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Magazine - Year 1970 - Version 2

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वर्तमान की मुट्ठी में भूत और भविष्य-दर्शन

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सन 1966 तक वैज्ञानिकों ने देखने के विज्ञान को अधिक महत्व नहीं दिया। अब तक यह समझा जाता था कि कोई वस्तु देखने के लिये आँखें और रोशनी मात्र पर्याप्त है। साधारण मनुष्य जिस प्रकार अपने थोड़े से ज्ञान के आधार पर ही वस्तुओं का मूल्याँकन करते हैं और सृष्टि के कण-कण में भरी हुई रहस्यपूर्ण जानकारियों से वंचित रह जाते हैं उसी प्रकार अब तक वैज्ञानिकों ने भी दृश्य-विज्ञान की सामान्य सी जानकारियाँ तो प्राप्त कर ली थीं पर उनकी पहुँच भारतीय योगियों और तत्ववेत्ताओं की पहुँच से करोड़ों मील पीछे थी।

1967 में अपने-अपने ज्ञान का अहंकार और सीमा बंधन तोड़ कर संसार के तीन बड़े वैज्ञानिक सर्वश्री 1. डॉ- जार्ज वाल्ड (हारवर्ड यूनिवर्सिटी के प्राणि विज्ञान के प्रोफेसर) 2. डॉ. हाल्डेन केफेर हार्टलाइन (जैव भौतिक प्रोफेसर राक फेलर यूनिवर्सिटी) तथा 3. ‘नोबेल कन्सटीट्यूट फॉर ब्यूरो फिजियोलॉजी’ के अध्यक्ष डॉ. रैग्नर ग्रैनिट ने अपने अध्ययन और शोधों को एकत्रित किया तो पता चला कि किसी वस्तु को देखने के लिये केवल मात्र प्रकाश और आँखें ही पर्याप्त नहीं वरन् आँखों से लेकर मस्तिष्क के उस स्रोत तक की सारी जानकारी भी आवश्यक है जो दृश्य और प्रकाश की अनुभूति में सहायक और कर्त्ता का काम करती है। यह एक महत्वपूर्ण क्षण था जब इन तीन वैज्ञानिकों को 1967 में नोबेल पुरस्कार देकर संसार को बताया गया कि सत्य और तथ्य एक विषय की विशेषता मात्र से समझ में नहीं आते, जब संसार का सब तरह का ज्ञान एक स्थान पर एकत्रित किया जाता है तब कहीं यथार्थ का प्रतिपादन हो पाता है।

देखने का विज्ञान यह है-आँख की पुतली के पीछे एक गोल ताल (लेन्स) लगा होता है जिसमें से होकर प्रकाश किरणें अन्दर गुजर जाती हैं। इस ताल से गुजरने के बाद बिंब उल्टा हो जाता है अर्थात् ऊपर का भाग नीचे और नीचे का ऊपर हो जाता है। इसके बाद प्रकाश ताल के पीछे के नेत्र गोलक नामक खोखले को पार करती है। इस गोलक में भीतरी सतह पर चारों ओर एक विशेष प्रकार की नाडियों की तह होती है इसे दृष्टि पटल या ‘रेटिना’ कहते है। यह रेटिना जिन अत्यन्त सूक्ष्म कोशों (प्रत्येक जीवित पदार्थ प्रोटोप्लाज्मा नामक तत्व से बना होता है उसके सूक्ष्मतम कण को कोश या ‘सेल’ कहते हैं) से बना होता है उन्हें ‘राड’ कहते हैं। प्राणि विज्ञान वेत्ता डॉ. वाल्ड ने बताया कि इन कोशों (राड्स) में ‘रोडोप्सिन’ नामक एक अत्यन्त जटिल रसायन पाया जाता है। इसी को ‘विजुअल पर्पिल’ कहते हैं और वह प्रोटीन एप्सिन तथा ‘विटामिन ए’ को मिलाकर बना होता है। इसी तत्व के परमाणुओं में पदार्थ से टकराकर आने वाले प्रकाश कण विद्युत आवेग (इलेक्ट्रिक करेंट उत्पन्न करते हैं) यह आवेग अपने अन्दर धारण किये बिंब की लहरों को मस्तिष्क में पहुँचाते रहते हैं। मस्तिष्क के कोश उसे ग्रहण किये रहते हैं। मन में यह शक्ति होती है कि वह जब भी मस्तिष्क में छाये इन पिछले कभी के भी दृश्यों पर जोर लगाता है तो वह दृश्य एक-एक कर सिनेमा के पर्दे की भाँति याद आते चले जाते हैं।

यथार्थ में ज्ञान और विज्ञान के सब रहस्य मस्तिष्क के प्रकाश कणों में भरे हैं। पर अभी विज्ञान की जानकारियाँ इतनी व्यापक नहीं हो पाईं कि मस्तिष्क के किन्हीं कोशों के रासायनिक विश्लेषण द्वारा मनुष्य के बताये बिना किसी मशीन से उन सब चित्रों और दृश्य को टेलीविजन पर्दे की तरह साफ किया जा सके जिसे मस्तिष्क ने पहले कभी देखा है। पर वैज्ञानिक इस तथ्य से इनकार नहीं करते कि प्रकाश कणों की सूक्ष्म अवस्थाओं में ज्ञान-विज्ञान के वह अक्षर विधाता की कुण्डली के समान अंकित अवश्य रहते हैं।

पतंजलि कृत योग दर्शन के सूत्र 3 के 30वें निरुक्त में बताया है- ‘मूर्द्ध ज्योतिषि सिद्ध दर्शनम्’ अर्थात् कपाल के भ्रू-मध्य स्थित छिद्र में झाँकने से प्रकाश के दर्शन होते हैं। यह प्रकाश ही ज्ञात की अनुभूति करता है। उसमें संयम करने से योगी न केवल नेत्र बंद करके भी सब संसार को देख सकने में समर्थ हो जाता है वरन् वह भूत और भविष्य को भी जानने लगता है।

संयम का अर्थ है धारणा, ध्यान और समाधि-त्रयमेकत्र संयमः (योग दर्शन 3।4)। अर्थात् जब किसी वस्तु में ध्यान इस तरह विलीन हो जाये कि ‘मनुष्य शरीर हूँ ऐसी कल्पना ही शेष न रहे’ वरन् ऐसी अनुभूति होने लगे कि ‘वह वस्तु में स्वयं हूँ’-तो उस वस्तु के सम्पूर्ण गुणों का विकास अपनी आत्मा में हो जाता है। अर्थात् यदि सूर्य-मण्डल में संयम किया जाये और ध्यान पूर्ण परिपक्व हो जाये तो सूर्य की जो भी दिव्य शक्तियाँ हैं, वह सब मानवीय अन्तःकरण में उतरी हुई देखी जा सकती हैं।

इन तथ्यों को शाण्डिल्य उपनिषद् में भी विस्तार से बताया गया है कि मस्तिष्क में चित्र का संयम करने और धर्म अधर्म दोनों से निरासक्त हो जाने अर्थात् न तो किसी से राग हो, न द्वेष, न प्रेम हो, न घृणा, न लगाव हो न दुराव आदि की स्थिति में सत्यलोक का ज्ञान होता है और भूतकाल में क्या हुआ, आने वाले भविष्य में क्या होगा, उसका एक-एक क्षण का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

अब तक भारतीय योग की इन बातों को अतिरंजित, काल्पनिक, मिथ्या और भ्रमोत्पादक कहा जाता रहा है पर प्रकाश और उसके विभिन्न स्रोतों की नई-नई जानकारियों के आधार पर अब जो तथ्य सामने आये हैं वह यह बताते हैं कि भूत और आगत भविष्य की होनहार को एक क्षण में जान सकना कोई असंभव बात नहीं है। पर यह सब ज्ञान से ही संभव है वैज्ञानिक यंत्रों से भी भूत और भविष्य का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। वैज्ञानिक इसके लिये परिश्रम के साथ किसी ऐसी मशीन के निर्माण के लिये प्रयत्नशील भी हैं, मशीनें जटिल, कठिन और धनसाध्य साधन हैं मनुष्य शरीर एक परिपूर्ण यंत्र है हमें केवल उस यंत्र के प्रयोग की यौगिक प्रणाली पर विश्वास करने और उसे निष्ठापूर्वक सीखने भर की आवश्यकता है। योग और विज्ञान- सिद्धाँत दोनों के एक समान हैं उनके वर्णन और अनुभूति की शैली मात्र भिन्न है।

भूत क्या था और भविष्य क्या होगा इसे जानने के लिये आकाश स्थित ग्रह-नक्षत्रों, प्रकाश पिण्डों, मन्दाकिनियों और नीहारिकाओं का तात्विक विवेचना, ग्रह-पथ, ग्रह-गति और उसकी पृथ्वी से दूरी के आधार पर किया जाता है। ज्योतिष के इस ग्रह-गणित वाले भाग पर किसी समय भारतीय आचार्यों ने महत्वपूर्ण शोधें की थीं। आज उस गणित को भुलाकर ज्योतिष के नाम पर फलित और अधूरे कूड़े-कचरे जैसे भाग्यवाद को प्रोत्साहन देने वाली दुकानें तो हैं पर उस आर्ष-गणित को समझने और विकसित करने की कठिनाई कोई मोल नहीं लेना चाहता। यदि ऐसा किया गया होता तो भूत, भविष्य की जानकारियाँ ही न मिलती लोग मनुष्य-जीवन के लक्ष्य, अनिवार्य कर्मफल, प्रायश्चित आदि के द्वारा आत्म-शुद्धि के विज्ञान को भी अच्छी तरह समझते। ग्रह-गणित की यथार्थ उपयोगिता यही थी। भविष्य को जानने के पीछे आत्म-शुद्धि के विधान प्राचीन ग्रंथों में स्थान-स्थान पर लिखे हैं वह इस बात के प्रमाण हैं कि जहाँ मनुष्य पूर्वकृत कार्यों के फल भोगने के लिये अनिवार्य रूप से बाध्य है वहाँ वह अपने भविष्य को अच्छा बनाने और जीवन को ऊंचा उठाने में भी आप ही समर्थ है।

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