हृदय-परिवर्तन
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बूढ़े विण्डाल के लिये वह दिन सबसे खुशी का था, जिस दिन सम्राट अश्वजित ने उसके स्थान पर उसके युवा पुत्र किरात को ‘बधिक’ नियुक्त कर दिया था। उसने तीस वर्ष तक लगातार चामुण्डा मन्दिर में बलि कार्य किया था। अनेक पुरस्कार जीते थे। उसकी कलाई में वह दम-खम था कि एक ही बार से बलिष्ठ महिषों के भी सिर धड़ से अलग कर देता था। उसके द्वारा सम्पन्न होने वाले बलि कर्म देखने के लिये राज-दरबार तक उपस्थित होता था।
पर अब वह वृद्ध हो चुका था और किरात युवक, इसलिये वह भी चाहता था कि किरात को उसका उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया जाये। भगवान ने उसकी भी सुनी पर कुछ इस तरह कि होनी अनहोनी बन गई जो न हो सकता था वह हो गया।
किरात ने कई बार पशु-वध के समय कटते हुये जीवों का करुण क्रन्दन सुना था। उनकी मार्मिक चीत्कारें वह भूल न पाता था, कटी हुई लोथों की छटपटाहट उसे चैन न लेने देती थी। बाल्यकाल से ही उसके अन्तःकरण में इस अनात्म कर्म के प्रति घृणा उत्पन्न हो चुकी थी।
आज नियुक्ति-पत्र आया था और अभी कल ही वह लिच्छवियों द्वारा आयोजित एक धर्म सभा में महाश्रमण नगसमाल के प्रवचन सुनकर आया था। अभी भी नगसमाल के शब्द- ‘संसार एक है प्राणिमात्र सत्ता ही विभिन्न रूपों में खेल कर रही है। इस मर्म को समझकर किसी के प्रति घृणा और दुर्व्यवहार नहीं करना चाहिये। जीव मात्र के प्रति दया, करुणा और उदारता का व्यवहार करना चाहिये।’ अभी भी उसके कानों में गूँज रहे थे। आज पहली बार उसे एक बधिक का पुत्र होने पर घृणा उत्पन्न हुई थी। आत्मा कहती थी कुल पर लगे इस कलंक को धोना ही चाहिये। देवताओं के नाम पर होने वाली इस हिंसा को रोका ही जाना चाहिये, पर वह सब यह कैसे करे यह उसकी समझ में नहीं आ रहा था।
तभी हंसता हुआ विण्डाल आया और बोला-वत्स, तुम आ गये यह लो खड़ग, इसे शान पर स्वयं मैंने चढ़ाया है इसकी धार इतनी तीक्ष्ण है कि तुम्हारी यह प्रथम परीक्षा शत प्रतिशत सफल होगी। आज दुर्गा-अष्टमी है। सम्पूर्ण राज-दरबार उपस्थित होगा तुम्हें अपनी शक्ति का परिचय देना है कुल की शान और परम्परा अब तुम्हारे हाथ है।
किरात चामुण्डा के मन्दिर की ओर चल पड़ा। बोला कुछ नहीं, संकल्प विकल्प लिये वह वध-स्थल पर पहुँच तो गया पर वहाँ बलि के लिये लाये गये निरीह पशुओं को देखते ही उसकी आत्मा काँप उठी। उसने एक बार सम्राट अश्वजित से लेकर छोटे से छोटे नागरिक तक सबकी आँखों में आँखें डालकर देखा। सब पत्थर की सी मूर्तियाँ लगी जिनमें शारीरिक कलाकारिता तो थी पर भावनाओं के स्थान पर उनका विद्रूप अट्टहास कर रहा था। उसे इन मांसाहारियों पर घृणा हो आई पर अब कुछ कहने के लिये समय रहा नहीं था।
पुजारी पूजा समाप्त कर चुका था। बलि का समय हो चुका था। किरात के सामने महिष प्रस्तुत किया गया, खड़ग ऊपर आकाश की ओर लपका तो विण्डाल सहित संपूर्ण परिवार उपस्थित जनसमूह की आँखें चमक उठीं गजब की स्फूर्ति पर दूसरे ही क्षण सारी चमक करुणा में बदल गई। जब- किरात को “हिंसको! घात करना है तो अपना करो। ईश्वर के बनाये जीवों को मारने और मरवाने का तुम्हें क्या अधिकार” कहकर खड़ग का अपने ऊपर प्रहार करते देखा। एक क्षण में ही किरात का सिर धड़ से अलग हुआ पड़ा था। विण्डाल परिवार फूट-फूट कर रोने लगा। आगन्तुकों की आँखें झरने लगीं। स्वयं अश्वजित भी यह दृश्य देखकर विचलित हो उठे। अश्रु पोंछते हुये वे वहाँ से उठकर चले गये और घोषणा करा दी फिर कभी राज्य के किसी भी भाग में पशु-बलि न दी जाये।

