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Magazine - Year 1970 - Version 2

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यह रही सच्ची भावना की शक्ति- सामर्थ्य

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प्रातःकाल अखबार वाले ने आवाज लगाई और आप भागे। अखबार हाथ में आते ही सबसे पहली निगाह प्रथम पृष्ठ की ‘थ्री लाइन’, ‘टू लाइन’ और ‘वन्निक’ टाइप की मोटी हेडिंगों पर जाती है और आप यह जानने के लिये उतावले हो जाते हैं कि मंत्रिमण्डल में क्या परिवर्तन हुये, किस देश में सैनिक क्राँति हुई, इलेक्शन में कौन जीता, अपोलो-14 चन्द्रमा तक पहुँचा या कहीं और खो गया आदि-आदि। लन्दन में एक ऐसी महिला भी है जो अखबार के इन प्रसंगों को उपेक्षा से देखती है। पहले यह ढूंढ़ती है संसार में कहीं सूखा पड़ने का तो समाचार नहीं छपा। यदि ऐसा कोई समाचार हुआ तो वह आगे अखबार पड़ना बन्द करके अपने साधना कक्ष की ओर चल पड़ेंगी। यह उनका निजी कमरा है जहाँ वे भगवान के भजन से लेकर मानव जाति के सेवा के काम-काज किया करती हैं।

नाम है श्रीमती डोरिस मुँडे। पचास वर्ष की वृद्धा शरीर से सामान्य व्यक्तियों की तरह साधारण किन्तु असाधारण भावनाओं वाली श्रीमती एटलस निकाल कर देखती है वह स्थान किस देश, किस महाद्वीप में है। फिर ध्यान लगाकर बैठ जायेंगी और कुछ ही क्षणों में उनकी स्थिति समाधिस्थ योगी कि सी हो जायेगी। शरीर कमरे में रखा हुआ होगा और भाव-शरीर उस सूखे वाले इलाके में। वह अपने हृदय की सम्पूर्ण एकाग्रता और तल्लीनता के साथ भावना करती है कि मेरी अजस्र प्राण शक्ति बादलों में घुल रही है। अब इन बादलों को लेकर मैं उस सूखे वाले क्षेत्र की ओर चल पड़ी। बादलों की क्या बिसात, जो मेरी आज्ञा न मानें, आगे-आगे मैं पीछे-पीछे बादल, लो आ गया यह सूखाग्रस्त क्षेत्र। बादलों! यह देखो, प्यासी धरती, प्यासे लोग, प्यासे जीव-जन्तु कितने दुःखी हो रहे हैं संसार का सुख और शाँति करुणा पर टिका है। हर सम्पन्न व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि अभावग्रस्त प्राणियों के उत्थान और उद्धार के लिये कुछ दे तुम स्वार्थ क्यों बरतते हो, देने की कंजूसी मत करो अब बरसो! बरसो। बादलों अब तो तुम्हें बरसना ही पड़ेगा।

पानी बरसने लगता है। लोग खुशी से नाचने लगते हैं और उनकी प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता घुलाकर श्रीमती डोरिस की आत्म-चेतना वापस लौट आती है। दूसरे दिन अखबार में समाचार आता है उस स्थान में इतनी जलवृष्टि हुई कि सूखा समाप्त हो गया। वह समाचार पढ़कर श्रीमती डोरिस की प्रसन्नता का पारावार नहीं रहता।

श्रीमती डोरिस का कहना है कि सच्चे हृदय से की गई प्रार्थना के आगे बादल तो क्या भगवान को भी झुकना पड़ता है। उन्होंने ‘नाफिन’ को बताया कि अपनी इस भावना-शक्ति के द्वारा हमने लालचीन, पेरु, अमरीका तथा भारत का सूखा दूर कराया है। कुछ दिन पूर्व बिहार और पाँच वर्ष पहले आस्ट्रेलिया में पड़े जबर्दस्त अकाल को दूर करने में उन्होंने अपनी इस शक्ति का प्रयोग किया था और उन्हें सफलता मिली थी। यह समाचार 28 जुलाई की ‘नई दुनिया’ और संसार के अन्य समाचार पत्रों में भी छपा था। उससे लोगों को भावनाओं की शक्ति का पता चला।

हमारे देश में जो भावनाओं की शक्ति से पत्थर से भगवान को पैदा करने, विष को अमृत बना देने तक के प्रयोग हो चुके हैं, यह उदाहरण उसका ही एक संक्षिप्त प्रमाण है। भाव विज्ञान की शक्तियाँ तो इससे भी हजारों गुना बड़ी और आश्चर्यजनक हैं।

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