड प्रोजेक्टर का उपयोग पहले से ही हो रहा है। यह अत्यन्त सस्ता तथा प्रयोग में सरल उपकरण है, जिसे घरेलू सिनेमा कहा जा सकता है। चित्रों की व्याख्या करके नारी समस्या, स्वास्थ्य शिक्षा, कुरीतियों, दहेज प्रथा, नशा निवारण जैसी कुप्रथाओं की ओर समाज के प्रत्येक परिजन को जागरूक बनाया जा सकता है। इसकी नई-नई स्लाइड शान्तिकुंज से प्राप्त की जा सकती हैं और हर माह नये-नये चित्र प्रदर्शित किये जाते रह सकते हैं।यही कार्य चित्र प्रदर्शनियों के माध्यम से भी होता रह सकता है और नारी आन्दोलन के बारे में सर्वसाधारण को जानकारी कराई जा सकती है। इस प्रयोजन के लिए प्रदर्शनी वाले चित्र छपाने, पोस्टर स्टीकर तथा चित्र पुस्तकें छापने की योजना है। इन सब माध्यमों के द्वारा नारी शिक्षा का वह समग्र उद्देश्य पूरा हो सकता है। इस शुभारम्भ के विस्तार एवं प्रतिफल की संभावना असीम है—इन्हें युग परिवर्तन की महती पृष्ठभूमि भी कहा जा सकता है।

