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Magazine - Year 1968 - Version 2

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आस्तिकता मानव-जीवन की अनिवार्य आवश्यकता

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केवल राज-दण्ड और राज-नियमों के आधार पर समाज में स्थायी सुख-शाँति की आशा कभी पूरी नहीं हो सकती। यदि ऐसा सम्भव होता तो, संसार के सारे देशों में राज-नियम लागू हैं और राज-दण्ड की भी व्यवस्था है, तब भी संसार का एक भी ऐसा देश नहीं है, जिसमें पूर्ण शाँति के लक्षण दिखलाई दें। सभी देशों और सभी समाजों में अपराध और पाप होते हैं, जिनके कारण लोग अशाँत और दुःखी रहते हैं।

समाजों में स्थायी सुख-शाँति तो कभी सम्भव है, जब जन-जन अपना उत्तरदायित्व समझे, पाप और अपराधों से बिना किसी दबाव के डरे और नैतिकता का मूल्य माने स्वयं आत्म-प्रेरणा से दुष्कर्मों से विमुख रहे। सामाजिक एवं राजकीय नियम तथा प्रतिबन्ध एक अल्प-सीमा तक ही जन-साधारण को कुमार्गगामी होने से रोक सकते हैं। उनकी क्षमता में केवल इतना हो होता है कि जिसने कोई दुष्कर्म किया है, उसकी निन्दा, भर्त्सना करलें या दण्ड दिलवा दें। यह तो कुकर्म का परिणाम है, इससे उसकी प्रवृत्ति कहाँ रुकी।

बहुत बार तो लोग इतने निर्लज्ज हो जाते हैं कि बार-बार दण्ड पाते हैं और बार-बार अपराध करते रहते हैं। उन्हें समाज में निन्दा अथवा लांछना का कोई भय नहीं रहता। इतना ही क्यों बहुत बार तो अपराधी अपनी चतुरता, साधनों अथवा परिस्थितियों का लाभ उठा कर दण्ड व्यवस्था से भी बच निकलते हैं और तब उनकी वह प्रवृत्ति और भी उत्साहित हो उठती है।

पाप प्रवृत्ति का दमन बाह्य प्रतिबन्धों अथवा भयों से नहीं हो सकता। उसका दमन तो मनुष्य की स्वयं की अन्तःप्रेरणा से ही संभव है। इस अन्तःप्रेरणा का आधार पूर्ण आस्तिकता ही हो सकती है। जब मनुष्य को यह निश्चय हो जायेगा कि ईश्वर सर्वव्यापक है, न्यायशील तथा सर्वशक्तिमान है, सबके प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष, अच्छे-बुरे कामों का साक्षी है, देखने और जानने वाला है, तो वह चोरी से भी पाप-कर्म करते डरेगा। उसे विश्वास रहेगा कि वह जो कुछ करेगा, उसको ईश्वर अवश्य देखेगा और उसके अनुसार पूरा-पूरा दण्ड देगा। ईश्वर के अस्तित्व, उसकी सर्वव्यापकता और न्यायशीलता में निश्चय हुए बिना मनुष्य के लिये सहज सम्भव नहीं कि यह अज्ञानवश सुन्दर, सुखकर तथा लाभकर दिखलाई देने वाले पापों के आकर्षण से बचा रह सके। पापों में बड़ा भयानक प्रलोभन होता है। जो मनुष्य को हठात् अपनी ओर खींच ही लेता है। इसकी रक्षा का एकमात्र उपाय सच्ची और संपूर्ण आस्तिकता ही है।

पाप का बीज विचारों में रहता है और उसकी परिणति कर्मों में होती है। अंतःकरण में कुविचार उठते ही मस्तिष्क भी उसके अनुसार योजना रचने लगता है, जिस शरीर को इन्द्रियों की सहायता से अनायास ही कार्यान्वित कर डालता है। यद्यपि इस प्रक्रिया के बीच-बीच में राजदण्ड और समाज का भय भी काम करता रहता है, किन्तु निर्बल नैतिकता के कारण वह कुछ अधिक उपयोगी सिद्ध नहीं हो पाता। कुविचार के सहायक दुःसाहस के बल पर लोग उस कल्याणकारी भय ही उपेक्षा कर देते हैं। निष्पाप नैतिकता के विकास और उसकी प्रबलता के लिये विचारों का निर्विकार होना बहुत आवश्यक है।

ईश्वर की सर्वव्यापकता, सर्वशक्तिमत्ता और निष्पक्ष न्यायशीलता का निश्चय हुए बिना अनैतिक विचारों को नहीं रोका जा सकता। कुविचारों पर अंकुश रखना तभी संभव होगा, जब कर्मफल, स्वर्ग-नरक, लोक-परलोक पुनर्जन्म और अधर्म योनियों में विश्वास पैदा हो। इन सत्यों का विश्वासी निश्चय ही कुमार्ग पर पैर रखते डरेगा। उसका यह विश्वास तुरन्त ही पाप-पथ की ओर बढ़ते हुये उसके पैरों में जंजीर डाल देगा। इस प्रकार का कल्याणकारी भय किसी आस्तिक के हृदय में ही उत्पन्न हो सकता है, नास्तिक के हृदय में नहीं।

आज के घोर भौतिकवादी युग में आध्यात्मिक विचार यदि पूरी तरह मिट नहीं गई है तो कम अवश्य हो गई है। इसी कारण आज आस्तिकता के भाव भी ज्यादा दिखलाई नहीं देते। ईश्वर के प्रति यथार्थ निष्ठा में कमी आज जाने का ही तो यह परिणाम है कि आज संसार में चारों ओर अशाँति, भय और आशंका का वातावरण दिखलाई देता है। संपन्न-से-संपन्न और समुन्नत समाज व राष्ट्र, सुख-शाँति के लिये तरह रहे हैं। आस्तिकता की कमी के कारण कुकर्म बढ़ गये हैं और आज की सर्वव्यापी अशाँति उन्हीं कुकर्मों का ही तो फल है। भौतिकवाद की प्रबलता के कारण जो आज परस्पर राग-द्वेष और छीना-झपटी की अनीतिपूर्ण प्रक्रिया चल रही है, वही आज कष्टों, क्लेशों और शोक-संतापों के रूप में फलीभूत होकर जनसमुदाय को चैन की साँस नहीं दे रही है। राग द्वेष, स्वार्थ और संघर्ष का जन्म-दाता माना गया है। लोगों में स्वयं के प्रति इतना स्वार्थ और राग बढ़ गया है कि वह समष्टि के प्रति एक प्रकार से अंधे हो गये हैं। सब कुछ अपने लिये चाहने वाले और दूसरे के हितों एवं अधिकारों के प्रति द्वेष रखने वाले समाज में अशाँति तथा असुख की परिस्थितियों के लिये विशेष उत्तरदायी हैं। स्वार्थी को यदि सौ नास्तिकों का एक नास्तिक मान लिया जाय तो कुछ अनुचित न होगा।

संसार में व्यक्तिगत अथवा समष्टिगत जितने प्रकार के जो भी कष्ट-क्लेश दिखलाई देते हैं, वह सब तदनुसार कुकर्मों का ही फल है। ऐसा नहीं कि कुकर्म करने वाले को ही केवल अपने किये का फल भोगना होता हो, उसे तो भोगना ही होता है, लेकिन उसका प्रभाव दूसरे लोगों के माध्यम से समाज पर भी पड़ता है। व्यक्ति के साथ समाज को भी दुःख का भाग भोगना पड़ता है। शरीर के अंगों की तरह व्यक्ति भी समाज के एक अंग होते हैं। जिस प्रकार शरीर का कोई भी अंग यदि दूषित हो जाता है तो उसका घोड़ा-बहुत प्रभाव सारे शरीर पर पड़ता है। उसी प्रकार व्यक्ति की बुराई से भी समाज सर्वथा बचा नहीं रह सकता। जिस समाज में जितने ही दूषित, बुरे और कुकर्मी व्यक्ति बढ़ते जाते हैं, उसमें उसी अनुपात से दुःख और कष्टों की वृद्धि होती जाती है।

इसीलिये व्यक्ति की बुराई से समाज को बचाने के लिये पूर्वकाल में पापी के बहिष्कार अथवा सार्वजनिक निन्दा की एक प्रथा प्रचलित थी। राज-दण्ड की तरह यह सामाजिक दण्ड भी अपरिहार्य माना जाता था। समाज द्वारा दिया जाने वाला यह बहिष्कार व सार्वजनिक घृणा का दण्ड, मृत्यु-दण्ड से भी अधिक भयानक होता था। इसके डर से लोग किसी हद तक बुराई से बचे रहने का प्रयत्न करते थे।

अब संसार के लगभग सभी समाज से यह व्यवस्था उठ गई है। जिन समाजों में इसका कुछ अवशेष दिखलाई भी देता है, हुक्का-पानी अथवा रोटी-बेटी तक ही दिखलाई देता है और उसका कारण भी कोई सामाजिक मान्यता अथवा रूढ़ि का उल्लंघन करना ही होता है। असत्य, बेईमानी, शोषण, चोरी, जुआ अथवा अन्य अनीतिपूर्ण कार्यों के लिये, जिनका कि कुप्रभाव सारे समाज की शाँति और व्यवस्था पर पड़ता है, सामाजिक बहिष्कार की प्रथा अब कहीं भी दिखलाई नहीं देती।

अपितु, आज तो इसका उलटा रूप दिखलाई देता है। बहुधा ऐसे कुकर्मियों से लोग डरकर अथवा किसी प्रकार के लाभ के लोभ से उनका समर्थन तक करने लगते हैं। ऐसी विपरीत दशा में समाज की सुख-शाँति को क्षति पहुँचना स्वाभाविक है। प्राचीनकाल में प्रथम से नास्तिक कदाचित् ही होते थे और यदि यदा-कदा किसी में उसके लक्षण दिखाई भी देते थे तो उसका सामाजिक बहिष्कार होते देर नहीं लगती थी। लोग उससे बोलना, बात करना, उसका संग करना अथवा किसी प्रकार का संबंध रखना पसंद नहीं करते थे। नास्तिक व्यक्ति को बड़ा पापी माना जाता था। उसका कारण यही था कि नास्तिक को लोक-परलोक, स्वर्ग-नरक अथवा पुनर्जन्म और कर्मफलों में अनास्थावान माना जाता था। प्रायः नास्तिक होते भी ऐसी ही विचार-धारा के। जिन्हें कर्मफलों का भय ही नहीं वह कोई भी कर्म-कुकर्म करते संकोच भी क्यों करेगा। केवल भोगवादी होने के कारण इन्द्रिय-सुख में ही उसकी लिप्सा बनी रहने से उसका अनैतिक हो जाना कोई असम्भाव्य बात नहीं होती। अनैतिक व्यक्ति का समाज के लिये दुःखदायी होना स्वाभाविक ही है। अस्तु, समाज नास्तिक में इन सब दोषों को मनोनीत मानता था और सार्वजनिक सुख-शाँति की रक्षा के लिये शीघ्र ही उसका बहिष्कार करने का प्रयत्न करता था।

आज ऐसा कोई भय रह नहीं गया है। इसलिये लोग वास्तविक आस्तिकता से विमुख होते संकोच नहीं करते। आज के युग में बहुत से लोग आस्तिकता को ढकोसला तक कहने लगे हैं। ईश्वर को मनुष्य की कल्पना और धर्म अथवा नैतिकता को अप्राकृतिक प्रतिबंध तक मानने लगे हैं। ऐसी ही निरंकुश मनोवृत्ति वाले लोग अपने स्वार्थ के लिये सामाजिक हितों पर ध्यान नहीं देते और मनमाने ढंग से जीवन चलाते हुए असुख एवं अशाँति की परिस्थितियाँ पैदा करते हैं।

आज सामाजिक बहिष्कार की प्रथा है नहीं और राजदण्ड अनैतिकता, अपराधों को रोक सकने में पूर्णतया सफल नहीं हो पा रहा है। सफल हो भी किस प्रकार? पुलिस और गुप्तचरों की इतनी पर्याप्त संख्या हो सकना सम्भव नहीं कि वह इतने विशाल जनसमूह पर पहरा दे सके अथवा हर जगह गुप्त प्रकट स्थानों पर जाकर अपराधों एवं अनैतिकताओं का पता लगा सके, जो अपराधी पकड़े जाते हैं, उन पर आरोप सिद्ध करने के लिये गवाही, शहादत और सबूत पर्याप्त मात्रा में जुट सकना कठिन होता है। फिर बहुत से अपराधी इन सब व्यवस्थाओं के बावजूद भी छूट जाते हैं। साधन संपन्न और धन व्यय कर सकने वालों को तो ऊँचे-से-ऊँचे वकीलों की योग्यताओं के आधार पर बच जाने की और भी सुविधा रहती है। ऐसी दशा में केवल एक ही सफल उपाय रह जाता है, और वह है मनुष्यों की मनोभूमि का सुधार, जिससे कि उसमें न तो कुविचार ही आयें और न अनैतिक भावना का जन्म हो। मनुष्य की अन्तःप्रेरणा सत्कर्मों की ओर अग्रसर हो।

इस पावन स्थिति को चरितार्थ करने के लिये आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्यों में अधिक-से-अधिक आस्तिकता का विकास किया जाये। उसकी शिथिल होती होती हुई आस्थाओं का बल प्रदान दिया जाये। जिस दिन मनुष्य में वास्तविक आस्तिकता का विकास हो जायेगा- उनकी अन्तःप्रेरणा सदोन्मुखी हो चलेगी। ज्यों-ज्यों इस दिशा में प्रगति होती जायेगी, त्यों-त्यों समाज में अशाँति एवं असुख की परिस्थितियाँ हम होती जायेंगी। जिस प्रकार नास्तिकता सारे अनैतिक कर्मों की जड़ है, उसी प्रकार आस्तिकता सत्कर्मों की मूल आधार है। अस्तु, हम सबको स्वयं को आस्तिक बनना ही चाहिये, साथ ही इस परमात्म-भाव की आस्था अन्य लोगों में भी उत्पन्न करते रहना चाहिये। इस मार्ग से समाज और संसार में स्थायी सुख-शाँति की स्थापना सम्भव हो सकती है।

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