शब्द तत्व की अद्भुत एवं आश्चर्यजनक शक्ति
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
सामान्यतः मनुष्यों को जल, भाफ, अग्नि, विद्युत, वायु, गैस आदि की शक्ति का तो अनुभव हुआ करता है, परन्तु ‘शब्द’ में भी कोई ऐसी शक्ति होती है, जो स्थूल पदार्थों पर प्रत्यक्ष प्रभाव डाल सके, इस पर उनको शीघ्र विश्वास नहीं होता। वे यह तो मान सकते हैं कि मधुर शब्दों से श्रोता का चित्त प्रसन्न होता है कठोर शब्दों से विषण्णता उत्पन्न होती है, भावयुक्त संगीत-लहरी से हृदय का तार-तार झनझना उठता है, वीरतापूर्ण गीत जब आवेश-युक्त स्वर में गाया जाता है तो सैनिक मरने-कटने को उछलने लगते हैं। पर ये सब ऐसे भावनात्मक प्रभाव हैं, जिनका अनुभव प्रत्येक व्यक्ति समान रूप से नहीं कर सकता। कोई भी करुणोत्पादक गीत कोमल और कठोर हृदय वाले दो भिन्न व्यक्तियों पर एक-सा प्रभाव नहीं डाल सकता। इसी प्रकार कोई शृंगार रसपूर्ण गायन एक सद्य-विवाहित नवयुवक और वृद्ध संन्यासी को एक समान प्रभावित नहीं कर सकता।
पर अब अनेक वैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा इस बात को सिद्ध कर रहे हैं कि शब्दों का प्रभाव केवल भावनात्मक ही नहीं होता वरन् उनके द्वारा जो अदृश्य तरंगें वातावरण में उत्पन्न होती हैं, उनसे अनेक पदार्थों को निश्चित रूप से प्रभावित किया जा सकता है। उदाहरण के लिये यदि किसी काँच के गिलास को हल्की चोट द्वारा बजाकर उसके साथ उसी से मिलती ध्वनि ‘पियानो’ या सारंगी आदि किसी वाद्य-यन्त्र द्वारा लगातार बजाई जाय तो कुछ देर में वह गिलास उन शब्द-तरंगों की शक्ति से चूर-चूर हो जायेगा।
जर्मनी के प्रथम महायुद्ध के पश्चात् वहाँ के वैज्ञानिकों ने जो युद्ध संबंधी आविष्कार किये थे, उनमें शब्द-शक्ति द्वारा सेनाओं का संहार करने वाले एक यंत्र का विवरण भी ज्ञात हुआ। उसके आविष्कारक का कहना था कि जब उक्त यंत्र द्वारा प्रति-सेकेंड दस लाख से भी अधिक कम्पनों की ध्वनि उत्पन्न की जायगी तो वह इतनी तीव्र होगी कि मनुष्य के ज्ञानतन्तु उसके कारण तुरन्त नष्ट हो जायेंगे और उसकी मृत्यु में एक सेकेंड भी नहीं लगेगा। वे शब्द-तरंगें जिन व्यक्तियों पर केन्द्रित की जायेगी, वे बिजली से स्पर्श होने वाले प्राणी की तरह तुरन्त प्राणहीन हो जायेंगे। पर युद्ध-संबंधी आविष्कार सदैव अत्यंत गुप्त रखे जाते हैं, इसलिये आगे चलकर यह पता नहीं लगा कि वह वैज्ञानिक अपने यंत्र को कहाँ तक व्यवहारिक रूप दे सका और सैनिक अधिकारियों ने उसके संबंध में क्या निश्चय किया?
पर अब भारत तथा अन्य देशों के अनेक वैज्ञानिक शब्द-शक्ति का कितने ही रचनात्मक कार्यों में प्रयोग करने के परीक्षण कर रहे हैं। अन्नामलाई विश्वविद्यालय (दक्षिण-भारत) के वनस्पति-विज्ञान के विभागाध्यक्ष डा. टी. सी. एन. सिंह और उनकी एक सहयोगी कु. स्टेला पुनैया ने कई वर्ष तक परीक्षण करके यह सिद्ध किया है कि संगीत की ध्वनि से पौधों के स्वास्थ्य और विकास पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है। कु. पुनैया जो अच्छी संगीतज्ञ भी हैं, नित्य सुबह वायलिन बजाकर पौधों को सुनाती हैं। डा. सिंह ने परीक्षण के तौर पर बगीचे को दो भागों में बांट दिया। दोनों भागों में एक ही नस्ल के एकसे पौधे रखे गये। इनमें से एक भाग के पौधों को संगीत-ध्वनि के वातावरण में पनपने का अवसर दिया गया। डा. सिंह ने लगातार दस वर्ष तक सूक्ष्मवीक्षण (खुर्दबीन) से पौधों के आन्तरिक परिवर्तन का अध्ययन किया। इससे सिद्ध हुआ कि संगीत से पौधे शीघ्र और अच्छे आते हैं।
इस समय संसार में कई अन्य देशों में भी संगीत की शक्ति के संबंध में इस प्रकार के परीक्षण हो रहे हैं। कनाडा में गेहूँ के एक खेत के चारों ओर दूरभाषी यंत्र (लाउड-स्पीकर) लगे हुये हैं, जो प्रातःकाल सूर्योदय होते वायलिन के संगीत को प्रसारित करते हैं। अमरीका में भी कई किसान संगीत के प्रभाव से अपनी फसलें बढ़ाने के प्रयत्न में लगे हैं। दोवातेसा के श्री आर्थर लाकर की राय है कि संगीत के प्रभाव से उनके बगीचे के फूल-पौधे, सीधे, घने, ज्यादा फल-फूलदार और सुन्दर होने लगे हैं। उनमें फूल काफी अर्से तक लगे रहे और बीज निर्माण भी द्रुतगति से हुआ। अमरीका की कितनी ही गौशालाओं में संगीत के प्रभाव से गायों के दूध की मात्रा बढ़ाई गई है, यह समाचार भी सामयिक पत्रों में प्रकाशित हुआ है।
भारतीय संगीत-शास्त्र में अन्य राग-रागनियों के साथ दीपक-राग और मेघ-मल्लार-राग का नाम भी बढ़ने को मिलते हैं। जानकारों का कथन है कि दीपक-राग के गाने से दीपक स्वयमेव जल जाते थे और मेघ-मल्लार के गाने से वर्षा होने लगती थी। वर्तमान समय में संगीतज्ञ उस विधि को भूल गये हैं और कोई इस क्रिया को प्रत्यक्ष करके नहीं दिखा सकता। इससे कुछ लोग इन्हें मनगढ़न्त कल्पना बताने लगे हैं। पर यदि संगीत की ध्वनि के प्रभाव से पौधों की वृद्धि हो सकती है और गायें अधिक दूध दे सकती हैं तो कोई कारण नहीं कि दीपक-राग और मेघ-मल्लार की बात को गपोड़ा माना जाय। शब्द-शक्ति के सिद्धान्त की दृष्टि से दोनों घटनायें एक-सी हैं।
कुछ समय से संगीत के विविध राग-रागनियों द्वारा अनेक प्रकार के रोगों को मिटाने की चर्चा भी सुनाई देने लगी है। वास्तव में यह भी भारतीय संगीत-शास्त्र की एक प्राचीन उपलब्धि है। कुछ वर्ष पहले बीकानेर के राजकीय पुस्तकालय में एक हस्तलिखित ग्रन्थ मिला जिसमें बतलाया गया था कि किस राग-रागिनी के द्वारा कौन-सा रोग अच्छा किया जा सकता है। अब विदेशों के कितने ही अस्पतालों में इस विधि का प्रयोग किया जाना आरम्भ हो गया है। वहाँ जिस रोग के लिये जिस प्रकार की संगीत-ध्वनि उपयोगी मानी जाती है, उसी का रिकार्ड ग्रामोफोन पर लगाकर रोगी के पास रख दिया जाता है। स्नायु और मस्तिष्क संबंधी रोगों में संगीत का प्रयोग विशेष फलदायक सिद्ध हो रहा है।
शब्द की शक्ति पर विचार करते हुए हमारा ध्यान भारतीय-मंत्रशास्त्र की तरफ जाता है। हमारे प्राचीन धर्म-ग्रन्थ मंत्रों की महिमा से भरे पड़े हैं और आज भी करोड़ों व्यक्ति मंत्रों के जप और प्रयोग द्वारा अपनी तरह-तरह की कामनाओं को पूरा करने का उद्योग करते रहते हैं। यहाँ की साधारण जनता का तो मंत्रों में अटल विश्वास है, पर आधुनिक शिक्षा प्राप्त व्यक्ति मंत्र-शक्ति का कोई तर्क और बुद्धि-युक्त प्रमाण न मिलने से, उनको मानने से इनकार करते हैं। वे कहते हैं कि यह कैसे हो सकता है कि एक व्यक्ति द्वारा कुछ शब्दों के उच्चारण करने से दूसरे व्यक्ति का शिर का दर्द मिट जाय या बिच्छू आदि का विष उतर जाय? मंत्र द्वारा सन्तान होना, शत्रु पर विजय प्राप्त करना या लक्ष्मी की प्राप्ति आदि अनेक ऐसी बातें हैं, जिनके संबंध में लोगों में मतभेद दृष्टिगोचर होता है और प्रायः वाद-विवाद भी होने लगता है। एक मंत्र-शक्ति का पूर्णतः समर्थन करता है और दूसरा उसे कोरा बहम या कल्पना बतलाता है।
मन्त्र-शास्त्र का समर्थन करने से हमारा आशय यह नहीं कि आजकल जो ओझा, स्याने-भोपा आदि ‘मन्त्र’ का व्यवसाय करते हैं, वे सब वास्तव में उसके जानकार हैं और जो कुछ क्रिया वे करते हैं, वह पूर्णतया सच्ची होती है। जिस प्रकार आजकल सभी प्राचीन विद्याओं का लोप हो गया है और उनमें वास्तविकता के बजाय ढोंग और छल का प्रवेश अधिक हो गया है, वही दशा मन्त्र-शास्त्र की भी समझनी चाहिये। लोग न तो उसके तत्त्व को समझते हैं और न परिश्रमपूर्वक पूरा विधि-विधान करते हैं, उन्होंने तो इस केवल पेट भरने का धन्धा बना लिया है। अन्यथा जिस प्रकार विदेशों के विद्वान् पुरुष विज्ञान की विभिन्न शाखाओं की खोज कर रहे हैं और वास्तविकता का पता लगाने के लिये तन, मन, धन सब कुछ अर्पण कर देते हैं, उसी प्रकार यदि हमारे यहाँ भी शब्द-विज्ञान और उसके अंतर्गत मन्त्र-विज्ञान की खोज की जाती तो सैकड़ों ऐसे आश्चर्यजनक तथ्यों का पता लगता, जिससे हमारा व्यक्तिगत कल्याण होने के साथ ही भारतीय-संस्कृति का भी मुख उज्ज्वल होता।
भारतीय-दर्शन के मत से शब्द की शक्ति सबसे अधिक है, क्योंकि वह आकाश-तत्त्व से संबंधित है, जो सर्वाधिक सूक्ष्म होता है और सूक्ष्म-तत्त्व की शक्ति, स्थूल-तत्त्व की शक्ति की अपेक्षा कहीं अधिक होती है। बारूद या किसी अन्य स्फोटक पदार्थ को जब विशाल शक्ति के रूप में परिणित करना होता है, तो उसमें चिनगारी लगाकर उसे स्थूल से सूक्ष्म गैस के रूप में परिवर्तित कर दिया जाता है। आज हम आश्चर्य करते हैं कि प्राचीन ऋषि-मुनि किस प्रकार किसी मन्त्र या कुछ गूढ़ शब्दों का उच्चारण करके विनाश और निर्माण के बड़े-बड़े काम क्षणमात्र में कर दिखाते थे? इसका रहस्य यही था कि आज जिस प्रकार वैज्ञानिकों ने पिछले सौ वर्षों में स्फोट करने वाले स्थूल पदार्थों की खोज करते-करते भयंकर बम और घण्टे में आठ हजार मील दौड़ने वाले राकेट बना डाले, उसी प्रकार भारतीय ऋषि-मुनियों ने स्थूल पदार्थों के बजाय सबसे सूक्ष्म तत्त्व आकाश से उत्पन्न शब्द-शक्ति का अनुसंधान किया था और उसके प्रयोग की ऐसी-ऐसी विधियाँ मालूम की थीं कि जिसके प्रभाव से विश्व-ब्रह्माण्ड में भी हलचल उत्पन्न की जा सकती थी। आज भी जो लोग इस विद्या की एकाध छोटी-मोटी विधि को भली प्रकार सीख लेते हैं, वे आश्चर्यजनक कार्य कर दिखाते हैं।
मन्त्र की क्रिया में केवल उसकी ध्वनि का ही (चाहे वह सुनने में आवे और चाहे भीतर ही उच्चारण किया जाय) प्रभाव नहीं पड़ता वरन् उसकी भावना तथा संकल्प शक्तियाँ भी काम करती रहती हैं। इन दोनों के मिल जाने से मन्त्र की शक्ति बहुत बढ़ जाती है। एक विद्वान् के कथनानुसार “भारतीय लिपि और अक्षर पूर्णतः वैज्ञानिक हैं और उसकी ध्वनियों में एक विशेष रहस्य छिपा है। मन्त्र में ‘आस्था’ भी एक प्रबल तत्त्व होता है, जिसे मानने में कितने ही लोग आना-कानी करते हैं। वैसे बिना ‘आस्था’ या भावना के भी मन्त्र-शक्ति का अनुभव किया जा सकता है, पर उसमें विलम्ब अधिक लगता है। इसीलिये किसी मन्त्र को सिद्ध करने के लिये दस हजार बार या लाख बार जपने का विधान बनाया गया है। इससे उसकी ‘आस्था’ हृदय में बद्धमूल हो जाती है।”
इस सबका निष्कर्ष यही है कि शब्द की शक्ति से अनेक बड़े महत्वपूर्ण कार्य संपन्न किये जा सकते हैं। हमारे पूर्वजों ने तो इस तथ्य को पूर्ण रूप से हृदयंगम करके उसे ‘शब्द-ब्रह्म’ की संज्ञा दी थी और ‘ॐ’ के रूप में उसको सृष्टि का उत्पादक माना था। ऐसी महान् शक्ति से अपरिचित रहना या उसकी उपेक्षा करना अपने हित पर स्वयं कुठाराघात करना है। हमको इस घातक प्रवृत्ति से बच कर शब्द ब्रह्म की उपासना करके उससे अधिकाधिक लाभ उठाना चाहिये।

