शक्ति कोषों का यह उत्कर्ष साधनाओं से सम्भव
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श्रीराव नामक योगी के संबंध में देश-विदेश में अनेक चमत्कारिक वर्णन प्रचलित हैं। दहकते अंगारों पर चलना, नाइट्रिक एसिड खा लेना, काँच और कीलें खा जाना उनके लिये सामान्य बात थी। वे जल पर चलने के भी कई प्रदर्शन कर चुके हैं।
श्री बल्लभदास बिन्नानी नामक एक व्यक्ति ने एक बार ऐसे चमत्कारों की खोज के उद्देश्य से विन्ध्याचल की यात्रा की। यात्रा के दौरान उन्हें जो अनुभव हुए उनका विवरण देते हुए बिन्नानी जी लिखते हैं कि- ‘‘मैंने एक योगी महात्मा के दर्शन किये वह पानी में नंगे पाँव चलने की दिव्य क्षमता रखते थे। वह हवा में भी उड़ते थे। मैंने उनको पानी में प्रत्यक्ष चलते हुए देखा और फोटो भी उतारी।”
यह कहने पर कि योगीजी आप इस तरह की सिद्धियों का सार्वजनिक प्रदर्शन क्यों नहीं करते तो उन्होंने भर्तृहरि का निर्देश सुनाते हुए बताया कि चमत्कारों का प्रदर्शन अहंकार बढ़ाता है और योगी को पथ-भ्रष्ट करता है। सिद्धियाँ आत्म-कल्याण के लिये हैं न कि प्रदर्शन के लिये? तो भी अनेक सिद्ध-महात्माओं द्वारा ऐसे चमत्कार यदा-कदा देखने को मिल ही जाते हैं।
लुंका में जबर्दस्त बाढ़ आई हुई थी। सारा नगर कुछ ही क्षणों में जलमग्न हो जाने वाला था। इंजीनियरों की सारी शक्ति निष्क्रिय हो गई, सब पाताल समाधि की प्रतीक्षा कर रहे थे। उसी समय कुछ व्यक्तियों ने फ्रीडियन नामक साधु से जाकर प्रार्थना की- महात्मन्! इस दैवी प्रकोप से बचाव का कुछ उपाय आप ही कीजिये। कहते हैं, महात्मा फ्रीडियन ने ओसर नदी की धारा योग बल से मोड़ दी और नगर को डूबने से बचा लिया।
एग्निस नाम की एक ईसाई महिला हुई हैं। उन्होंने अपने जीवन का अधिकाँश भाग योगाभ्यास में लगाया। उनके आश्रम में 20 और साधिकायें रहती थीं, एक बार उन्हें तीन दिन तक कुछ भी खाने को न मिला। एक साधिका भूख से अति व्याकुल होकर बोली- ‘‘मैडम हमें रोटी दो नहीं तो हम मर जायेंगी।” एग्निस ने कहा- ‘‘अच्छा बगल वाले कमरे में रोटियाँ रखी हे, उठा लाओ।” उस बिहार में अन्न का एक दाना भी न था पर उन्होंने इतने विश्वासपूर्वक कहा जैसे वह स्वयं पकाकर रोटियाँ रख आई हों। साधिका वहाँ गई तो सचमुच एक पात्र में रोटियाँ थीं। उन्हें खाकर सबने भूख मिठाई।
स्वामी ब्रह्मानन्द का एक भाषण काशी में हुआ। उसमें कई रूढ़िवादी उनसे बहुत रुष्ट हो गये। एक दिन स्वामी जी गंगातट पर बैठे ध्यान कर रहे थे, तभी उधर कुछ विरोधी आ पहुँचे। उन्होंने बदला निकालने का यह अच्छा अवसर समझा। इसलिये दो हृष्ट-पुष्ट युवक आगे बढ़े और पद्मासन बैठे स्वामी जी को जबर्दस्ती उठाकर पानी में फेंक दिया। स्वामी जी उन दोनों युवकों को भी हाथ में कसे लेते चले गये पर जब वे डूबने लगे तो उन्हें छोड़ दिया और आपने स्वयं नदी की सतह पर पद्मासन समाधि लेली। बाहर मुसलमान बड़ी देर तक हाथों में पत्थर लिये खड़े रहे कि स्वामी जी बाहर निकलें तो उन पर पत्थर दे मारें। पर वह स्थिति ही नहीं आई। स्वामी जी शाम तक जल के अन्दर ही बैठे रहे। जब वे वहाँ से चले गये तो वे शाँति-भाव से बाहर निकल आये।
अनेक लोगों का विचार है कि अब मानव शरीर की क्षमतायें क्षीण होती जा रही हैं पर आधुनिक विज्ञान भी अब शास्त्रों की ही बात बोलने लगा है। सोवियत वैज्ञानिकों ने अभी पता लगाया है कि मानव शरीर की क्षमतायें अब तक हुई जानकारी से हजारों गुनी अधिक हैं। भयानक सर्प या कुत्ते से बचने के लिये कई व्यक्ति जो कभी 1 फुट भी नहीं उछल सकते थे, भयावेश में तीन-तीन मीटर ऊँची दीवार कूद जाते हैं। जेल से भागते हुये कैदी लोहे की सलाखें मोड़ सकते हैं, यह सब क्रियायें यह बताती हैं कि मनुष्य शरीर की सामर्थ्य बहुत अधिक है। शरीर में कुछ तत्त्व और सूक्ष्म एवं अत्यंत मर्म-स्थान हैं, उनमें भरी हुई शक्तियों को जागृत कर मनुष्य भीम की तरह बलवान्, नागार्जुन की तरह रासायनज्ञ, संजय की तरह दूरदृष्टि वाला, अर्जुन की तरह अन्य लोकों में गमन करने वाला, रामकृष्ण की तरह परमहंस और गुरु गोरखनाथ की सी चमत्कारिक सिद्धियाँ पा सकता है। शारीरिक शक्ति में इस तरह की वृद्धि का उद्गम मस्तिष्क है। विशेष परिस्थितियों में मस्तिष्क माँस-पेशियों को उद्भट कार्य करने का आदेश देता है और उनमें से कुछ सूक्ष्म तत्त्व निकलकर अपना प्रभाव दिखाते हैं। वैज्ञानिकों ने हाल में ऐसी विधियाँ ढूँढ़ी हैं, जिनसे कृत्रिम रूप से शारीरिक शक्ति बढ़ाई जा सकती है।
मस्तिष्क के आदेशों को बीच में रोक लिया जाता है और मानव शरीर को एक विशेष प्रकार का ट्रांजिस्टर बनाकर उन आदेशों की शक्ति बढ़ा दी जाती है। इससे मनुष्य अति मानवीय शक्ति संपन्न हो जाता है। शरीरस्थ जीवाणुओं को प्राण और संकल्प शक्ति के द्वारा हल्का और भारी करके, सम्मोहन क्रिया द्वारा थोड़ी देर में बहुत भारी प्राण की मात्रा खींच करके ऐसे असामान्य कार्य दिखलाये जा सकते हैं, जिन्हें चमत्कार कहा जा सकता है।
इन सिद्धियों, सामर्थ्यों को पाकर मनुष्य उन स्थितियों में भी आनन्दपूर्वक रह सकता है, जिनमें साधारण लोग जाकर जीवित नहीं रह सकते। उदाहरणार्थ त्रिशिख-ब्राह्मणोपनिषद् में कुछ ऐसे प्राणायामों का वर्णन है, जिनका तीन वर्ष तक अभ्यास से मनुष्य जितेन्द्रिय और अल्पाहारी हो जाता है, यह एक-दो घण्टे की नींद से ही पर्याप्त विश्राम लेकर दीर्घजीवी हो सकता है। नाभिकन्द में प्राण धारण करने से कुक्षि रोग नष्ट होते हैं। योग कुंडल्युपनिषद् में उज्जायी क्रिया का वर्णन है, उससे नाड़ी संबंधी जलोदर और धातु संबंधी रोग दूर होते हैं, कुण्डलिनी जागरण किया हुआ योगी भयंकर विष भी पचा सकता है। दूसरे की मन की बात ऐसे जान सकता है, जैसे उससे स्वयं ही बता दी हो।
अष्ट सिद्धियाँ- अणिमा, महिमा, गरिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशत्व और वाशित्व को प्राप्तकर मनुष्य इसी देह में ईश्वर तुल्य शक्ति का अनुभव कर सकता है और संसार में होने वाले घटना-चक्रों को परास्त कर सकता हे, विस्फोट कर सकता है, शाप, वरदान, प्राण संचार या संदेश प्रसारण कर दूसरों का भला भी कर सकता है और लोगों के जीवन की दिशायें भी मोड़ सकता है।
श्री श्यामाचरण भी लाहिड़ी एक-बार हिमालय गये। वहाँ एक युवा संन्यासी से उनकी भेंट हुई। साधु उन्हें एक गुफा में ले गया और एकान्त में ले जाकर उनके सिर पर हाथ रखा। श्री लाहिड़ी जी लिखते हैं- ‘‘मुझे ऐसा लगा कि यह हाथ नहीं कोई प्रचण्ड विद्युत शक्ति वाला दंड था, उससे मेरे शरीर में प्रकाश भरना प्रारम्भ हुआ मुझे पूर्व जीवन की स्मृतियाँ उभरने लगीं। यहाँ तक कि मैंने अनेक वस्तुयें ऐसी भी पहचानी, जिनका मेरे पिछले जन्मों से संबंध था, मैं अनुभव करता हूँ कि गुरुओं का प्राण योग्य शिष्य इसी तरह पाकर स्वल्पकाल में ही दीर्घ प्राणवान बनते होंगे।
योग सिद्धियों का विवेचन करते हुये भर्तृहरि ने लिखा है- कि जब चित्त से रजोगुण (अर्थात् सुख की इच्छायें) और तमोगुण (अर्थात् पाप की इच्छायें) नष्ट हो जाती हैं और ईश्वरीय प्रकाश की स्थिरता आ जाती है, उस समय भूत और भविष्य की बातें चित्रपट की भाँति स्पष्ट दिखाई सुनाई देने लगती हैं।
योग साधना की शक्ति विवेचन करते हुए शास्त्र कार ने स्पष्ट कहा है-
विश्व रूपस्य देवस्य रूपं यत्किचिदेव हि।
स्यवीय! सूक्ष्म श्रद्धा पश्यन्हृदय पंकजे॥
- त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद्। 15
जो लोग इस स्थूल सूक्ष्म और अन्य प्रकार से डडडड संसार को ही भगवान का रूप मानते हैं और उसकी डडडड कमल में आराधना करते हैं, वह साक्षात् उन्हीं के रूप डडडड हो जाता है और अणिमादि सिद्धियों के फल को अनायास ही पा लेता है।

