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Magazine - Year 1968 - Version 2

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निकृष्टता को परास्त कर उत्कृष्टता वरण करें

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संसार का हर व्यक्ति एक महान् व्यक्ति है, साथ ही निम्न भी। इसी का तात्पर्य यह है कि हर मनुष्य में महानता और निम्नता दोनों प्रकार के तत्त्व छिपे रहते हैं। किसी को महानता ही महानता के गुण देकर और किसी को निकृष्टता ही निकृष्टता के अवगुण देकर भेजती हो- न्यायशील प्रकृति ऐसा अन्याय कभी नहीं करती।

महानता की ओर बढ़ने और निम्नता की ओर गिरने की एक प्रक्रिया है, जिसको अपनाकर लोग ऊँचे उठते हैं और नीचे गिरते हैं। वह प्रक्रिया क्या है? आन्तरिक देवासुर संग्राम। मनुष्य के हृदय में दैवी और आसुरी दोनों प्रकार की प्रवृत्तियाँ विद्यमान् रहती हैं। जो व्यक्ति अपने प्रयत्न एवं पुरुषार्थ द्वारा आसुरी वृत्तियों को शमन कर दैवी वृत्तियों का विकास कर लेता है, उन्हें पुष्ट और प्रबल बना लेता है, वह महानता की ओर उठ जाता है। और जो व्यक्ति प्रमादवश ऐसा नहीं करते उनकी दैवी प्रवृत्तियाँ दब जाती हैं और आसुरी वृत्तियाँ प्रबल हो जाती हैं। इस प्रकार का आसुर्य प्रभावित व्यक्ति पतन के गर्त में गिर जाता है।

देवत्व का उत्थान ही उच्चता अथवा महानता है और असुरत्व की प्रबलता ही पतन है। एक संत अथवा जन-सेवक जिसके पास न धन है, न पद है और न कोई सत्ता, लेकिन अपनी सेवाओं, दया, करुणा, प्रेम, सहानुभूति आदि गुणों के कारण महान है। जबकि बड़ी-बड़ी विजय करने वाला, साम्राज्य स्थापित करने वाला, शासन तन्त्र संचालित करने वाला उच्च पद प्रतिष्ठित, सम्पत्ति, सत्ता और शक्ति संपन्न होते हुये भी अपने अत्याचार, अनीति, अन्याय, शोषण, उत्पीड़न की वृत्ति के कारण पतित है, निम्नकोटि का है। महानता अथवा निम्नता का भाव स्थिति में नहीं बल्कि आन्तरिक गुण, अवगुणों में रहता है।

महानता का शुभारम्भ अंतर से होता है, बाह्य से नहीं। अंतर को महान् बनाये बिना वास्तविक रूप कोई महान् नहीं बन सकता, यदि कोई अधो अंतर डडडड संयोग, चातुर्य अथवा परिस्थितियों द्वारा किसी उच्च डडडड और प्रतिष्ठा पर पहुँच भी जाता है तो बहुत दिन तक वह अपने उस ऐश्वर्य को सुरक्षित नहीं रख सकता। डडडड आन्तरिक विकृतियाँ उसे निकृष्ट कार्य और विचार जाल में फांसकर शीघ्र ही धूल में गिरा देती हैं। संसार में रावण, कुम्भकरण, कंस, दुर्योधन आदि न जाने कितने अधोअंत वाले व्यक्ति उच्च-पद पर पहुँच-पहुँच कर ऐसे पतित हुए कि आज तक घृणापूर्वक कहे जाते हैं। आज भी आये दिन किन्हीं कारणों से पूजा और प्रतिष्ठा के स्तर तक पहुँचकर न जाने कितने तथा कथित साधु-संत, महात्मा, नेता और सत्ताधारी अपनी अधो-मनोवृत्ति की प्रतारणा से अधोगति को प्राप्त होते रहते हैं।

इसके विपरीत संसार में ऐसे महानुभावों की कमी भी नहीं है और न रही है, जो पतित अवस्था से, आन्तरिक सुधार के आधार पर पूजा और प्रतिष्ठा के पद तक पहुँचे हैं। ऐसे महान् व्यक्तियों में वाल्मीकि, अंगुलिमाल, डडडड तुलसी आदि न जाने कितने महात्मा और अशोक आदि राजा गिनाये जा सकते हैं। महानता का आधार डडडड है, बाह्य परिस्थितियाँ नहीं। महानता वास्तव में ऐसे डडडड हैं, जो अन्तर की डाली पर लगा करते हैं। यदि आन्तरिक डाली मजबूत और उपयुक्त नहीं है तो निश्चय ही डडडड पर लग जाने वाले महानता के फल स्वयं तो नष्ट हो ही जायेंगे, व्यक्ति का अस्तित्व भी उसी प्रकार नष्ट कर देंगे जैसे फलों के भार से वृक्ष की कमजोर डाली फट पड़ती है और शीघ्र ही ईधन बनकर स्वाहा हो जाती है।

संसार में सभी को महानता वाँछनीय है। उसे डडडड करने का प्रयत्न भी करना चाहिये। क्योंकि मानव-जीवन की सार्थकता इसी में है। तथापि धन, सम्पत्ति और पद प्रतिष्ठा के लिये यों ही सहसा दौड़ पड़ने से पूर्व आवश्यक डडडड कि उसका विकास पहले अपने हृदय में, अपने चरित्र में कर लिया जाय।

अच्छे विचार, अच्छी आदतें और उपयुक्त व्यवहार के डडडड-गुण ही हृदय और चरित्र की महानता हैं। प्रेम, डडडड, सहानुभूति, सेवा और विनय के भाव मनुष्य का उच्च आदर्श है। हमें कोई और प्रयत्न करने से पूर्व अपने में यह विशेषतायें विकसित कर ही लेनी चाहिये। इस विकास कार्य में जो भी समय और श्रम लगे, लगाने में संकोच नहीं करना चाहिये। यदि हम अन्तर से महान् बन गये और दैवयोग से संसार में कोई पूजा, प्रतिष्ठा का पद न भी पा सके, तब भी कोई खेद अथवा हानि की बात नहीं है। यथार्थ बात तो यह है कि जो अपने हृदय और आत्मा से महान् होता है, उसे साँसारिक पूजा, प्रतिष्ठा की लिप्सा नहीं होती। अधिकाँश लोग अपने अन्तर और आत्मा का खोखलापन ही उनके द्वारा भरने का असफल प्रयत्न किया करते हैं। ऐसे रिक्तात्मा व्यक्ति यदि साँसारिक पूजा, प्रतिष्ठा पा भी नहीं जाते हैं तो भी उन्हें किसी प्रकार की शाँति, संतोष, सुख अथवा आत्म-गौरव प्राप्त नहीं होता। वे सिवाय दम्भ की तुष्टि और आत्मा-प्रवंचना के और कुछ भी नहीं पा पाते। दृश्य उद्यान में भी जीवन भर मरीचिका की प्यास से पीड़ित रहकर उससे भी निकृष्ट मृत्यु मरते हैं, जितना कोई आत्महन्ता।

आन्तरिक औदात्य और चारित्रिक महानता पा लेने वाला धन-दौलत, पूजा-प्रतिष्ठा के अभाव में भी अपने में एक आध्यात्मिक शाँति, नैसर्गिक संतोष और आनन्ददायक पूर्णता का अनुभव किया करता है। अस्तु, बाहर की किसी महानता के लिये दौड़ पड़ने से पूर्व आन्तरिक और चारित्रिक पूर्णता प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये। महानता की ओर बढ़ने का यही साधु मार्ग है और यही उपयुक्त नीति है।

उच्च और निम्न बनने के दोनों अवसर होते हुए ऐसा कौन होगा, जो महान् न बनकर निम्न बनना चाहेगा? महान् बनने के लिये आँतरिक द्वन्द्व, देवासुर संग्राम लड़ना ही पड़ेगा। इस संग्राम में देव तत्त्वों की विजय के आधार पर ही महानता प्राप्त हो सकेगी। इस संग्राम को प्रारम्भ करने की रीति यही है कि पहले यह देखा जाय कि मेरे भीतर कौन-कौन से आसुरी तत्त्व अधिक प्रबल हैं। जो आसुरी तत्त्व अधिक प्रबल हों उन पर निरन्तर कठोर प्रहार करते रहना चाहिये और अन्यों के साथ असहयोग। किन्तु केवल इतना अपूर्ण मोर्चा होगा। मोर्चा पूरा करने के लिये साथ ही दैवी वृत्तियों को पोषित और प्रोत्साहित करना होगा।

इस विधि से युद्ध चलाने पर आसुरी तत्त्व निर्बल और देव तत्त्व प्रबल हो उठेंगे। एक बार पूर्णतया प्रबल हो जाने पर देव तत्त्व असुर तत्त्वों को पूरी तरह दबाकर उन्हें नष्ट कर देंगे। मन, बुद्धि और शरीर को अपने अधीन कर लेंगे और तब उस संग्राम में आपकी पूर्ण विजय हो जायेगी। इस विजय के साथ ही आप स्वभावतः महानता की ओर अग्रसर हो चलेंगे।

आसुरी तत्त्वों की निर्बलता और सुरतत्त्वों की प्रबलता और पालन प्रोत्साहन का अमोघ उपाय है, श्रेष्ठता का आग्रहन। संसार की सारी श्रेष्ठतायें ईश्वरीय तत्त्व हैं उनको आश्रित करते ही शरीर में, मन में, और मस्तिष्क में शक्ति के रूप में ईश्वरी अनुकम्पा का प्रवेश होने लगेगा। जिसको यह अनुकम्पा मिल जाये, उसकी विजय को कौन रोक सकता है? हाथ में जो भी कर्त्तव्य लिया जाय उसे सम्पूर्ण श्रेष्ठता के साथ किया जाय। जिस विचार को भी स्थान दिया जाय, वह श्रेष्ठ हो। जिस आकाँक्षा एवं कल्पना को जन्म दिया जाये, वह शुद्ध और सार्थक हो। इस प्रकार सब ओर सब प्रकार श्रेष्ठता को आश्रित करने से असुरता को परास्त और देवत्व को प्रबल होते देर न लगेगी।

श्रेष्ठता की आवश्यकता कर्त्तव्यों और विचारों तक ही सीमित नहीं है। उसका सन्निवेश जीवन की छोटी-से-छोटी क्रिया में होना चाहिये। भोजन किया जाये तो शुद्ध और सात्विक, रहन-सहन, सुन्दर और सादगी से भरा हो। बच्चों, पत्नी और परिवार के लोगों के साथ उत्तम व्यवहार और मित्रों तथा समाज-साथियों के साथ किया जाने वाला बर्ताव भी उत्तम हो। यहाँ तक कि वाणी, शब्दों और भाव-भंगियों में भी शिष्टता, मधुरता और सत्यता हो। यह जीवन क्रम की छोटी-छोटी क्रियायें भी श्रेष्ठता से सज्जित कर संग्राम में उसी प्रकार लगानी होंगी, जैसे संक्रातिकाल में किसी प्रबुद्ध देश का बच्चा-बच्चा विजय के लिये अपने स्थान पर अपनी तरह काम में लग जाता है।

इस देव-अभियान के साथ कभी-कभी असुरता का भी प्रबल आक्रमण होगा। क्यों न होगा? असुरतत्व योंही शीघ्रता से अपनी पराजय मान भी कैसे लेंगे। वे भी अपनी करनी में कसर नहीं छोड़ेंगे। जब भी अवसर पायेंगे, निराशा, निरुत्साह, आलस्य, प्रमाद, प्रशभन, स्वार्थ, लोभ, काम, क्रोध, अहंकार आदि के रूप में आक्रमण करेंगे। आसुरी तत्त्वों का यह आक्रमण बड़ा प्रबल होता है। इसे रोकने और विफल करने में ही पुरुष का पुरुषार्थ पता चलता है। यह आक्रमण ऐसे प्रबल सम्मोहन से आवृत होता है कि अच्छे-अच्छे बुद्धिमान् भ्रम में फँस जाते हैं।

इस मायावी आक्रमण से बचने के लिये मनुष्य के पास एक बड़ा भारी संबल भी होता है। वह है आत्म-विश्वास और आत्म-निष्ठा। तुरन्त उसका आश्रय लेकर घोषणा कर देनी चाहिये कि मैं हाड़-माँस का बना जड़ शरीर नहीं हूँ। मैं शुद्ध-बुद्ध चेतन आत्मा हूँ। परमात्मा का अंश शुद्ध अंश। इस संकल्पपूर्ण उद्घोष के साथ मनुष्य को अपनी ईश्वरता का बोध होने लगता है। जहाँ इस परमात्म-बोध का प्रकाश विद्यमान् हो वहाँ माया का अंधकार किस प्रकार ठहर सकता है।

असुर संग्राम जीतने के लिये आत्म-निष्ठा एक प्रबल संबल है और आत्म-विश्वास एक अमोघ अस्त्र। आत्मा के रूप में मनुष्य के भीतर ऐसी चमत्कारी शक्तियों का भण्डार भरा है, जिसको जाने बिना, कल्पना तक नहीं की जा सकती। आत्म-निष्ठा में उतरते ही मनुष्य में एक दिव्य तेज का समावेश हो जाता है। उसका विवेक शक्तिशाली होकर प्रधान सेनापति की भूमिका प्रदान करता है।

इस प्रकार अंतर के देवासुर संग्राम में विजय पाकर मनुष्य को बाह्य महानताओं के लिये अग्रसर होना चाहिये डडडड ऐसे समर्थ पुरुष को संसार का कोई भी इष्ट दुर्लभ नहीं डडडड असुरजयी देव-पुरुष स्वयं ही अपने कल्पतरु हुआ करते हैं डडडड वे जिस समय जो सिद्धि चाहते हैं, उन्हें मिल जाती है आन्तरिक आभा से दीप्त मुख मंडल और विश्वसत व्यवहार को लेकर वे जिस ओर निकल जायेंगे समाज उनके अभ्यर्थना में खड़ा हो जायेगा और चाहेगा कि वह उनका नेतृत्व करे, पथ प्रकाशन करे। जिससे कि वे भी भौतिक और आध्यात्मिक उपलब्धियों के योग्य बन सकें।

हर मनुष्य में एक जन्मजात महापुरुष छिपा होता है लेकिन वह आसुरी तत्त्वों के कारागार में बन्द होता है। मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह उसे देव तत्त्वों की सहायता से मुक्त कर उठाये और महान् कृत्यों द्वारा महानता की ओर बढ़े। यह उसका कर्त्तव्य है और यही अधिकार भी है।

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