नारी का दुर्भाग्यपूर्ण अवमूल्यन
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उपेक्षा आमतौर से कम महत्व की वस्तुओं, कार्यों अथवा प्रसंगों की होती है। परन्तु कई बार देखा जाता है कि अत्यधिक महत्वपूर्ण बात भी उपेक्षा के गर्त में लम्बे समय तक पड़ी रहती हैं। इसका कारण होता है—घटनाक्रम का स्वभाव में उतर जाना। आदतों में अपनी विशिष्ट क्षमता होती है। जब वे स्वभाव में रच-पच जाती हैं तो मानस को अपने ढांचे में ढाल लेती हैं। अनुपयुक्त भी अखरता नहीं, प्रिय लगने लगता है।जिन्हें गन्दगी में अधिक समय रहना पड़ता है, उनकी नाक इस प्रकृति की हो जाती है कि बदबू से उन्हें परेशानी नहीं होती। किसी जमाने में कैदियों को अंधेरी कोठरियों में रखा जाता था। लम्बी सजा काटने के बाद जब वे बाहर निकलते थे तो उनकी आंखें प्रकाश सहन नहीं कर पाती थीं। वे उजाले को छोड़कर अंधेरे की ओर ही भागते थे। इस प्रकार जिनके गलत अभ्यास व आदतें बन जाती हैं उन्हें अनुकूलता भी प्रतिकूलता जैसी लगती है।नशेबाजी में प्रायः यही होता है। मादक पदार्थों की गंध और स्वाद आमतौर से अरुचिकर होती है, किन्तु आदत पड़ जाने से वह अनर्थकारी दुर्व्यसन छुड़ाये नहीं छूटता।कुछ आम आदतें भी ऐसी होती हैं जो स्वभाव का अंग बन जाने पर उन्हें छोड़ने का विचार तक नहीं उठता, वरन् अपनाये रहना आवश्यक लगता है। उदाहरण के लिए नमक और शक्कर का उपयोग ही लें—जितनी मात्रा में हम इन दोनों का सेवन करते हैं वह स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक है। जितनी मात्रा में शरीर के लिए आवश्यक है, उतनी मात्रा शाक, फल, अन्न आदि से मिल जाती है परन्तु स्वाद की दृष्टि से उन्हें अधिक मात्रा में लिया जाता है। यह अभ्यास इतना सहज रूप ले चुका होता है कि इसके विरुद्ध यदि कुछ कहा जाये तो मूर्ख समझा जाता है। न खाना कमजोरी की बात कही जाती है, जब कि सच्चाई यह है कि नमक, शक्कर की अनावश्यक मात्रा यदि बन्द कर दी जाय तो आर्थिक बचत के साथ स्वास्थ्य सुधरने का साधारण लाभ भी मिलने लगे।कुरीतियों का भी कुछ ऐसा ही जाल-जंजाल है। उनमें लम्बे समय से फंसे चले आने के कारण उनका अखरना तो दूर उल्टे वे स्वाभाविक से भी आगे, उपयोगी, आवश्यक और धर्म संगत लगने लगी हैं। नर और नारी के बीच प्रचलित भेदभाव भी ऐसा ही है जो हर दृष्टि से अन्याय, मूलक और अहितकर होते हुए भी अपना स्थान बनाये हुए है।प्राणी जगत में सर्वत्र नर और मादा दोनों पाये जाते हैं। दोनों समान स्तर पर रहते हैं। उनमें से कोई किसी का मालिक या गुलाम नहीं होता। आवश्यकतानुसार वे परस्पर सहयोग करते और मिल-जुलकर रहते हैं, परन्तु मनुष्यों में इस संदर्भ में प्रचलन सर्वथा भिन्न है। नारी को पशुओं की तरह मालिकों के लिए मरते-खपते रहने के लिए अभ्यस्त कराया जाता है और नर ने ऐसी स्थिति बना ली है मानों वही दूसरे पक्ष का भाग्य विधाता हो। विकसित, अविकसित देशों में यही प्रचलन चल रहा है, केवल प्रयोगों में थोड़ा-सा अन्तर है।पिछड़े देशों में नारी को नर की संपत्ति समझा जाता है और उसे अपने नियंत्रण में चलने, आदेशों का पालन करने के लिए मजबूर किया जाता है। प्रचलन इसी प्रकार का चल पड़ा है। रीति-रिवाज इसी प्रकार के बनाये गये हैं। धर्म शास्त्रों में भी जहां-तहां इसी अनीति के समर्थन में समर्थ पक्ष की तरफदारी की गई है। नारी को बचपन में पिता, यौवन में पति और बुढ़ापे में पुत्र के अधीन रहने का उल्लेख किया गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि उसे किसी भी अवस्था में मानवोचित स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त करने की सुविधा नहीं है। वह किसी भी स्थिति में मानवीय मौलिक अधिकारों का उपयोग नहीं कर सकती। इस प्रचलन में आधी जनसंख्या को प्रकारांतर से सदा पराधीनता में जकड़े रहने के लिए बाधित किया गया है। इस अनीति में किसी को अवांछनीयता की गन्ध भी नहीं आती। जो चल रहा है उसे ही स्वाभाविक समझा जाने लगा है। इस असमानता से होने वाली हानि की ओर किसी का ध्यान भी नहीं जाता।विकसित देशों में इस प्रतिबन्ध को आर्थिक और मनोवैज्ञानिक आधार पर लागू किया गया है। नारी को स्वेच्छापूर्वक नर की सेविका रहने के लिए लुभाया गया है। उसे सजधज की, शृंगारिकता की, शौक-मौज की ऐसी लत लगाई गई कि वह सामान्य श्रमशीलों की तरह जीवन बिताने का साहस नहीं कर सकती। पुरुष को लुभाते रहने, उसकी वासना का उपकरण बने रहने में ही उसे सुविधा दिखाई देती है। इसीलिए मानवोचित पुरुषार्थ करके और आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में उसे भी असुविधा लगने लगी है। इसे स्वेच्छापूर्वक वरण की गई पराधीनता कह सकते हैं, किन्तु है तो वह भी इसी स्तर की जिसमें स्वतन्त्र व्यक्तित्व के विकास की, स्वावलम्बन और प्रगति पथ पर अग्रसर हो सकने की गुंजाइश यत्किंचित ही रह जाती है।सृष्टा ने आधी संख्या नर और आधी नारी की बनाई है। दोनों में समान क्षमताओं का समावेश किया है। दोनों को मानवोचित गरिमा विकसित करने का अधिकार और अवसर प्रदान किया है, परन्तु एक के गुलाम दूसरे के मालिक बन जाने पर तो स्थिति पूरी तरह उलट जाती है, इसे आधी जनसंख्या को अपंग कर देना कह सकते हैं। इस स्थिति से नर और नारी दोनों की समान रूप से हानि है। दो बैलों में से एक कमजोर हो तो हल या गाड़ी खींचने में एक बैल को ही अधिक भार उठाना पड़ता है। यदि अर्धांग, पक्षाघात से पीड़ित हो तो असमर्थ अंग के भार ढोने का काम समर्थ अंगों पर आ जाता है। पराधीन और पिछड़ी नारी, नर के लिए गले में लटकने वाले पत्थर की तरह अतिरिक्त भार बनकर ही रह सकती है।गाड़ी तभी ठीक तरह चल सकती है जब दोनों पहिए एक जैसे हों। एक पहिया ऊंचा एक पहिया नीचा हो तो फिर बात कैसे बने? एक हाथ छोटा एक बड़ा, एक पैर छोटा एक लम्बा हो तो शरीर की स्थिति अपंगों एवं उपहासास्पद जैसी बन जाती है। आंखें छोटी बड़ी हों, नाक के नथुने मोटे पतले, तो चेहरा कुरूप ही दीखेगा। एक फेफड़ा या एक गुर्दा ठीक से काम न करे तो बहुत दिन तक जीवित न रहा जा सकेगा। नर और नारी के सम्बन्ध में भी पूरी तरह यही बात कही जा सकती है। अंकों में एक ऊपर एक नीचे रहे तो उसका योग मात्र दो ही रहेगा। पर वे बराबर पर लिखे जायं तो उन्हें ग्यारह पढ़ा जायेगा। नर और नारी का समानता के आधार पर विनिर्मित सहयोग ही उन्हें एक और एक ग्यारह की उक्ति के अनुसार सब प्रकार समर्थ बनाता है। दोनों ही एक दूसरे के लिए असाधारण रूप से उपयोगी सिद्ध होते हैं, किन्तु यदि एक कैदी, दूसरा संरक्षक सिपाही बनकर रहे तो साथ रहते हुए भारभूत बना रहेगा। गुलाम कभी सतत् सहयोगी नहीं बन सकता। वह प्रारम्भ से ही अनमने ढंग से काम करता है। पराधीनता की स्थिति में नारी से न उतने सहयोग की आशा की जा सकती है और न उसके समग्र विकास की।आधी जनसंख्या की पराधीनता वस्तुतः मानव समाज की सबसे बड़ी और सबसे विषम समस्या है। भारत सहित अनेक देशों ने राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर ली है, पर अभी भी सामाजिक स्वतंत्रता प्राप्त करना शेष है, जो उससे अधिक महत्वपूर्ण तथा आवश्यक है। व्यक्तित्वों का विकास इससे कम में हो ही नहीं सकता। ममता के आधार पर मिलने वाले स्वेच्छा सहयोग की इससे कम में कल्पना भी नहीं की जा सकती।पुरातन काल में नारी को अधिक वरिष्ठ माना जाता था। उसे देवी की उपमा दी जाती थी। पौराणिक परम्परा में लक्ष्मी-नारायण, उमा-महेश्वर, सीता-राम, राधे-श्याम, शची-पुरन्दर आदि युग्मों से नारी की वरिष्ठता-महत्ता प्रमाणित होती है। उस स्थिति में नारी वीर प्रसूता, नर-रत्नों की खदान थी। अपने पतियों के लिए अर्धांगिनी अर्थात् आधा भार सम्हालने में सहयोग करती थी। परिवारों में गृहलक्ष्मी की भूमिका निभाती और धरती पर स्वर्ग की रचना करती थी।मध्यकाल के सामन्तवादी अन्धकार युग में समर्थों ने असमर्थों को पराधीन रखने की नीति अपनायी थी। दास और दासी इसी आधार पर पकड़े, खरीदे और बेचे जाते थे। सामन्तों के घरों में अनेकों पत्नियां, उप पत्नियां रहती थीं। उनका असन्तोष भड़कने न पावे—इसलिए उन्हें कड़े प्रतिबन्धों में जकड़ कर रखा जाता था। वे न घर से बाहर निकल सकती थीं और न घूंघट से बाहर मुंह खोल सकती थीं। ऐसी दशा में उनकी उपयोगिता रसोईदारिन, चौकीदारिन, आया जैसी बनकर रह गयी थी। रमणी, कामिनी, भोग्या के रूप में उन्हें आत्म समर्पण करना पड़ा। नर के लिए अलग कानून बने, नारी के लिए अलग। नर के विशेष अधिकार, नारी के नगण्य। आदर्श के नाम पर पत्नियां पति के साथ सती हो जाती थीं, पर यह आदर्श किसी पति ने पत्नी के लिए नहीं निभाया। विधुर प्रसन्नतापूर्वक विवाह कर सकते हैं, पर विधवाओं को वैसा करने देने में अड़ंगा लगता रहा। परित्यक्ताओं और विधवाओं की जो दुर्दशा होती है वह किसी से छिपी नहीं। पति यदि बड़ी सम्पत्ति न छोड़कर मरा हो तो कई बच्चों की विधवा माता को न पिता के घर में उपयुक्त स्थान मिलता है और न ससुराल वालों से समुचित सहायता। ऐसी स्थिति में उस अनाथ-अनाश्रित पर क्या बीतती है, उसकी करुण कथा कोई भुक्तभोगी ही जान सकता है।लड़का जन्मने पर बधाइयां बजती हैं और लड़की जन्मने पर सभी के मुंह लटक जाते हैं। दोनों के पालन-पोषण, शिक्षा-सम्मान आदि में भी भारी अन्तर रहता है। विवाह तो और भी उलझी समस्या है। लड़की के पिता को दरवाजे-दरवाजे ठोकरें खानी पड़ती हैं। यदि सुन्दरता में कमी हुई या दहेज के लिए मुंह मांगी रकम न जुटाई जा सकी तो विवाह करना कठिन हो जाता है। लड़की अभिनेत्रियों जैसी सुन्दर हो और पिता के घर से बड़ी सम्पदा साथ लेकर आये तो ही उसे सुयोग्य वर पाने और अच्छे घरों में प्रवेश करने का अवसर मिलता है। गरीब घरों को, सामान्य रंग-रूप की कन्याओं को तो किसी प्रकार कहीं भी पीले हाथ करने का अवसर मिलता है।यह सब प्रचलन बतलाते हैं कि अपने समाज में नारी का कितना अवमूल्यन हुआ है। वह दिन भर कम महत्व के कामों में पिसती रहने के कारण न शिक्षा प्राप्त कर सकती है, न स्वावलम्बन के लिए योग्यता अर्जित कर सकती है। उपेक्षित-तिरस्कृत रह कर अपना शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य गंवाती रहती है। बच्चों के बोझ से निरन्तर लदती रहने के कारण वह प्रौढ़-परिपक्व होने से पहले ही बुढ़ापे की शिकार हो जाती है। ऐसी दशा में उसका गई-गुजरी, पिछड़ी अनाथ स्थिति में पड़े रहना स्वाभाविक ही है। घर के छोटे दायरे में जिन्दगी गुजारने के कारण उसे सामाजिक सम्पर्क का, अनुभव संपादन का अवसर ही कहां मिलता है? स्वावलम्बन और प्रगति का द्वार भी नहीं खुल पाता।जन जातियों, अनुसूचित जातियों को पिछड़ी समझा जाता है और उनके लिए विशेष सुविधाओं का प्रबन्ध किया जाता है, पर कुछ शिक्षित-सम्पन्न परिवारों की महिलाओं को अपवाद रूप छोड़कर प्रायः समस्त नारी समाज को उस स्थिति में जीवन यापन करना पड़ता है, जिसे एक शब्द में दयनीय ही कह सकते हैं। इतने पर भी आश्चर्य यह है कि न तो पुरुष वर्ग अपने सहचर वर्ग को उठाने की आवश्यकता अनुभव करता है और न नारी ही मानवोचित जीवन यापन का अधिकार पाने के लिए साहस जुटा पाती है।इसे प्रतिगामिता को सहन करने का अभ्यास ही कह सकते हैं। इसकी तुलना सड़ी कीचड़ के वातावरण में रहने वालों से की जा सकती है। नशेबाजी के अभ्यस्त लोगों से भी इस माहौल को आंका जा सकता है। अंधेरे में लम्बे समय तक रहने वाला प्रकाश की इच्छा नहीं करता। ऐसी ही है नर-नारी के बीच पाई जाने वाली भयावह विषमता। इसे निरस्त करने की भावना विचारशीलों-प्रगतिशीलों के मन में उठनी ही चाहिए।

