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Magazine - Year 1968 - Version 2

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मनुष्य से तो चींटी में ही ज्यादा अकल है।

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जब पृथ्वी के अन्य जीव-जन्तुओं से ही हम मनुष्यों की तुलना करते हैं तो स्पष्ट जान पड़ता है कि ज्ञान-विज्ञान का अहंकार रखने वाला मनुष्य अभी अपने सामाजिक संगठन और व्यवहार में उस स्तर तक भी नहीं पहुँचा है, जहाँ तक कि कितने ही छोटे जीव-जन्तु- कीड़े-मकोड़े लाखों वर्ष पहले पहुँच चुके हैं। चींटियों, मधुमक्खियों, दीमकों, बर्रों का आन्तरिक संगठन, अनुशासन प्रियता और नागरिकता की भावना मनुष्यों की अपेक्षा बहुत उच्चकोटि की होती है और उसी के आधार पर वे इतने लंबे काल से अपनी रक्षा करते आये हैं।

अभी तक प्राणि-शास्त्र की खोजों से जहाँ तक जाना जा सका है, मनुष्य की उत्पत्ति को दस लाख वर्ष से अधिक समय नहीं हुआ। जैसी स्थिति में आजकल घोर जंगली मनुष्य रहते हैं, उसको प्राप्त किये हुये तो लाख-दो-लाख वर्ष का समय ही गुजरा होगा।

इसके विपरीत चींटी और मधुमक्खी आदि के विषय में बहुत जाँच-पड़ताल करके जगत् प्रसिद्ध वैज्ञानिक जूलियन हक्सले और ह्वीलर आदि ने यह निर्णय किया है कि उनका विकास 25 लाख वर्ष पूर्व हो चुका था और तब से उनमें कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ है। इनके संगठन का वर्णन करते हुए एक विद्वान् डा. स्टाकर्ड हेथम ने लिखा है-

“समस्त सामाजिक कीड़ों में चींटियां सबसे अधिक सफल और कदाचित सबसे ज्यादा विचित्र हैं। उनकी समस्त जातियों की संख्या लगभग तीन हजार है। कुछ जातियां ऐसी होती हैं, जिनके बिलों में रहने वाले कुल जीवों की संख्या एक-सौ के आस-पास ही होती है और किसी-किसी जाति के बिल में पाँच लाख तक प्राणी रहते हैं। अण्डा देने वाली थोड़ी-सी ‘रानियों’ को छोड़कर सभी कोई चींटी बहुत बड़ी नहीं होती। सबसे बड़ी ‘नपुंसक चींटी की तोल भी कभी एक ग्राम (तीस रत्ती) से अधिक नहीं होती। दूसरे शब्दों में एक मामूली आदमी के वजन के बराबर होने के लिये एक लाख से अधिक चींटियाँ तराजू के पल्ले में चढ़ानी पड़ेंगी। यह तो सबसे बड़ी चींटी की बात हुई। जिनको आहार ढोने और शत्रुओं से युद्ध करने के लिये अपने शरीर को विशेष रूप से बड़ा और मजबूत बनाना पड़ता है। छोटी चींटियाँ तो इससे बहुत हल्की होती हैं।

इन चींटियों में जो अनेक रहस्यपूर्ण प्रवृत्तियाँ देखने में आती हैं, उनमें सर्वाधिक महत्व की बात उनकी योजना व्यवस्था है। भोजन इकट्ठा करने का काम प्रायः श्रमिक-चींटियाँ करती हैं। पर प्रत्येक समुदाय में अथवा एक ‘बस्ती’ में रहने वाली समस्त चींटियों का ‘पेट’ एक ही माना जाता है। इसलिये श्रमिक चींटियां जितनी आहर सामग्री पाती हैं, उसे अपने गले के नीचे के थैले में भर लेती हैं। उसमें से वे अपने हिस्से का थोड़ा-सा अंश अपनी पाकस्थली में पहुँचा देती हैं और शेष में से एक-एक बूँद अन्य सबको बाँट देती हैं। इसकी जाँच करने के लिये वैज्ञानिकों ने आहार ढूँढ़ने वाली चींटियों के मार्ग में चीनी का गाढ़ा शर्बत रख दिया। और उसमें कोई रासायनिक नीले रंग का पदार्थ मिला दिया। श्रमजीवी चींटियों ने शर्बत को खा लिया और बिल में पहुँचकर उसके समस्त निवासियों, बच्चों तक को वही खाया हुआ शर्बत बाँट दिया। फल यह हुआ कि ‘बस्ती’ में रहने वाले समस्त प्राणियों के पेट में से थोड़ी नीलिमा झलकने लगी। इस प्रकार समस्त समुदाय का पेट पालन हो जाता है। यदि मनुष्य समाज ने इस सिद्धान्त को समझकर व्यवहार रूप से पालन करना आरम्भ कर दिया होता तो आज कहीं भी इतने चोर, डाकू, उठाइगीर, ठग, लुटेरे आदि नहीं मिलते।

यह तो स्पष्ट ही है कि व्यक्ति जब तक जीवित रहेगा, अपनी भूख-प्यास की पूर्ति करने की समस्या तो उसे सुलझानी ही पड़ेगी। यदि उसका पेट सीधी तरह नहीं भरेगा तो असदाचरण का आश्रय लेगा। समाज के भले-बुरे का ख्याल छोड़कर जैसे बनेगा, वैसे अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये प्रयत्न करेगा। इससे समाज का और उसका- दोनों का ही अकल्याण होगा। समाज के सब सज्जन, परिश्रमी और साधन-संपन्न लोगों को शंकाकुल रहना पड़ेगा। और उन कुमार्गगामी अपराधियों को सदैव शारीरिक और मानसिक कष्ट सहन करना पड़ेगा। समाज उनको चाहे बाहर रखकर खिलाये और चाहे जेल में रखकर, बिना खाये तो वे कभी रहेंगे नहीं। इसलिये यदि मनुष्य चींटी और मधु-मक्खियों के समतुल्य भी समझदारी से काम लेता तो आज उसकी अवस्था कहीं अधिक सुरक्षित होती।

चींटी की कुछ इन्द्रिय जन्य शक्तियाँ भी मनुष्य से कहीं उच्च-कोटि की होती हैं। वे अपने मुख के सामने के बालों से स्पर्श और घृणा का काम लेती हैं। हमको जो गन्ध आती है, उसके द्वारा किसी वस्तु के रूप का ज्ञान कदापि नहीं हो सकता, पर चींटियाँ गन्ध से पदार्थ के रूप को भी समझ लेती हैं। जब चींटियों की विभिन्न ‘बस्तियों’ के बीच लड़ाई हो जाती है, तो भी वे गंध के सहारे ही मित्र और शत्रु की पहिचान कर लेती हैं, अन्यथा न तो उनकी वेषभूषा भिन्न प्रकार की होती है और न वे अपने दल का कोई विशेष ‘रण-घोष’ ही करती हैं। इसलिये वही मालूम पड़ता है कि इस मसले को वे अपने मुँह के बालों द्वारा स्पर्श करके ही हल करती हैं। वे जिस रास्ते पर होकर एक बार निकल जाती हैं, उसे अपने पैरों की गन्ध के द्वारा ही फिर पहिचान लेती हैं और इसी उपाय से दूर तक इधर-उधर घूमकर फिर अपने घर को वापस आ सकती हैं।

कई प्रकार की चींटियों में ‘समझ’ के भी कुछ लक्षण दिख पड़ते हैं। ‘ड्राइवर’ श्रेणी की चींटी रास्ते में कोई छोटा नाला-नाली आ जाने पर उसका पुल बाँधकर शेष समस्त दल को पार पहुँचा देती हैं। वह इस प्रकार कि प्रत्येक श्रमिक चींटी एक छोटा तिनका मुँह में पकड़ लेती हैं और तब वे एक दूसरे के तिनके को पकड़ती हुई नाले के आर-पार एक जीवित लड़ी बन्द पुल बना लेती हैं। बेट नामक वैज्ञानिक ने अपने निरीक्षण के आधार पर लिखा है कि ‘दक्षिण अमरीका के एक नगर में चींटियों ने ट्राम की पटरी को पार करने के लिये ऐसा ही पुल बनाया था। पर जब उनमें से बहुत-सी ट्राम से कुचल गई तो उन्होंने बजाय पुल बनाने के पटरी नीचे से खोदकर सुरंग बनाई। जब श्री वेट ने इन सुरंगों को बन्द कर दिया तो उन्होंने पटरी के पार जाना बन्द कर दिया और नई सुरंगें खोदकर ही उस पार गईं। इसी प्रकार एक वृक्ष पर चींटियों का चढ़ना रोकने के लिये उसमें तने के चारों तरफ दो-चार इंच चौड़ा चिपकाने वाला ‘लासा’ लगा दिया गया। चींटियों ने इधर-उधर से मिट्टी, पत्थर के छोटे कण लाकर लासे पर डालकर उसे पाट दिया और उस पार पहुँच गईं।

चींटियों की स्वच्छता-भावना भी बहुत ऊंचे दर्जे की होती है। वे अपने शरीर की बहुत अधिक सफाई करती हैं। श्री मेककुक ने चींटियों के एक जोड़े का निरीक्षण करके बतलाया कि उनमें से एक तो पृथ्वी पर लेट गई और दूसरे ने उसे चाटकर साफ करना आरम्भ किया। पहले उसने चेहरे को साफ किया, फिर छाती को खूब चाटा। इसी प्रकार कूल्हा, उदर और टाँगों को भी चाट कर पूरी तरह साफ किया, इस तमाम समय में सफाई कराने वाली चींटी ऐसी शाँति और संतोष के साथ पड़ी रही, जिससे विदित होता था कि वह अपने साथी के काम से बहुत संतुष्ट और प्रसन्न है।

चींटियाँ अपने भरण-पोषण के लिये अनेक प्रकार की विधियों से काम लिया करती हैं। दक्षिण अमरीका की ‘अट्टा’ जाति की चींटी पेड़ों से पत्तियाँ तोड़कर उनके छोटे-छोटे टुकड़े करती हैं और फिर उनको अपने बिल के भीतर क्यारियों में फैला देती हैं। कुछ ही समय में उनसे कुकुरमुत्ता के तुल्य वनस्पति पैदा हो जाती है। बिल के भीतर रहने वाली सभी चींटियां मुख्य रूप से इन्हीं को खाकर गुजारा करती हैं। इनको ‘बागवान-चींटियाँ कहा जाता है।

दूसरी ‘फसल जमा करने वाली चींटियाँ’ होती हैं, जो अपने बिलों में खेती से अनाज या घास आदि के बीज इकट्ठा करती हैं। ये अक्सर शुष्क अथवा मरुभूमि के प्रदेशों में रहती हैं। इन प्रदेशों में अक्सर बहुत समय तक सूखा पड़ जाता है और खाद्य सामग्री का अभाव हो जाता है। इसलिये ये चींटियाँ अपने बिलों के भीतर अधिक से अधिक तरह-तरह के बीज जमा कर लेती हैं और अभाव के दिनों में उन्हीं को खाकर गुजर करती हैं। हमारे देश में पुराने समय में अकाल के दिनों में अनेक बार लोगों ने इन चींटियों के बिलों को खोदकर एक-एक, दो-दो मन अनाज निकाला था।

‘लेमियन्स’ नाम की अमरीका की चींटी एक अन्य छोटे-कीड़ों को पालती है और उन्हें अनाज तथा पौधों की जड़ों के पास ले जाकर छोड़ देती है, जहाँ वे उसके रस को चूस लेते हैं। कुछ समय बाद चींटी उस कीड़े को अपने बालों से थपथपाती है, जिससे वे रस को उगल देते हैं और चींटियाँ उसे चाट लेती हैं। इस प्रकार वे इन जीवों से वही काम लेती हैं, जैसा मनुष्य गायों और भैंसों को पाल कर उनका दूध दुहकर लेते हैं।

इस प्रकार चींटियाँ, मधुमक्खियाँ और दीमक आदि जीव बहुत छोटे और नगण्य जान पड़ने पर भी सामूहिक शक्ति का इतना अधिक विकास कर चुके हैं कि बड़े-बड़े जीव भी उन पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते, वरन् जैसा मशहूर वे साँप और हाथी जैसे जोरदार जीवों को भी अपनी सामूहिकता के बल पर भगा देते हैं या मार देते हैं।’ वे सदा अपने सामुदायिक नियमों का पूरी तरह पालन करते हैं और फलस्वरूप किसी को भूखा-नंगा नहीं रहना पड़ता। यदि मनुष्य इन जीवों से इस विषय में प्रेरणा ले सका होता तो आज उसकी बहुत-सी समस्यायें हल हो गई होतीं।

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