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एगो में सासओ अप्पा नाण दंसण संजुओ।
सेसा में वाहिरा भावासब्बे सजोग लक्खणा।
एगस्स चैव मरणं सिज्जई नीरओ॥
-षड्दर्शन समुच्यय
अपनी ज्ञान, दर्शन संयुक्त शाश्वत आत्मा ही धर्मात्मा है, शेष सारे संयोग तो ब्रह्म भाव हैं एक आत्मा का ही मरण है और एक आत्मा की ही सिद्धि है।
पीछे डॉ. किलनर ने यह घटना कई पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों में छपाई। वैज्ञानिक की बात कोई अंधविश्वास नहीं हो सकती इसलिये दूसरे वैज्ञानिकों का भी ध्यान उधर गया। इस घटना को अमरीका के वैज्ञानिक डॉ. विलियम मैग्डूगल ने बहुत महत्व दिया। उन्होंने एक ऐसे तराजू का निर्माण किया जिसमें पलंग के साथ एक आदमी का भार भी तोला जा सकता हो और बाल जितनी सूक्ष्म वस्तु का भी भार तोला जा सकता हो। एक बार एक मरणासन्न रोगी पहुँचा। उन्होंने उसे उसी तराजू के एक पलड़े पर बिस्तर सहित लिटा दिया और प्रत्येक स्थिति में उसके सूक्ष्म से सूक्ष्म भार के अन्तर को भी अलग कागज पर अंकित करते रहे। जैसे ही रोगी के प्राण निकले यंत्र की सुई एक औंस (आधी छटाँक) कम वाले चिह्न पर आकर स्थिर हो गई। इससे यह सिद्ध हो गया कि चेतना चाहे किसी भी द्रव्य से बनी हो पर उसके सूक्ष्म शरीर का भी भार हो सकता है। अन्य रोगियों की परीक्षा करने पर यह भार डॉ. मैग्डूगल ने 1।4 औंस से लेकर डेढ़ औंस तक पाया। जितना वजन कम मिला यह पाया गया कि वह व्यक्ति उतना ही बुद्धिमान, विद्वान और गुण सम्पन्न रहा है जबकि भार की अधिकता वाले गुणों की दृष्टि से निम्न स्तर के व्यक्ति थे। ऐसे प्रयोग लास ऐन्गिल्स के डॉ. टवाइनिंग और कार्नल विश्व विद्यालय के डॉ- ओटोरान ने भी किये, उनकी मान्यतायें भी ऐसी ही हैं।
प्रकाश कणों या दिव्य-ज्योति के रूप में प्रवाहमान आत्मा के बारे में भारतीय तत्वदर्शियों के यह कथन हैं कि आत्मा 1. सनातन है 2. आत्मा सर्वव्यापी है 3. आत्मा स्वाधीन है। पर कर्म बन्धनों में बंधा होने के कारण वह शरीरों में आया जाया करता है अब विज्ञान के भी प्रतिपाद्य विषय बन गये हैं। अमरीका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डॉ. जेम्स वाटसन और इंग्लैण्ड की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के डॉ. फ्रांसिस क्रिक ने जीवित कोश (सेल- अर्थात् जीवित द्रव्य का छोटे से छोटा टुकड़ा जिससे शरीर बनता है) के नाभिक (न्यूक्लियस) में ही ज्ञान व संस्कार-गुणसूत्र (क्रोमोसोम) पाये जाते हैं यह पैड़ीदार और बीच-बीच डोरी में लगी गाँठों की तरह होते हैं। इन गाँठों को जीन्स (संस्कार सूत्र) कहते हैं। नाभिक प्रकाश तत्व है और उसी में जीवन तत्व होना, उसका प्रकाश पुँज होना प्रमाणित करता है यही निकल जाने से शरीर निष्प्राण हो जाता है। इससे सिद्ध है कि वह पदार्थ से पृथक अस्तित्व वाला है।
मनुष्य शरीर में 600 खरब जीवित कोश पाये जाते हैं, इन कोशों में जितने जीन्स होते हैं उनकी लम्बाई एक ‘कोश’ में 5 फुट तक हो सकती है। 600 खरब कोशों में जीन्स की- लंबाई 3000 खरब फुट होगी यह एक अनुमानित लंबाई है वास्तविक तो अनन्त है यदि अपना ज्ञान इस चेतना के सूक्ष्म में स्थिर कर दिया जाये तो मनुष्य अपने आपको विश्व-व्यापी चेतना के रूप में ही पायेगा इसी का नाम आत्मानुभूति या आत्म-साक्षात्कार है, यह स्थिति कठिन अभ्यास से ही बन पाती है जब तक मनुष्य अपने इस विराट स्वरूप को नहीं पहचानता और भौतिक पदार्थों के सुख की इच्छा किया करता है तब तक वह जीव है, बंधन में पड़ा हुआ मानवेत्तर योनियों में भ्रमण करता रहता है, आत्मा में स्थिर हो जाने का कदाचित अवसर मिल जाता है तो यही जीव युग-युगान्तरों के कल्मष-काषाय धोकर इसी शरीर से स्वर्ग और मुक्ति का रसास्वादन करता हुआ अपना पारमार्थिक लक्ष्य पूरा करता है।

