भूतकाल की घटनायें भी देखी जा सकती हैं।
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जब आइन्स्टीन ने विश्व के रूप और उसकी क्रियाओं को गणित के आधार पर सत्य सिद्ध किया और सापेक्षवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया, तब से वैज्ञानिकों में यह चर्चा उठ खड़ी हुई है कि क्या हम भूतकाल की घटनाओं को फिर से असली रूप में देख सकते हैं? आइन्स्टीन ने सापेक्षवाद द्वारा सिद्ध किया था कि भूतकाल की घटनायें यद्यपि हमारे लिये समाप्त हो चुकीं, पर विश्व-ब्रह्माँड में उनकी तरंगें अब भी वर्तमान हैं, और किसी अन्य लोक के निवासी यदि उनके पास उपयुक्त साधन हों, तो उनको इस तरह देख सकते हैं, जैसे वे उनके सामने ही हो रही हैं। इस सिद्धान्त को सही मानकर किसी तेज मस्तिष्क आविष्कारक ने रेडियो के समान एक ऐसा यन्त्र बना सकने की कल्पना भी की थी कि जिसकी सुई को यदि 500 वर्ष पीछे हटा दिया जाय तो शीशे पर सन् 1450 की घटना दीखने लगे और पाँच हजार वर्ष पीछे कर दिया जाय तो कौरव-पाण्डवों का महाभारत-संग्राम और भगवान् कृष्ण का अर्जुन को गीतोपदेश करना सुनाई पड़ने लगे।
रेडियो, जो सौ वर्ष पहले ही बुद्धिमान- से- बुद्धिमान व्यक्ति को असम्भव जान पड़ता था, आज दस-बारह वर्ष के लड़कों के बगल में लटका हुआ खेल की तरह लन्दन डडडड की आवाज सुना रहा है। आज-कल भी अनेक व्यक्तियों को जो भूतकाल की घटनायें आकस्मिक रूप से दिखलाई पड़ जाती हैं, उसका क्या कारण और क्या रहस्य है? और क्या हम वैज्ञानिक-यन्त्र नहीं तो और किसी उपाय से उनको देख सकते हैं? पर इस समस्या पर सिद्धान्त रूप से विचार करने के पहले हम इस संबंध की कुछ घटनाओं का वर्णन यहाँ करना चाहते हैं। इनमें से प्रथम घटना को श्री ए. एम. फिलिप्स नामक विद्वान् ने एक अंग्रेजी पत्रिका में प्रकाशित कराया था, तत्पश्चात एक हिन्दी सामयिक पत्र में वह प्रकाशित हुई थी-
कुमारी सी. एन. ई. मोबर्ले और कुमारी एलेनोर एफ. जोर्डन आक्सफोर्ड के सेन्ट ह्यूम कालेज में पढ़ाती थीं। उन्होंने 10 अगस्त 1901 को बर्साई (फ्राँस) की यात्रा की थी और उनका मुख्य उद्देश्य ऐतिहासिक इमारतों को देखना था। वे एक बड़े उद्यान में बने प्राचीन राजमहल को देखने गई। महल को देखने के बाद वे इसके पीछे बनी विशाल फुलवाड़ी में पहुँचीं। उसी समय उनको अलौकिक घटनायें दिखाई पड़ीं।
उनको ऐसा जान पड़ा कि सामने ही एक अन्य महल बना है और उसके पास दो पहरेदार हरे रंग की वर्दी और तिकोने हैट पहिने खड़े हैं। उन्होंने दोनों महिलाओं को आगे चले आने को कहा। उन्होंने देखा कि वह एक छोटा-सा सुन्दर और सजा हुआ महल है। महल के दरवाजे पर भी एक पहरेदार खड़ा था और उसके पीछे एक नवयुवक था, जो हाव-भाव से बहुत आतंकित जान पड़ता था। वह उत्तेजना के मारे हाँफ रहा था। उसने घबराये हुये स्वर में उन महिलाओं से कुछ बातचीत की पर उसकी भाषा बदली हुई थी, जिससे वे दो-चार शब्द ही समझ पाई।
उद्यान में एक छोटा-सा झरना बह रहा था और उस पर सुन्दर पुल बना था। जब महिलायें उस पुल पर पहुँचीं तो उनकी निगाह समीप ही बैठी एक सम्भ्रान्त रमणी पर पड़ी जो सामने के वृक्षों का चित्र बना रही थी। जब वे और आगे बढ़ीं तो गिरजे में से एक व्यक्ति ने निकल कर कहा कि अगर आप महल देखना चाहती हैं तो सामने के दरवाजे से आइये। महल दिखाकर वह उनको उद्यान के बाहर छोड़ गयी। पर कुछ सेकेंड बाद उन्होंने मुड़कर देखा तो वहाँ उस महल और पहरेदारों आदि का कोई चिन्ह न था, केवल फुलवाड़ी दिखाई पड़ रही थी। सन् 1902 में वे पुनः बर्साई गईं और बगीचे में पहुँचने पर फिर उन्हीं दृश्यों और व्यक्तियों को देखा। इसी प्रकार एक फ्राँसीसी परिवार ने भी सन् 1907-08 में उक्त बगीचे में ठीक इसी प्रकार के दृश्य देखे थे।
जब इन घटनाओं की ऐतिहासिक दृष्टि से खोज की गई तो सिद्ध हुआ कि इन लोगों ने जो दृश्य देखे थे वे सन् 1789 के आस-पास के थे, जबकि वहाँ कोई राजवंशीय व्यक्ति रहते थे। फिर किसी घटनावश उनका अन्त हो गया पर उनकी स्मृतियाँ उस स्थान को ऐसी लिपटी रह गईं कि समय-समय पर कुछ व्यक्तियों को छाया रूप में उनका अनुभव होता रहा। कुछ अन्वेषकों ने इस संबंध में यह भी सम्मति प्रकट की कि सन् 1901 में सम्पूर्ण योरोप में एक विद्युत-धारा प्रवाहित हुई थी और उसी विद्युत-चुंबकीय शक्ति ने इन दृश्यों को उपयुक्त मानसिक अवस्था वाले व्यक्तियों के लिये साकार कर दिया। अथवा इन व्यक्तियों की मनोभूमि में ही कोई ऐसी विशेषता थी, जिससे उन्हें इन छाया-लोक की घटनाओं को देख सकना सम्भव हो सका, ठीक उसी प्रकार जैसे भूत आदि को कोई एक व्यक्ति देखता है, पर पास ही उपस्थित अन्य लोगों को कुछ दिखाई नहीं पड़ता।
इसी प्रकार की एक घटना इंग्लैंड के गैमर्सी टावर नामक गाँव के ले. कर्नल डेविड स्मिथ ने सामयिक पत्रों में प्रकाशित कराई थी। उन्होंने लिखा था-
मेरे लड़के का डेवन में एक बहुत बड़ा कृषि-फार्म है। यह बिल्कुल सुनसान जगह में है और दूसरा घर वहाँ से करीब एक मील पर है। एक दिन प्रातः काल मेरा लड़का मकान के पिछले भाग में गोशाला में था। करीब साढ़े सात बजे थे। वह घोड़ों की टापों की आवाज सुनकर आश्चर्यचकित रह गया। यह आवाज मकान के पीछे से आ रही थी, मानो कोई फौज मकान के बगल में जा रही हो। घोड़ों की टापों के अलावा हथियारों की झन-झनाहट भी साफ सुनाई देती थी। रास्ते के बहुत तंग होने के कारण सड़क साफ-साफ नहीं दिखाई पड़ती थी। इससे वह दौड़कर आँगन में पहुँचा जहाँ से सड़क दिखाई पड़ती थी। वहाँ कुछ न दिखाई दिया पर आवाज अब भी सुनाई पड़ रही थी। जब वह फार्म में गया तो उसे दो अन्य नौकर मिले, जो उससे भी अधिक आश्चर्य में थे। उन्होंने भी देखा तो कुछ न था, पर आवाज साफ तौर पर सुनी थी। उनमें से एक उस समय घोड़ों को मल रहा था और दूसरा दूध दुह रहा था। मेरे लड़के ने यह सोचकर कि ये नौकर बड़े अन्ध-विश्वासी होते हैं, उनसे कुछ न कहा और बात को टालकर चला आया, पर वह स्वयं इस घटना का कारण जानने को उत्सुक था।
ले. कर्नल स्मिथ के पत्र को पढ़कर एडिनब्रिजकेंट की श्रीमती सी. ई. फाक्स ने लिखा है कि ऐसी घटना उनके चाचा ने सन् 1900 या 1901 में देखी थी। इसके पश्चात् कुछ लोगों ने खोज-बीन करके पता लगाया कि वह स्थान किसी जमाने में रोमन सैनिकों का निवास-स्थान रहा था और अब भी कभी-कभी वे आस-पास घूमते दिखाई पड़ जाते हैं। वहाँ के दो-एक खेतों के विषय में जानकारों का कहना है कि उनमें सौ वर्ष पहले तक रोमन कब्रिस्तान था। अब वहाँ कभी-कभी भूतकाल की घटना अदृश्य रूप से दुहराई जाती है। विशेषतः किसी बड़े युद्ध के अवसर पर प्रायः ऐसा होता है।
इंग्लैंड की एकाध ऐतिहासिक घटना भी लोगों ने इसी तरह देखी है, और वहाँ के बादशाह चार्ल्स प्रथम ने ‘जस्टिस आफ पीस’ विलियन उड द्वारा जब उसकी जाँच कराई तो उसे सत्य पाया गया। जहाँ यह घटना देखने में आई थी, वहाँ के ग्राम निवासियों ने बतलाया-
“दिन के 12 और 1 बजे के बीच गड़रियों, देहातियों और अन्य यात्रियों ने पहले ढोल की आवाज सुनी और इसके बाद सैनिकों के कराहने की आवाज सुनाई पड़ी। इससे वे डर गये और भाग जाना चाहते थे। इसी तरह प्रेम-सेनायें दिखाई पड़ीं, जो ढोल बजा रही थीं। बन्दूकें छूटने लगीं, घोड़े हिन-हिनाने लगे। एक सेना शाही झंडा लिये थी और दूसरी पार्लियामेंट का झंडा। यह युद्ध दो या तीन बजे तक होता रहा। बेचारे गरीब दर्शक इतने घबड़ा गये थे कि उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास न हो रहा था।”
हमारे यहाँ मद्रास प्रान्त में एक रणक्षेत्र के विषय में भी यही बात कही जाती है। वर्ष में एक दिन वहाँ घोड़ों की टाप, रणभेरी की आवाज सुनाई पड़ती है और संध्या के धूमिल प्रकाश में तंबू, हाथी और सैनिक दिखाई देते हैं।
यह सब कैसे होता है इसके संबंध में अधकचरे वैज्ञानिकों को शंका, अश्रद्धा और बहकावे का सन्देह हो सकता है, पर जिन लोगों की अध्यात्म-विद्या की तरफ रुचि है और जो सूक्ष्म शरीर और कर्मों की सूक्ष्म गति को कुछ समझते हैं, उनको इसमें कोई आश्चर्य प्रतीत नहीं होता। हमारे यहाँ तो भूतकाल की बातों को जानना और देखना भी योग-विद्या का एक बहुत छोटा कार्य माना जाता था। हमारी पौराणिक कथाओं के तो प्रत्येक पृष्ठ पर यही बात पर यही बात पढ़ने में आती है कि अमुक व्यक्ति ने किसी ऋषि या मनीषी से अपनी कठिनाइयों के विषय में पूछा तो उन्होंने तुरन्त उसके एक नहीं अनेक जन्मों का वृतान्त इस प्रकार सुना दिया, मानो वे उसके गत जीवनों का फिल्म देख रहे हों। और वास्तव में बात ऐसी ही होती भी है। भारतीय कर्म फिलासफी के अनुसार मनुष्य का कोई कर्म तब तक नष्ट नहीं होता, जब तक वह उसका फल भोग नहीं लेता। मनुष्य के कर्म आकाश में उसी प्रकार अंकित रहते, जैसे कुछ फुट लम्बे फिल्म-रील पर लाखों छोटे-छोटे चित्र बने रहते हैं। इसी को पौराणिक-भाषा में चित्रगुप्त द्वारा मनुष्य के समस्त कर्मों का ‘हिसाब-किताब’ रखना कहा जाता है।
जिन लोगों को योग दृष्टि प्राप्त हो गई और जो अपनी चेतना को सूक्ष्म-जगत् में पहुँचाने में समर्थ हैं, उनके लिये भूतकाल को देख सकना कुछ भी कठिन नहीं है अध्यात्म सिद्धान्त के अनुसार आत्म-तत्त्व और प्राण-तत्त्व समस्त संसार में व्याप्त हैं और उनमें कहीं भी ऐसा व्यवधान नहीं पाया जाता जैसा कि हमको स्थूल जगत में अनुभव होता है। प्राणमय जगत् में प्रविष्ट होने वाला एक ही स्थान पर बैठकर सब कुछ देख और जान सकता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति स्थूल देह में अपनी सूक्ष्म देह को पृथक कर सकते हैं, वे भी अनेक अदृश्य और अज्ञात तत्त्व को जान सकते हैं और कितने ही चमत्कार जान पड़ने वाले कार्य कर सकते हैं।
भारतीय अध्यात्म-विद्या के पतन और लुप्त होने का मुख्य कारण यही है कि अन्य कार्यों की तरह इसमें भी अनेक ढोंगी तथा स्वार्थियों का प्रवेश हो गया और उन्होंने वास्तविक योग्यता प्राप्त करने के बजाय कुछ चालें निकाल कर सीधे लोगों को ठगना आरम्भ कर दिया। इसलिये अनेक बार धोखा खाने से बहुसंख्यक लोगों की श्रद्धा, इस शक्ति की सचाई, पर से हट गई। तो भी तर्क और बुद्धि की कसौटी पर जाँच करने से हम कह सकते हैं कि भूतकाल को जान सकने का सिद्धान्त गलत नहीं है।

