हम आसुरी वृत्तियों को नहीं देव वृत्तियों को अपनायें।
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
मनुष्य की वे सारी क्रियायें और प्रतिक्रियायें जो उसे अंधकार, ध्वंस अथवा पतन की ओर ले जाती हैं आसुरी वृत्तियाँ होती हैं और जो क्रियायें प्रतिक्रियायें प्रकाश, सृजन और उत्थान की ओर प्रेरित करती हैं वे दैवी वृत्तियाँ मानी गई हैं। मानव-जीवन की दो गतियाँ हैं- एक बंधन, दूसरी मुक्ति। बन्धन दुःख का हेतु और मुक्ति सुख का। आसुरी वृत्तियों से बंधन और दैवी वृत्तियों से मुक्ति प्राप्त होती है। दैवी और आसुरी दोनों वृत्तियाँ परस्पर विपरीत तथा विरोधिनी होती हैं। मानव जीवन में इन दोनों का अस्तित्व है। दोनों अपना-अपना अवसर पाकर काम करती हैं और मनुष्य को बंधन अथवा मुक्ति की ओर बढ़ाती रहती हैं। कभी मनुष्य की आसुरी वृत्ति प्रबल हो जाती है और कभी दैवी। क्रिया प्रतिक्रियाओं के रूप में इन वृत्तियों का संघर्ष ही मानव-जीवन की गति है। जिस मानवीय प्रक्रिया को जीवन यापन कहा जाता है वह वास्तव में इन दो वृत्तियों का ही खेल है।
मनुष्य में यह दोनों वृत्तियाँ समान रूप से निवास करती हैं। क्योंकि मनुष्य आसुरी और दैवी दोनों स्थितियों का समन्वित रूप है। वह न तो पूरी तरह देवता है और न पूरी तरह असुर। किन्तु ये दोनों संभावनायें उसके लिए उपलक्षित हैं। वह चाहे तो देवता बन सकता है और चाहे तो असुर बन सकता है। इन्हीं दो दिशाओं के मिलन बिन्दु पर खड़ा मनुष्य इस बात के लिये सर्वथा स्वतंत्र है कि वह किसी भी एक दिशा में प्रस्थान कर सकता है। मनुष्य की गति अगति पर किसी प्रकार का नैसर्गिक प्रतिबंध नहीं है।
मनुष्य बंधन और मुक्ति की ओर जाने वाले मार्ग मिलन पर ही खड़ा है। वहाँ से वह अपनी रुचि के अनुसार शुभ अथवा अशुभ दिशा में चला जाता है। पुण्यवान, परमार्थों, समाज देवी, सज्जन, महापुरुष, ऋषि-मुनि आदि सारे सत्पुरुष शुभ और पापी, अघी, अपराधी, अपघाती आदि सब अशुभ दिशागामी होते हैं। शुभ दिशा की ओर जाने वाले मुक्ति के अधिकारी होते हैं और अशुभ दिशा की ओर जाने वाले बंधन में पड़ते हैं।
मुक्ति ही मनुष्य का जीवन लक्ष्य है। उसका जन्म इसी उद्देश्य से हुआ है। जो बन्धनों की ओर अग्रसित है उन्हें लक्ष्य भ्रष्ट ही कहा जायेगा। इस सत्य के साथ यह प्रश्न उठ सकता है कि जब मनुष्य का लक्ष्य मुक्ति है तो उसके लिए बंधन के कारण क्यों उत्पन्न किये गये हैं? इसका उत्तर यह है कि यदि बंधन के कारण उत्पन्न न किये गये होते तो मनुष्य के पुरुषार्थ का प्रदर्शन अथवा परीक्षा किस प्रकार होती और किस प्रकार यह संसार चक्र चलता। सभी आत्मायें सहज ही मुक्त हो होकर चली जाती और यह संसार एक दिन विजन हो जाता। परमात्मा द्वारा प्रेरित इस नाटक में रोचकता नहीं रहती और जल्दी ही इसका अन्त हो जाता।
यदि परमात्मा को मनुष्य की सहज मुक्ति ही वाँछित होती तो वह उसे संसार चक्र में डालता ही क्यों? उसकी असंसारी स्थिति मुक्ति की तो स्थिति होती है। अपने अंश जीवात्मा को संसार चक्र में संयोजित कर परमात्मा उसके पुरुषार्थ, पुण्य परमार्थ तथा निष्क्रियता, पापों तथा स्वार्थपरक खेलों को देखता और उनका आनन्द लिया करता है। दैवी और आसुरी वृत्तियाँ देकर उसने मनुष्य को मुक्ति तथा बंधन के संघर्ष में लगाया है।
सोने, जागने, खाने, पीने, कमाने से लेकर, पुण्य, परमार्थ, तप, त्याग और साधना तक ही मनुष्य की सारी क्रियायें प्रतिक्रियायें एकमात्र बंधन अथवा मुक्ति का प्रयत्न ही है। इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। यह मानना है कि मनुष्य के बंधन अथवा मुक्ति की विधायिका क्रियायें, प्रतिक्रियायें भिन्न-भिन्न प्रकार की होती हैं भूल ही होगी। मानव जीवन की सम्पूर्ण गतिविधि इन्हीं दो में से एक गति की सम्पादिका होती है। बंधन अथवा मुक्ति दायिनी गतिविधियों का अलग-अलग कोई बंटवारा नहीं है। जो एक काम मनुष्य के लिए मुक्ति का कारण हो सकता है वही बन्धन का भी कारण हो सकता है। मनुष्य की हर क्रिया एवं कर्म में मुक्ति अथवा बंधन का परिणाम निरन्तर छिपा रहता है।
जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि मनुष्य की वे सारी क्रियायें तथा प्रतिक्रियायें जो अंधकार, ध्वंस अथवा पतन की ओर ले जाने वाली होती हैं आसुरी- अर्थात् बंधन का कारण होती हैं, और जो क्रिया प्रतिक्रियायें प्रकाश, सृजन अथवा उत्थान की ओर ले जाने वाली होती हैं, वे दैवी अर्थात् मुक्ति का हेतु होती हैं। इस तथ्य को सम्मुख रखकर अपनी गतिविधि का सम्पादन करने वाले शुभ अथवा अशुभ दिशा में बढ़ते चले जा सकते हैं।
उक्त दो में से किसी एक दिशा में जाने के लिये किन्हीं भिन्न-भिन्न गतिविधियों का विधान नहीं है। मनुष्य के जीवन यापन की सामान्य क्रियायें ही उसका यह उद्देश्य पूरा करती चलती हैं। प्रसंग को समझने के लिये मनुष्य की कोई भी गतिविधि लेकर उसकी विवेचना की जा सकती है। जीवन यापन की सबसे सामान्य गतिविधि है कमाना और खाना। यह एक सामान्यतम गतिविधि भी बंधन अथवा मुक्ति में सहायक हो सकती है।
जीवन धारण करने के लिये भोजन परमावश्यक शर्त है और भोजन पाने के लिए कमाना अर्थात् परिश्रम तथा पुरुषार्थ करना अनिवार्य है। भोजन परिश्रम का ही फल है। अर्थात् पहले परिश्रम करना होगा तब भोजन प्राप्त होगा। भोजन के लिये जो मनुष्य मजबूरी समझकर परिश्रम में प्रवृत्त होता है वह अपनी उस गतिविधि को अशुभ मुखी बना लेता है। काम को भार समझकर बेगार की तरह टालना, बेमन अथवा अदक्षता पूर्वक करना, काम में चोरी, आलस्य अथवा प्रमाद करना आदि, इस प्रकार की जो भी वृत्ति है वह मनुष्य के इस सामान्य कर्त्तव्य को भी बंधन का कारण बना देती है। इसी प्रकार काम में असफल होने पर निराश, निरुत्साह अथवा विरक्त हो जाना भी आसुरी वृत्ति है जिसका फल बंधन के रूप में ही सामने आता है।
इसके विपरीत जो मनुष्य इसी काम को अपना पावन कर्त्तव्य समझकर पूरे उत्साह, दक्षता तथा संपूर्ण तन-मन से करता है, साथ ही सफलता असफलता की स्थिति में तटस्थ रहकर समान रूप से प्रसन्न और प्रफुल्लित रहता है उसकी यह छोटी सी प्रक्रिया भी उसे मुक्ति की ओर ले जाती है।
प्रायः जप-तप, पूजा-पाठ उपासना साधना आदि की धार्मिक अथवा आध्यात्मिक स्वभाव की क्रियाओं को शुभ और मुक्ति प्रदायिका माना जाता है। निश्चय ही यह है भी। किन्तु कब? जब इनको इन्हीं की स्थिति में रखा जाए। इनको निःस्वार्थ, निष्काम तथा निर्लोभ भाव से किया जाय। यदि इन पवित्र क्रियाओं को कामनाओं और वासनाओं द्वारा अपवित्र कर डाला जाएगा तो यह मुक्ति के स्थान पर बंधन की ही विधायिका बन जायेगी। तथापि इनमें कामनाओं का समावेश किया जा सकता है, किन्तु इन्हीं के अनुरूप कामनाओं का समावेश। जैसे इस उपासना अथवा धार्मिक गतिविधि से हमें तन-मन की पवित्रता मिले। हमारी आत्मा में दिव्य प्रकाश प्रस्फुटित हो। हमारी विषय वासनायें शाँत हों। हम अहंकार से निकलकर प्रकाश की ओर बढ़ें। इस प्रकार की पवित्र एवं निष्कलुष कामनायें आध्यात्मिक अथवा धर्माचार की क्रियाओं के अनुरूप हैं। इनको जोड़ लेने से उसका स्वरूप विकृत नहीं होता और उनकी प्रगति प्रकाश की ओर ही होती है।

