विभूतियाँ कुपात्र को नहीं-सुपात्र को
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पदार्थ विद्या विलुप्त न हो जाये इस उद्देश्य से बोधिसत्व ने जहाँ आत्म-साक्षात्कार कराने वाला योगाभ्यास किया वहाँ उन्होंने तंत्र विद्या की कठोर साधनायें भी कीं और उसके अनेक गूढ़ रहस्यों का पता लगाया।
वे चाहते थे लोक मंगल में इस विद्या का आगे भी उपयोग होता रहे, इसलिये उन्होंने लंबे समय तक किसी योग्य व्यक्ति की प्रतीक्षा की। एक बार एक ब्राह्मण युवक आया और उसने तंत्र सीखने की तीव्र जिज्ञासा प्रकट की। बोधिसत्व ने उसे तंत्र विद्या के सारे गोपनीय रहस्यों का ज्ञान करा दिया। एक विशेष नक्षत्र के उदय होने पर आकाश से रत्न वर्षा कराने वाला वैदर्भ मंत्र भी उन्होंने सिखा दिया पर उन्हें इस बात का पश्चाताप भी कम न था कि सिखाने से पूर्व युवक की पात्र-परीक्षा नहीं की गई।
एक बार बोधिसत्व अपने इस ब्राह्मण शिष्य के साथ चेदि प्राँत का भ्रमण करने गये। मार्ग में एक धनी जंगल पड़ता था उसमें कुछ प्रेषणक चोर रहा करते थे। प्रेषणक चोर उन्हें इसलिये कहा जाता था क्योंकि वे उन लोगों को पकड़ते थे जो दो या दो से अधिक होते थे। उनमें से वे किसी एक या अधिक को रखकर कुछ लोगों को यह कहकर छोड़ देते थे कि इतने दिनों में इतनी धनराशि पहुँचा न दी तो इसको जान से मार दिया जायेगा।
चेदि जा रहे बोधिसत्व और ब्राह्मण को भी चोरों ने पकड़ लिया। चोरों ने इसके बाद बोधिसत्व को छोड़ दिया और कहा तीन दिन के अन्दर एक हजार स्वर्ण मुद्रायें लाकर दो तभी इस ब्राह्मण को छोड़ेंगे।
बोधिसत्व चलने लगे तो उन्हें एकाएक याद आया कल वह नक्षत्र आ रहा है जिसके उदय होने पर यदि वैदर्भ मंत्र का प्रयोग किया जाये तो आकाश से रत्नों की वर्षा हो सकती है। उन्होंने ब्राह्मण के कान में कहा-’वत्स! मैं स्वर्ण मुद्राओं का प्रबंध करके शीघ्र लौटूँगा देखना तुम तंत्र विद्या का प्रयोग मत करना अन्यथा अपना भी नाश कर लोगे और चोरों के भी विनाश का कारण बनोगे।’ यह कहकर वे वहाँ से लौट पड़े।
रस्सियों से जकड़े पड़े युवक ने दूसरे दिन आकाश की ओर देखा तो वह नक्षत्र दिखाई पड़ गया। उस समय उसने गुरु की बात भी ठुकरा दी और चोरों से पूछा- बंधुओं! तुम लोगों ने मुझे धन के लिये पकड़ा है न! यह देखो, धन का नक्षत्र उदय हो गया। तुम लोग मुझे छोड़ दो मैं अभी वैदर्भ मंत्र का प्रयोग कर रत्नों का ढेर लगा देता हूँ। तुम भी धन ले जाना और हम भी अभीष्ट धन प्राप्त कर सुख और वैभव का जीवन यापन करेंगे।
चोर बड़े प्रसन्न हुये। उन्होंने युवक को छोड़ दिया। युवक ने मंत्र का प्रयोग कर दो घंटे तक रत्नों की वर्षा कराई। रत्नों के अम्बार लग गये। चोर धन बाँध-बाँध कर वहाँ से भाग खड़े हुये किन्तु अभी वे कुछ ही दूर जा पाये थे कि उन्हें दूसरे चोरों ने पकड़ लिया। चोरों ने युवक की ओर संकेत करते हुये कहा- यह सब इनकी कृपा का फल है। इसे पकड़ लो यह आकाश से रत्नों की वर्षा करा सकता है।
चोरों ने युवक को पकड़ लिया पर उसने कहा- अब तो वह नक्षत्र एक वर्ष के लिये चला गया। इस पर चोर बड़े कुपित हुये और उन्होंने युवक को वहीं मार कर फेंक दिया। फिर चोरों में द्वन्द्व युद्ध हुआ और इस तरह दो को छोड़कर शेष सभी परस्पर वार करते हुये यमपुरी सिधार गये। उन दोनों ने आधा-आधा धन बाँट लेने का समझौता कर लड़ाई बन्द कर दी और भूख-प्यास मिटाने का उपाय करने लगे। एक चोर गाँव की ओर भोजन लेने गया, दूसरा धन की रखवाली में बैठा। उस समय दोनों को ही लोभ आ गया और वे एक दूसरे को छल से मार देने का उपाय ढूंढ़ने लगे। पहला चोर भोजन में विष मिला लाया। पर जैसे ही वह दूसरे चोर के पास पहुँचा उसने तलवार से उसका सिर काट डाला। फिर उसने सोचा चलने से पूर्व भोजन कर लेना चाहिए। जैसे ही उसने एक कौर खाया कि विष के प्रभाव से उसकी भी वहीं मृत्यु हो गई। इसी बीच बोधिसत्व वहाँ आ पहुँचे। सारा दृश्य देखकर उनके मुँह से इतना ही निकला जो पात्र नहीं है उनको ज्ञान देने का यही परिणाम होता है।

