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Magazine - Year 1968 - Version 2

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संसार की सेवा करते हैं

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सम्भव है अनेक लोग ऐसा विचार रखते हों कि जो महापुरुष अपने जीवनकाल में संसार की सेवा करते हैं, वे उसके अन्त में किन्हीं दिव्य-लोकों में जाकर निष्क्रिय हो जाते होंगे और अपने सत्कर्मों का फल स्वर्गीय सुख का चैन से भोग करते होंगे।

इसमें तो संदेह ही क्या हो सकता है कि सत्कर्मों का फल सद्गति ही होता है और बहुत बार स्वर्गादि भी। किन्तु सच्चे जनसेवी वहाँ पहुँचकर निष्क्रिय नहीं बैठ जाते वे वहाँ से भी सूक्ष्म शक्तियों द्वारा लोक-कल्याण का कार्य करते रहते हैं।

पहली बात तो यह है कि उन्हें लोक-मंगल की सेवाओं का स्वाद, उसका आनन्द ज्ञात होता है, इसलिये स्वर्ग का निष्क्रिय सुख उनको उस परमार्थ सुख से तुच्छ लगता है और वे जड़तापूर्ण सुख को भोगते रहने के स्थान पर वहाँ से भी अपने सूक्ष्म जीवन द्वारा सेवा के कार्य करते रहते हैं। दूसरे वे सेवा कार्यों- परमार्थ कर्मों का मूल्य जानते हैं। उन्हें पता रहता है कि जब संसार में उन्होंने जनसेवा के लिये तुच्छतम सुखों, नश्वर सुखों का त्याग किया, तब तो उन्हें इन उच्च-लोकों की प्राप्ति हुई, और अब जब इन उच्च-लोकों का चिरन्तन सुख वे परमार्थ के लिये उत्सर्ग कर देंगे, तब उन्हें न जाने किस उच्चपद की प्राप्ति होगी। त्याग, सुख तथा आत्म-संतोष की शाँति का अनुभवी अधिकाधिक त्याग को अपना लक्ष्य बनाता है। ग्रहण और फिर किसी परमार्थ पुण्य के फल ग्रहण को तो वह तुच्छ लोभ ही मानता है।

त्याग का यदि मूल्य ले लिया, सेवा की कीमत चुकाली तो फिर उसकी महत्ता ही क्या रह जाती है। सच्चे परमार्थियों का पुरुषार्थ से उत्पन्न अधिकाधिक पुरुषार्थ की शक्ति ही उसका लाभ-लोभ तथा मूल्य होता है, उससे प्राप्त सुख का भोग फिर चाहे वह अपवर्ग सुख ही क्यों न हो उनके लिये कोई आकर्षण नहीं रखता। वे अपने परलोक की सारी संपदायें संसार में सत् तथा शुभार्थ मुक्त-हस्त से लुटा देते हैं।

स्थूल शरीर के उपराँत सच्चे सेवा-धनी सूक्ष्म विचार जीवन धारण कर लेते हैं और चिरन्तन तरंगों के रूप में मानव मस्तिष्कों में आन्दोलित रहकर उनके द्वारा परमार्थरत रहा करते हैं। जो व्यक्ति प्रयत्नपूर्वक अपने मस्तिष्क को उन सूक्ष्म विचार तरंगों के योग्य बना लेता है, वह उन दिवंगत महात्माओं की शक्तियों का उपयोग करने की पात्रता प्राप्त कर लेता है। मस्तिष्क की यह योग्यता प्राप्त करना कोई विलक्षण अथवा अद्भुत बात नहीं है। इसके लिये केवल उसको मूढ़ताओं, कुविचारों, विकारों, अंधविश्वासों या दुराग्रह अथवा पक्षपात के कलुष से निर्मुक्त भर करना होता है। और यह काम परमार्थ बुद्धि, आध्यात्मिक आस्था, स्वाध्याय, सत्संग अथवा सेवा-कार्यों द्वारा सहज ही में किया जा सकता है।

विचार रूपी सूक्ष्म शरीरधारी महात्मा लोग संसार के वायुमंडल में सात्विक तत्त्वों के रूप में ओत-प्रोत रहते हैं और जिन हृदयों अथवा मस्तिष्कों में अपने योग्य निवास पाते हैं, समाहित हो जाते हैं और उस माध्यम से अपने उन कार्यों को आगे बढ़ाते रहते हैं, जिनको वे एक बार स्थूल अवस्था में प्रारम्भ कर चुके होते हैं। इस प्रकार उनका सेवा कार्य सदा सर्वदा चलता रहता है।

जिस प्रकार असद्कर्मों का फल अत्याग की अनिवार्यता से प्रतिबन्धित है, उस प्रकार सत्कर्मों के फल त्याग पर कोई प्रतिबंध नहीं है, उसे त्याग सकने का किसी को भी अधिकार रहता है। फलों के विषय त्यागात्याग की भिन्नता का कारण यह है कि पापों का फल दण्ड रूप में निर्धारित होता है, जिसके त्याग का कोई प्रश्न ही नहीं उठता, उस पर कुकर्मों का कोई अधिकार नहीं होता, किन्तु पुण्य कर्मों का फल पुरस्कार स्वरूप होता है, उसे त्याग सकने का अधिकार रहता है, क्योंकि वह सुकर्मी की अपनी निजी संपदा अपना व्यक्तिगत उपार्जन होता है। अनेक पुरुषार्थी जो परमार्थ परक सेवा, सुख का सौंदर्य अनुभूत कर चुके होते हैं, स्वर्ग ही नहीं मोक्ष तक का निषेध कर देते हैं और उसके स्थान पर पुनः मानव शरीर स्वीकार कर संसार में, अपनी इस कर्मभूमि में, इस पवित्र धरा-धाम में लोकरंजन और जनमंगल के लिये जन्म धारण कर लेते हैं। अपने पुण्य कर्मों के प्रताप से उन्हें वह मानव शरीर जिसे निष्क्रिय लोग एक भार, रोग-शोक का भण्डार और आत्मा का बंधन मानकर भयभीत होते हैं, सेवा का सर्वोपरि साधन तथा सबसे सरल उपाय मालूम होता है। वे बारम्बार इसे प्रसन्न-प्रसन्न धारण करते हैं और प्रसन्न-प्रसन्न छोड़ते रहते हैं। उन्हें इस विग्रह, अविग्रह में खेद होना तो क्या उल्टे लीला लास्य जैसा आनन्द आता है।

खेद का प्रश्न तो तब उठे न जब वे इस शरीर, इस साधन को कर्मयोग के स्थान पर भोग-संयोग मानकर चलें और इन्द्रियों की शक्ति और उनकी अभिमुखता नश्वर साँसारिक सुखों की ओर प्रेरित करें। जिसका हृदय, पवित्र है, जिसके कर्म धन्य हैं और जिसका पथ परमार्थ और रुचि आध्यात्मिक है, ऐसे जन्म-जन्म के सपूर्व अभ्यासी को संसार में भय कहाँ? लोभ, लालसा, लिप्सा और लोलुपता के कीट-पतंग उस तेजोपूर्ण व्यक्तित्व के पास आ भी कैसे सकते हैं और कैसे उस प्रकाशपूर्ण आत्मा का सामुख्य, ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध आदि का अंधकार ही कर सकता है। वह तो आत्मालोकित, आत्म-निर्भर और आत्म-मुक्त एवं आत्म-प्रसन्न पुण्य पुरुष परमात्म-तत्त्व से अविच्छिन्न संबंध किये अभयभाव से संसार की छलनाओं तथा प्रवंचनाओं के बीच अपने निश्चित पथ पर ऐसे चला जाता है जैसे बलशाली वैनतेय वायु के प्रतिकूल झोकों की उपेक्षा किये, अमृत पथ पर सहजगति से उड़ता चला जाता है।

मनुष्य का विचार शरीर स्थूल शरीर से अधिक शक्तिशाली तथा सक्षम होता है। व्यक्तिगत जो मनुष्य के प्रभाव का मुख्य स्रोत है, विचारों द्वारा ही निर्मित होता है। कर्मों का मूल प्रेरणा केन्द्र भी विचार ही होते हैं। कोई मूर्ति, चित्र अथवा रचना स्थूल अभिव्यक्ति पाने के पूर्व शिल्पी के विचार जगत् में ही जन्मती है, उसी में परिष्कृता पूर्ण होती है, तत्पश्चात् स्थूल उपादानों के माध्यम से मूर्तिमान होकर दृष्टिगोचर होती है। जिस रचना को दूसरे लोग बहुत बाद में उसके भौतिक अस्तित्व में आने के बाद ही देख पाते हैं उसे विचारशील शिल्पी अदृश्य रूप में ही पूर्ण रूप से साकार देख लेता है। यह दिव्य-दृष्टि प्रखर तथा उज्ज्वल विचारों द्वारा ही प्राप्त होती है।

मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण विचारों द्वारा ही होता है। प्रत्येक शुभ-विचार व्यक्तित्व को उन्मुक्त और विकसित करने में सहायक होता है। शुभ विचारों से मस्तिष्क का शृंगार करने से अवचेतन मन का, जो दिव्य-शक्तियों का केन्द्र होता है, अनुकूल दिशा में सृजन होने लगता है। व्यक्तित्व का वास्तविक निर्माता यह अवचेतन मन ही होता है, जिसका जागरण विचारों द्वारा ही होता और जो जितने शक्तिशाली ढंग से अपने प्रबोधक विचारों का प्रतिपादन करता है, मनुष्य का व्यक्तित्व उतना ही प्रखर तथा सतेज बन जाता है। व्यक्तित्व की तेजस्विता ही अन्य व्यक्तियों को, अनुरूप निर्माण कर संसार में सत्प्रवृत्तियों का संघ बनाकर क्राँति उपस्थित कर देती है। देवता तथा राक्षस दो भिन्न जीवन नहीं हैं। यह मनुष्य के व्यक्तित्व के उज्ज्वल तथा मलीन दो पक्ष ही हैं। जिसने अपने सद्विचारों द्वारा अपना मानसिक परिष्कार कर डाला है, भ्राँतियों, विडंबनाओं, प्रवंचनाओं, आडम्बर, छल-कपट, स्वार्थ अथवा अहंकार की प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करली है, कलुष एवं कुत्सा को निकाल डाला है, उसका हृदय सद्भावनाओं, सहानुभूति, संवेदन, सहयोग, सेवा और सामंजस्य की विभूतियों से जगमगा उठता है और यही जगमगाहट, कर्मप्रवाह में प्रवाहित हो प्रमाणित कर देती है कि अमुक व्यक्ति देवता है। इसके विपरीत जिसका हृदय, मत्सर, मलीनता तथा मदांधता के अंधकार से भयावह हो रहा है, उसके कर्म उसी अनुसार प्रतिकूलता का प्रतिपादन करते हुए बतला देते हैं कि यह व्यक्ति राक्षस अथवा असुर है। देवता तथा राक्षस कुछ और नहीं, केवल विचारों की परिणति अथवा परिपाक ही होता है, जो किसी की गतिविधि में कदम-कदम पर प्रकट होता रहता है।

विचारों की शक्ति अपरिमित और अनन्त होती है। एक बार इसकी सिद्धि हो जाने पर फिर जन्म-जन्मान्तरों में इसका तारतम्य नहीं टूटता, यह सदा सर्वदा मनुष्य के साथ बनी रहती है, जिससे हर जीवन में उसकी सफलता की सम्भावना सुरक्षित रहा करती है। स्थूल शरीर की शक्ति से कोई एक व्यक्ति किन्हीं एकाध व्यक्तियों को ही नियन्त्रण में रखकर अनुकूल दिया में चलने के लिये विवश कर सकता है, किंतु विचार शरीर की अपूर्व शक्ति से एक मनुष्य पूरे संसार तथा पूरे युग को ही बदल सकता है अथवा अनुकूल दिशा में अग्रसर कर सकता है। लोक नायकों अथवा संसार के जन नेताओं की मुट्ठी भर हड्डियों में कितनी शक्ति होती है। शायद उतनी भी नहीं जितनी एक श्रमिक में होती है। तथापि वह विशाल लोकमत को प्रभावित कर वशीभूत बना लेता है। उनकी यह शक्ति विचार-शक्ति ही होती है। जिसको वे अपने शुभ संकल्पों, सत्प्रवृत्तियों, सत्य, निष्ठा तथा सद्भावनाओं द्वारा लोकहित के लिये ही सिद्ध करते हैं। वे विचारों द्वारा ही वैचारिक तप करके इस अलौकिक शक्ति का जागरण अपने अन्दर कर लिया करते हैं।

जिस-जिस अनुपात से मनुष्य की विचार-शीलता सूक्ष्म की ओर बढ़ती जाती है, उस-उस अनुपात से वह दिव्य-दृष्टा बनता जाता है। भूत, भविष्यत्, वर्तमान् उसके लिए हथेली पर रक्खी वस्तु की तरह स्पष्ट हो जाते हैं। उसकी विचार-शक्ति बड़े-से-बड़े आवरण को भेदकर किसी भी रहस्य अथवा गुह्य भेद को अच्छी तरह देख आती है। विचारों की गति त्रिलोक तथा त्रिकाल में अबाध होती है। वह मनुष्य के अन्तःकरण में छिपी बातों को, हृदय में बसी भावनाओं से संबंध स्थापित कर विचारशील को अन्तर्यामी बना देती है, तभी तो कोई सूक्ष्मदर्शी, दार्शनिक अथवा मनोवैज्ञानिक मानव प्रवृत्तियों को पुस्तक की तरह पढ़ और समझ लेता है। विचारों की शक्ति संक्रामक तथा सर्वव्यापक होती है।

विचारशील राजनीतिज्ञ अपने देश के, अपने निवास के एक छोटे-से कक्ष में बैठा हुआ दूर देशाँतर में होने वाली घटनाओं अथवा घटना मूलक परिस्थितियों को अपने मस्तिष्क में चलचित्र की तरह देखता रहता है और वहीं से विचारों द्वारा बैठा-बैठा, नियन्त्रित अथवा परिवर्तित करता रहता है। पारस्परिक प्रतिस्पर्धा में राज-नायकों की हार-जीत उनकी विचार-शक्ति पर ही निर्भर रहती है। जिनके विचार जितने अधिक सतेज तथा सूक्ष्म होते हैं, वे संसार-चक्र को उतना ही अपनी मनोवांछित दिशा में घुमा सकने में समर्थ होते हैं।

शारीरिक शक्ति में नगण्य वैज्ञानिक विचार-शक्ति द्वारा ही प्रकृति के तत्त्वों को जीतकर उसके रहस्यों का उद्घाटन कर संसार को विस्मय में डाल दिया करते हैं और विचारों की आध्यात्मिक शक्ति ही परमेश्वर जैसे विराट् तथा सर्वशक्तिमान मुनि मानस में प्रकट कर देती है। इस ढाई-तीन हाथ के शरीर में रहता हुआ भी मनुष्य विचारों के बल पर विराट् तथा विशाल बनकर सृष्टि के अणु-अणु में छा जाता है और यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड उसके पिंड प्रदेश में प्रतिबिम्बित हो उठता है। विचारों की शक्ति और उनकी महिमा अपार और अनिवर्चनीय है।

अपने अन्दर सोये विचारों को सदाशयता द्वारा जागृत करिये, उन्हें क्रिया रूप में अभिव्यक्ति दीजिये और वह शक्ति प्राप्त कर लीजिये, जिसके द्वारा साधारण मनुष्य महापुरुष, महात्मा और युग-प्रवर्तक बन जाया करते हैं। स्थूल जीवन से विचार जीवन में प्रवेश कीजिये और जन्म-जन्म संसार की प्रेरक शक्ति बनकर अमरत्व का वरण करिये।

विचार का परिष्कार एवं प्रसार करके आप मनुष्य से महामनुष्य, दिव्य मनुष्य और यहाँ तक ईश्वरत्व तक प्राप्त कर सकते हैं। इस उपलब्धि में आड़े आने के लिये कोई अवरोध संसार में नहीं है। यदि कोई अवरोध हो सकता है तो वह आपका स्वयं आलस्य, प्रमाद, असंयम अथवा आत्म अवज्ञा का भाव। इस अनन्त शक्ति का द्वार सबके लिये समान रूप से खुला है और यह परमार्थ का पुण्य-पथ सबके लिये प्रशस्त है, अब कोई उस पर चले या न चले यह उसकी अपनी इच्छा पर निर्भर है।

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