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देवत्व की रक्षा से बढ़कर धर्म नहीं और देवत्व अपनाने से बड़ा कोई कर्त्तव्य नहीं।
-सन्त तिरुवल्लुवर
वे भौतिक कामनायें जिनका आधार परिश्रम अथवा पुरुषार्थ है, उन्हें आध्यात्मिक गतिविधि के साथ जोड़ने का निषेध है। तथापि उनको इस रूप में किसी हद तक जोड़ा जा सकता है कि हमें इस पुण्य से शारीरिक, मानसिक तथा बौद्धिक शक्ति प्रचुर रूप में मिले जिससे मैं परोपकार, पुण्य तथा परमार्थ के लिए अधिकाधिक धन कमा सकूँ। अपने परिवार का इस प्रकार पालन कर सकूँ जिससे उसके सारे सदस्य उन्नत और उदात्त बनें। मैं जिससे भोजन, वस्त्र और आवास की अपने उपयुक्त व्यवस्था करने के साथ दूसरे दुःखी और निराश्रितों की सहायता कर सकूँ। यद्यपि धर्माचार में भौतिक कामनाओं के समावेश का निषेध किया गया है तथापि परमार्थ के उद्देश्य से स्वार्थ पूर्ण कामनायें भी जोड़ी जा सकती हैं। इस प्रकार की स्वार्थ अथवा सकाम उपासना-साधना आदि की आध्यात्मिक गतिविधि बंधन की हेतु नहीं बनती।
धन, वैभव, शक्ति, सामर्थ्य, परिवार, परिजन, स्त्री, बच्चों की वह भौतिक कामना जिसका उद्देश्य प्रदर्शन, अथवा भोग-विलास हो, पुण्य प्रक्रिया में जोड़ देने से वह पुण्य क्रिया भी दूषित हो जाती है, उसकी प्रेरणा अंधकार की ओर ही ले जाती है। इस प्रकार क्या सामान्य और क्या असामान्य कोई भी गतिविधि यदि उसका लक्ष्य आदर्श एवं उदात्त नहीं है बंधन का कारण बनेगी और यदि उसका उद्देश्य पवित्र एवं पुण्य पूर्ण है तो निश्चय ही वह मुक्ति की सम्पादिकता होगी।
मानव-जीवन दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों का एक मिला जुला रूप है। जीवन में दोनों वृत्तियाँ सक्रिय रहने का प्रयत्न करती रहती हैं। मुक्तिकाँक्षी व्यक्ति को चाहिये कि वह अपना सारा सहयोग दैवी प्रवृत्तियों को बढ़ाने, प्रोत्साहित करने तथा पालने में लगाये। दैवी वृत्ति के लक्षण हैं- परिश्रम, पुरुषार्थ, त्याग, प्रसन्नता, उदारता, उत्साह, आशा तथा मर्यादा आदि जिनको ग्रहण करने से मनुष्य की आत्मा में हर्ष तथा आनन्द का प्रकाश आता है और संसार समर में एक साहसी योद्धा की तरह अविरत संघर्ष करते रहने का बल प्राप्त होता है। आसुरी प्रवृत्तियों के लक्षण हैं आलस्य, प्रमाद, स्वार्थ, लिप्सा, निरुत्साह, निराशा, आवेश, उत्तेजना अथवा अदक्षता आदि जिनके दोष से मनुष्य अंधकार, ध्वंस तथा पतन की ओर अग्रसर होता है।
अस्तु, मनुष्य दैवी तथा आसुरी वृत्तियों का एक समन्वित रूप है जिसकी बंधन अथवा मुक्ति दो ही गतियाँ हो सकती हैं। यद्यपि वह शुद्ध-बुद्ध और स्वभावतः मुक्त परमात्मा का अंश है, तथापि उसे मुक्ति के साथ बंधन की संभावनायें देकर संसार में इसलिये भेजा गया है कि वह अपने गुणों तथा दैवत्व को विकसित करने के लिये प्रतिकूलताओं से संघर्ष करता हुआ पुरुषार्थ का परिचय दे और इस प्रकार इस संसार लीला को रोचक तथा सक्रिय बनाता हुआ अपने उस परमपिता परमात्मा का मनोरंजन करे जिसने अपना एकाकीपन बदलने के लिये इस वैचित्र्य पूर्ण संसार-नाटक की रचना की है। हार-जीत के इस खेल में बंधन, मुक्ति के इस संघर्ष में सफलता तभी संभव है जब मनुष्य जीवन में सामान्य अथवा असामान्य, भौतिक अथवा आध्यात्मिक जिनकी गतिविधियों तथा क्रिया प्रक्रियाओं को आधार बनाए उनको सत्य, शिव और सुन्दरता पूर्वक अपने परम लक्ष्य को ही लक्षित करके सम्पादित करता हुआ इस प्रकार चलता रहे जिससे उसके मार्ग का अन्धकार हटता और प्रकाश बढ़ता जाए।

