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Magazine - Year 1968 - Version 2

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देवी निवेदिता-उसकी शताब्दी-और हम

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कुमारी निवेदिता की जन्म-शताब्दी 28 अक्टूबर को मनाई जा रही है। यों इसे एक वर्ष पूर्व भी मनाया जा सकता था, पर देर से ही सही- उचित कार्य के लिए उचित कदम उठाया जाना ठीक ही माना जायेगा।

भारत सरकार इसी 28 अक्टूबर को 2 पैसे वाला कुमारी निवेदिता के चित्र समेत डाक टिकट निकाल रही है। इस प्रकार एक विस्मृत आत्मा का दिव्य-दर्शन भले ही छोटे टिकटों के रूप में सही, लाखों व्यक्तियों को मिल सकेगा। विभिन्न संस्थायें और सार्वजनिक क्षेत्र उस जयन्ती को समारोहपूर्वक मनायेंगे।

युग-निर्माण-योजना के अंतर्गत भी इस समारोह को प्रमुखता दी गई है। हर शाखा में दिनाँक 28 की रात्रि को एक समारोह किया जायेगा। शताब्दी के उपलक्ष में सौ दीपक जलाने का- बीच में एक बड़ा दीपक रखने की व्यवस्था की जायेगी। एकत्रित सभी व्यक्ति उन दीपकों के समीप पुष्पाँजलि चढ़ाते हुए अपनी श्रद्धा एवं कृतज्ञता व्यक्त करेंगे और भगवान् से प्रार्थना करेंगे कि ऐसी दिव्य आत्मा पुनः इस संसार में अवतरित कर अंधकार में भटकते हुए समाज को नया प्रकाश प्रदान करें।” इसी अवसर पर उस दिव्य-आत्मा के जीवन वृत्तान्त, क्रिया-कलाप और महान् आदर्श की चर्चा प्रवचनों में की जायगी।

जहाँ सामूहिक समारोह न हो सकें वहाँ व्यक्तिगत रूप से भी एक दीपक अपने घर पर जलाया जाय। पुष्पाँजलि अर्पित करें और श्रद्धा, कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उस प्रकार के अवरतणों की शृंखला उत्पन्न करने के लिये भगवान् से प्रार्थना की जाय। उनके जीवन से प्रकाश ग्रहण किया जाय।

हम स्पष्ट देखते हैं कि संसार का भावी नेतृत्व नारी के हाथ में जा रहा है। पुरुष ने लंबी अवधि से सत्ता अपने हाथ में रखी और अपनी बुद्धि को आगे लेकर चला। उसकी प्रकृति में जो कठोरता एवं अहमन्यता का अंश है, उसे दबाया नहीं बढ़ाया गया। फलतः वह समाज की रचना और उसके विकास में भावनात्मक योगदान न दे सका- भले ही उसने नैतिक सुविधा, साधनों के बढ़ाने में अधिक प्रयत्न किया हो। कहने की आवश्यकता नहीं कि सुख-शाँति का आधार सुविधा सामग्री नहीं- भावना का उच्च-स्तर ही है। यदि आनन्द और उल्लास से भरा जीवन यापन अभीष्ट हो तो करुणा, क्षमता, स्नेह, सौजन्य, सेवा और सहानुभूति का ही प्राधान्य एवं बाहुल्य होना चाहिये। इस दृष्टि से पुरुष की उपलब्धियाँ नगण्य हैं। इसमें थोड़ा दोष उसके विवेक का और थोड़ा उसकी प्रकृति का है। कठोरता और अहंकार पर कठोरतापूर्वक नियन्त्रण करता और अन्तरंग के गहन-स्तर में किसी करुणा को जगाता तो सहृदय संतों-पुरुषों की तरह अपनी सर्व-व्यापी परंपरा प्रचलित कर सकता था। पर कुछ अपवादों को छोड़कर पुरुष वर्ग दूसरे ही मार्ग पर चलता रहा। उसके प्रयत्नों ने वहाँ अनेक उपलब्धियाँ प्रस्तुत कीं, जहाँ और बातें बढ़ाईं वहाँ क्रूरता को भी कम बढ़ावा नहीं दिया। माँसाहार से लेकर युद्धों तक, दुर्व्यवहार से लेकर दुष्टता तक हर दिशा में उसका आचरण स्पष्ट है।

प्रकृति लंबे परीक्षण के बाद अब इस निष्कर्ष पर पहुँची है कि सत्ता और नेतृत्व नर के हाथ से छीनकर नारी के हाथ जाना चाहिये। अगले दिनों उसी के कन्धों पर संगीत, साहित्य-कला, परिवार, समाज, अर्थ-धर्म से लेकर राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय गतिविधियों को नियंत्रित रखने और आगे बढ़ाने का उत्तरदायित्व उसी के कंधे पर आने वाला है। नारी की अंतरात्मा में जो स्वाभाविकता, स्नेह, सौजन्य, उदारता और आत्म-भाव है, उस अमृत को थोड़ा-सा उभार देने पर सचमुच ‘देवी’ शब्द को पूरी तरह सार्थक कर सकती है। उसके हाथ से जो कुछ होगा उसमें करुणा, ममता, सेवा और सहानुभूति ही भरी होगी, इस संमिश्रण से संसार के हर क्रिया-कलाप को एक नई दिशा मिलेगी और दृष्टता का स्थान सौजन्य ग्रहण कर लेगा।

हम कुमारी निवेदिता को दूसरों की तरह सामान्य सामाजिक कार्यकर्त्री नहीं मानते। वरन् बहुत ऊँची एक युग-प्रेरणा मानते हैं। जन्मी वे आयरलैंड में- भारत से बहुत दूर थीं- पर वे वहाँ रह नहीं सकीं। सुविधायें उन्हें बहुत थीं। वे उच्च स्तर की शिक्षा शास्त्री थीं। जो प्रयोग वे कर रही थीं, उसके कारण वहाँ उनकी बहुत प्रतिष्ठा थी और आजीविका भी इतनी थी कि सुख-सुविधा की दृष्टि से सब कुछ उन्हें उपलब्ध था। ऐसी परिस्थितियों को छोड़कर आमतौर से कोई तप-त्याग के झंझट में नहीं पड़ता। कष्ट, अभाव, अपमान और उपहास का जीवन जीने के लिये प्रसन्नता से कौन साधन-संपन्न तैयार होता है? पर वह देवी किसी अलग ही धातु की बनी थी। ईश्वर ने किसी विशेष प्रयोजन के लिए ही भेजा था।

स्वामी विवेकानन्द के एक ही प्रवचन और एक ही दृष्टिपात से उसकी धारा बदल गई। जिधर उसका जीवन प्रवाह बह रहा था, उससे बिल्कुल उल्टी दिशा में बहने लगा। उसकी अंतरात्मा में ऐसा ज्वार आया कि सुविधाओं को लात मारकर तपस्वी जीवन के लिए दुस्साहसियों की तरह कटिबद्ध हो गई। स्वामी विवेकानन्द या दूसरों के प्रवचन अनेक लोग सुनते थे, पर ऐसी तीव्र हलचलें औरों में कहाँ हुईं? निश्चय ही वह असाधारण आत्मा थी। असाधारण प्रयोजन के लिये ही आत्मा-जागरण की घड़ी आई, वह तिल-मिलाकर उठ खड़ी हुई। सारा विलास वैभव छूटा और एक ही धुन चढ़ी कि- विश्व का भावी नेतृत्व करने के लिए जिस नारी को महान् उत्तरदायित्व ग्रहण करने हैं, उसे जगाया जाय और कुछ कर गुजरने के लिये कटिबद्ध किया जाय।

जागृत आत्मायें जानती हैं कि आध्यात्मिक प्रकाश का केन्द्र-बिन्दु भारत है। सूर्य सदा पूरब से निकलता है। संसार में विज्ञान, राजनीति, शिल्प आदि का प्रकाश कहीं से भी- किसी भी अन्य भूखण्ड से भी मिल सकता है पर अध्यात्म का सुस्थिर प्रकाश सदा भारत में ही मिलता रहा है। धरती की धुरी, उत्तरी ध्रुव में है उसी प्रकार संसार के अध्यात्म प्रकाश का केन्द्र-बिंदु भारत है। भगवान् के अवतार यहीं होते रहे हैं। ज्ञान, विवेक, नीति और सदाचार का सार्वभौम शिक्षण यहीं के ऋषियों ने किया है। ईसा यहीं तक्षशिला से शिक्षा लेकर गये और सत्य अहिंसा के भारतीय तत्त्व ज्ञान को फैलाते रहे। ईसाई धर्म आज अलग दिखे इससे क्या? अलग तो बौद्ध, सिख, द्रविण आदि भी कहते हैं। कहने भर से सचाई थोड़े हो बदल जाती है।

निवेदिता जानती थी कि भगवान् एक नये संसार की रचना करने जा रहे हैं। अब का युग सड़ी-गली विकृतियों का अवशेष मात्र रह गया है। यह बदला जाने वाला है। इसके स्थान पर नया नेतृत्व नारी ग्रहण करेगी। और इसका शुभारम्भ भारत से होगा। यह तथ्य यों हर किसी के गले नहीं उतरता, कोई बिरला ही इस बात को स्वीकार करेगा। पर सामान्य और असामान्य लोगों को दृष्टि में भारी अंतर होता है। दूर को- अदृश्य को- भावना को- सम्भावनाओं को जो देख समझ सकते हों उन्हें ही तत्वदर्शी कहते हैं। निवेदिता की आत्मा इसी स्तर की थी। जैसे ही उसे अपने स्वरूप का- अपने कार्य प्रयोजन का- भान हुआ, वैसे ही वह भारत चल पड़ने के लिये आतुर हो उठीं।

स्वामी विवेकानन्द एक युग पुरुष थे। वे सोते हुए संसार को जगाने आये थे। आँखों से दीखने वाले काम यों उनके भी बहुत नहीं हैं पर प्राची में उदय होने वाले शंखचूड़ की तरह उन्होंने विश्व-व्यापी प्रकाश उत्पन्न किया। यह उनके अवतरण का उद्देश्य भी था। भारतीय स्वतंत्रता के हीरो कोई भी गिने जाते रहें। रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, अरविन्द और रमण को पर्दे के पीछे बैठे हुए सूत्रधार ही कहा जायेगा। इन आत्माओं ने भारत ही नहीं समस्त संसार को नव-जागरण के उपयुक्त प्रकाश और बल प्रदान किया है। उन्होंने सोती निवेदिता को जगाया था। जाग तो गई पर आवश्यक यह भी था कि उसकी निष्ठा को परखा जाय। सो स्वामी जी उसे बार-बार यही कहते रहे- घर रहो, नौकरी करो और जो थोड़ा-बहुत बन पड़े, दूसरों की तरह तुम भी कुछ करती धरती रहा करो।

बहुत बार तो कइयों को क्षणिक भावावेश आ जाता है। किसी प्रभाव से वे बह निकलते हैं। जब आवेश उतरा तो फिर चुप हो बैठते हैं और निराशाजनक बुरा उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। स्वामी जी नहीं चाहते थे कि लोक-मंगल के मार्ग में आने वाले कठिन तप-त्याग, आत्मोत्सर्ग और भौतिक महत्वाकाँक्षाओं को पूरी तरह पालन किये बिना कोई व्यक्ति पूरी तरह सार्वजनिक क्षेत्र में उतरे। थोड़ा काम तो कोई भी किसी भी परिस्थिति में रहकर करता है, कर सकता है पर आत्म-समर्पण तो बहुत बड़ी बात है। परखे हुए व्यक्तियों को ही इस मार्ग पर चलना चाहिये। इस दृष्टि से निवेदिता को घर रहकर ही कुछ काम करते रहने की बात उचित भी थी। उन्होंने बार-बार मना किया और कहा- ‘‘आज के रुग्ण भारत की मनोदशा विचित्र है, यहाँ युवती-नारी चरित्र पर अकारण सन्देह करने का रिवाज है। इस रिवाज को वे शीघ्र ही बदलने वाले नहीं हैं। जो कदम तुम उठाना चाहती हो उसे पग-पग पर कठिनाइयाँ भरी पड़ी हैं। फिर एक बड़ा कष्ट यह भी है कि तुम्हें भारत के संकीर्णतावादी लोग लाँछित और तिरस्कृत करेंगे।”

स्वामी जी परखने के लिये ऐसा कहते थे। जरूरत तो उन्हें भी ऐसी आत्माओं की बहुत थी। जिस दिन इंग्लैंड में नोबुल (निवेदिता का पूर्व नाम) ने अपनी शिक्षा संस्था दिखाई, उसमें उसकी प्रतिभा को देखकर स्वामी जी भावविभोर हो उठे। उन्हें जब स्मरण आया कि भारत में भी यदि इस तरह लोक-मंगल के लिये अपन को खपा देने वाली महिलायें होतीं तो स्थिति कुछ से कुछ हो जाती। इस अभाव का स्मरण करके विवेकानन्द की आँखें बरस पड़ीं, नोबुल विद्यालय का निरीक्षण करते समय स्वामी जी अपने आँसू चुपचाप रूमाल में पोंछते जाते- ताकि कोई देख न ले। आँखों से छिपाया जा सकता है। जीभ को बन्द रखा जा सकता है पर आत्मा को आत्मा की स्थिति देखने से कौन बन्धन रोक सकता है। नोबुल ने कुछ पूछा नहीं- सब कुछ जान लिया। और समझ लिया कि उनके जीवन की सार्थकता कहाँ है। वही क्षण थे, जिसमें उसने अपना कठोर कर्त्तव्य निश्चय कर लिया। और फिर उस फैसले पर अंत तक चट्टान की तरह दृढ़ बनी रही। स्वामीजी उसकी दृढ़ता से अति संतुष्ट हुए और भारत आकर काम करने की स्वीकृति ही नहीं दी वरन् उसे हिन्दू-धर्म की दीक्षा देकर ‘निवेदिता’ नाम दिया और एक संत-तपस्वी की तरह भारतीयों की अन्तरात्मा जगाने के लिए घर-घर, गली-कूँचे घूमते फिरने के लिए स्वच्छन्द छोड़ दिया।

चमड़े की आँख वालों में से कोई बिरले ही यह जानते हैं कि भारत आकर तपस्विनी निवेदिता ने क्या किया? दीखने वाले कामों का लेखा-जोखा रखने वाले लोगों को लंबी तीर्थ-यात्रा, लड़कियों का विद्यालय, प्लेग-पीड़ितों की सहायता, लेख, भाषण, स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी जैसे छोटे-मोटे कार्यों की गणना करने का ही अवसर मिलता है। पर वस्तुतः उनका कार्यक्षेत्र ऐसा था जिसे अप्रत्यक्ष ही कहना चाहिये। उनका मूल उद्देश्य था भारत की नारी-शक्ति को आत्म-गौरव की स्मृति दिखाना और उन्हें उस उत्तरदायित्व के लिये तैयार करना जो नये युग में उनके कंधों पर ईश्वरीय अदृश्य सत्ता द्वारा सौंपा जाने वाला है। इसके लिये उनका व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व एक मूर्तिमान प्रचार साधन था।

इतना सुखी जीवन छोड़कर इतनी दूर देश से भारत की आत्मा को जगाने के लिये विदेशी नारियाँ तो आईं पर भारतीय नारी परम्परागत ढर्रे का जीवन जीने में ही संतोष करले- यह तथ्य एक तीखी चुनौती थी, जिसने इस देश की शिक्षित नारी को झकझोरकर रख दिया। इस प्रेरणा से प्रभावित होकर कितनी ही सुशिक्षित नारियों ने अविवाहित रहकर लोक-मंगल के लिये अपने को समर्पित किया, इसका विवरण तैयार किया जाय तो एक स्वर्णाक्षरों से लिखा हुआ ऐसा अविज्ञात इतिहास सामने आवेगा, जिसने देश को बहुत आगे बढ़ाया और बहुत बल दिया। इस जागरण में निवेदिता की अदृश्य भूमिका को देखते हुए उन्हें इस युग के नारी-जागरण का सूत्रधार कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति नहीं होगी।

निवेदिता ने इतना किया जिसका उल्लेख किया जा सकना संभव नहीं। यदि कुछ भी न किया होता तो भी उनका लक्ष्य, साहस, त्याग, बलिदान अपने आप में उतने महान हैं कि उतने भर से भी कोई व्यक्ति परम श्रद्धास्पद, अभिवन्दनीय और प्रातः स्मरणीय माना जा सकता है। उसने अन्तिम साँस तक अपने लक्ष्य की पूर्ति में अथक प्रयास किया और अनेकों कष्ट, अभाव, लाँछन, उपहास एवं तिरस्कार सहे। महान् उद्देश्य की बलिवेदी पर इस प्रकार आत्म-समर्पण करने वाली इस मूर्तिमान् देवी के लिये भारत की कोटि-कोटि जनता अनन्तकाल तक अपनी कृतज्ञतापूर्ण श्रद्धाँजलि अर्पित करती रहेगी।

उस दिव्य आत्मा की जयन्ती मनाने में अधिक उत्साह प्रदर्शित करने में हमारा प्रयोजन भारतीय नारी को यह स्मरण दिलाने का है कि उसे उस उत्तरदायित्व को पुनः स्मरण करना है, जिसका पूर्व सन्देश देने के लिये निवेदिता आयरलैण्ड से भारत दौड़ी आई थीं। भगवान परिस्थिति को बदलना चाहते हैं। वे नेतृत्व एवं संचालन का भार अब नारी जाति को सौंपेंगे। अगले दिनों हर क्षेत्र में यह आगे बढ़ेगी और संसार की समस्त गतिविधियों को प्रभावित करेगी। इस गंगा अवतार का केन्द्र-बिन्दु भारतीय नारी होगी। इस देश का ही नहीं समस्त विश्व की परिस्थितियों का सुधार एवं परिवर्तन करना है। उसमें करुणा, सेवा, स्नेह, सहानुभूति का जो प्रकृति प्रदत्त अमृत-तत्त्व भरा पड़ा है, उसके द्वारा सिंचित होने पर ही यह श्मशान की चिता जैसा जलता हुआ मानव समाज संतोष भरी शाँति पा सकने का अधिकारी बनेगा। युग परिवर्तन का यही प्रधान लक्ष्य है।

निवेदिता एक अति उच्च-आत्मा थी। वे नवयुग की सन्देश-वाहिनी के रूप में अवतरित हुई। भारतीय नारी को उन्होंने अपने व्यक्तित्व और कर्तृत्व से झकझोरा और अपना आदर्श उपस्थित करते हुये यह बताया कि उनकी महानता इसी मार्ग पर चलने में सार्थक हो सकती है, जिस पर चलकर वे एक आदर्श प्रस्तुत कर रही हैं।

कहने को वे स्वर्ग सिधार गईं। उनका नश्वर शरीर समाप्त हो गया। पर सही बात यह है कि वे फिर इसी भूमि पर अनेक कलेवरों, अनेक आवरणों के साथ- जन्मी हैं और फिर दूने-चौगुने साहस के साथ उसी प्रयोजन में लगी हैं। भगवती दुर्गा ने आवश्यकता पड़ने पर अपनी एक सत्ता को नौ भागों में विभक्त करके नव-दुर्गा का रूप धारण किया था। पीछे वे शतचण्डी के रूप में आवश्यकतानुसार अपने सौ कलेवर धारण करके सक्रिय हुईं। वह नवयुग के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करेंगी।

नारी तत्त्व का उत्कर्ष एक सुनिश्चित तथ्य है। आज उनकी स्थिति संसार में विशेषतया भारतवर्ष में खेदजनक हैं। संसार में वे एक मनोरंजन की सामग्री और भारत में पद-दलित पराधीन बनाकर रखी जा रही हैं। पर अगले दिन नया संदेश और नया प्रकाश लेकर आ रहे हैं। उसमें नारी को उसकी स्वाभाविक महानता के अनुरूप स्थान, सम्मान और उत्तरदायित्व मिलने वाला है। नये युग में हर क्षेत्र का नेतृत्व नारी करेगी। इसलिये उसके जागरण की भी आज अतीव आवश्यकता है। निवेदिता इसी सन्देश और प्रकाश को लेकर अवतीर्ण हुई थीं। उनकी आत्मा आज अपनी शताब्दी के अवसर अति सुविस्तृत और व्यापक तैयारी के साथ नये निर्माण की महान् भूमिका संपादित करती हुई, हमें अत्यंत स्पष्ट रूप में दिखाई पड़ रही है।

निवेदिता शताब्दी का पुण्य पर्व उसी शुभ-संदेश का शंखनाद है। हम उसे इसलिये भी अधिक उत्साह के साथ मनाने जा रहे हैं कि यह पर्व उस चेतना को बल देगा, जिसके लिये वह दिव्यात्मा तब अवतरित हुई और अब फिर अपने अनेक कलेवरों के साथ कार्य क्षेत्र में अवतीर्ण हो रही हैं। इस मंगलमयी बेला में हमारा शताब्दी समारोह उत्साह और उल्लासपूर्वक मनाना उचित भी है और आवश्यक भी।

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