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आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्-नान्यत्किञ्चन मिषत्।
स ऐक्षत लोकान्नु सृजा इति।
-एतरेय ब्राह्मण
पूर्व में एक आत्मा ही था अन्य कोई तत्व न था। उसी ने अपनी इच्छा से लोक रचे। सब प्राणियों में व्याप्त यही जानने योग्य है।
अनेक अस्त्र-शस्त्र बनाकर मनुष्य ने अपनी बौद्धिक चतुरता और दक्षता का परिचय दिया पर हम नहीं जानते प्रकृति इस संबंध में कितनी धनवान है। उष्ण कटिबंधीय समुद्र में एक ट्रिगर फिश (वह मछली जिनके शरीर में काँटे होते हैं) पाई जाती है इसका नाम है ‘हुमुहुमु-नुकुनुकु’ जैसा विलक्षण नाम वैसा ही विलक्षण स्वयं भी। इसकी पूँछ, पीठ और सिर पर कुछ काँटे होते हैं जिन्हें यह अपनी इच्छा और नाड़ियों के द्वारा जब चाहती है तरेर कर सीधा और तीक्ष्ण कर देती है, फलस्वरूप किसी भी दुश्मन की इन पर घात नहीं लग पाती। इसके दाँतों की बनावट विचित्र होती है। दोनों जबड़ों में बाहर आठ-आठ दाँतों के अतिरिक्त ऊपर के जबड़े में एक प्लेट की शक्ल में 6 दाँतों की भीतरी पंक्ति भी होती है ऐसा किस सुविधा के लिये है यह वही जानती है क्योंकि प्रकृति की कोई भी रचना निरर्थक नहीं। भले ही मनुष्य सारगर्भित कल्पनाओं के स्थान पर वह क्रिया-कलाप और रचनायें गढ़ता रहे जो उसे लाभ पहुँचाने के स्थान पर हानिकारक होती हों।
जीवों की यह तरह-तरह की आकृति और प्रकृति देखते-देखते शास्त्रकार की जैविक व्याख्या अनायास ही याद आ जाती है-
अनारतं प्रतिदिशं देशे देशे जले स्थले।
जायन्ते वा म्रियन्ते वा बुदबुदा इव वारिणी॥
योग वसिष्ठि 4।45।1-2
एवं जीवाश्रितो भावा भव भावन योहिता।
ब्रह्मणः कल्पिताकाराल्लक्षशोऽप्यथ कोटिशः॥
असंख्याताः पुरा जाता जायन्ते चापि वाद्यभोः।
उत्पत्तिष्यन्ति चैवाम्बुकणौधा इव निर्झरात्॥
-योग वसिष्ठ 4।43।1-2
हे राम! जिस प्रकार जल में अनेक बुलबुले बनते और बिगड़ते रहते हैं उसी प्रकार सब देश सभी कालों में यह चेतना ही अनेक जीवों के रूप में उत्पन्न और नष्ट होती रहती है। यह सब चित के रूपांतर का फल है। जीव अपनी इच्छा और कल्पना के द्वारा लाखों और करोड़ों की संख्या में तीनों कालों में उत्पन्न होते रहते हैं जैसे झरने के जल कण।
भारतीय दर्शन की यह मान्यतायें कितनी सत्य और स्पष्ट हैं उसे समझने के लिये भगवान ने मनुष्य शरीर जैसा एक परिपूर्ण यंत्र बनाया है। इसमें भरी चेतना भी एक क्षुद्र जीव ही है जो बौद्धिक विकास के कारण इस स्थिति में है कि अपनी यथार्थ अवस्था का ज्ञान, अनुभव और साक्षात्कार कर सकता है और 84 लाख योनियों में भ्रमण कराने वाली इच्छाओं, वासनाओं को जीत कर विराट आत्मा, ब्रह्म और परम पद तक की प्राप्ति कर सकता है।

