महात्मा ईसा
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महात्मा ईसा अपनी दयालुता के कारण सदा दुःखी और पापी कहे जाने वाले अपराधियों से हर समय घिरे रहते थे। यहाँ तक कि जब वे भोजन किया करते थे, तब भी बहुत से पतित लोग उन्हें घेरे रहते थे।
एकबार वे बहुत से नीच जाति और पापी, पतितों के साथ बैठे भोजन कर रहे थे। ये देखकर उनके एक विरोधी ने उनके शिष्य से कहा- ‘‘तेरे गुरु! जिसे तुम लोग भगवान का बेटा और पवित्र बतलाते हो, इस प्रकार नीचों और पतितों से प्रेम करता है, उनके साथ बैठा भोजन कर रहा है फिर भला तुम लोग किस प्रकार डडडड कर सकते हो कि हम लोग उसका आदर और उसकी बात मानें?”
महात्मा ईसा ने विरोधी की बात सुन ली और विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया- ‘‘भाई वैद्य की आवश्यकता रोगियों को होती है, निरोगों को नहीं। धर्म की आवश्यकता पापियों को होती है, उनको नहीं जो पहले से ही अपने को धार्मिक समझते हैं। मैं धर्मात्माओं का नहीं पापियों का हित करना चाहता हूँ। उन्हें मेरी बहुत जरूरत है।”

