आत्म चेतना की विलक्षण आकृतियाँ-प्रकृतियाँ
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दक्षिणी ट्रिनीडाड द्वीप पर पहली बार पर्यटक ‘नवीन’ की खोज में गये तो उन्हें पहले से ही स्वागत के लिये तैयार ‘टर्न’ और अल्बेट्रास’ नाम के दो पक्षी मिले उनकी प्रारंभिक भेंट से ही यात्रियों को पता चल गया कि विकसित चेतना मनुष्य के भाग्य में ही नहीं है। सृष्टि के दूसरे जीव-जन्तुओं में भी आत्म चेतना की वह विलक्षणतायें विद्यमान हैं जिन्हें मनुष्य अपने लिये लाखों करोड़ों वर्ष का बौद्धिक विकास मान्यता है।
बत्तख की सी आकृति वाले इन पक्षियों की विशेषता यह थी कि वह बिना हिचकिचाहट यात्रियों के पास चले आये, एक बार भगवान राम के सहयोगी सहचर रीछ-वानर समुद्र के किनारे बैठे कुछ परामर्श भर कर रहे थे तब कहीं से संपाती नामक भयानक गिद्ध वहाँ जा पहुँचा, उसे देखते ही उन सबके प्राण सूख गये थे, वैसे ही इन यात्रियों के हृदय किसी अनिष्ट की आशंका से धड़क उठे थे, पर इनके कंधों तक पर आ बैठने वाले इन पक्षियों ने मानो उनको लज्जित करते हुए कहा हो- ‘हम तुम्हारे जैसे किसी भी प्राणी को अपने स्वार्थ के लिये पीड़ित-प्रताड़ित और मारकर खा जाने वाले नहीं, आत्मा की आकांक्षायें क्या हैं, हम उसे जानते और आचरण करते हैं।
यह बातें बेचारे पक्षियों ने मुख से नहीं कहीं पर उनके व्यवहार से यही भावार्थ निकलता था। इन पक्षियों ने इनका स्वागत किया। कुछ उन्हें अपने घोंसलों तक ले गये, उनका मनुष्य की तरह अभिवादन किया और यात्रियों के अभिवादन का उत्तर भी दिया।
सारी पृथ्वी में यह जो प्रकृति दिखाई दे रही है वह हमारी दृष्टि में भले ही तुच्छ जान पड़े पर अध्ययन यह बताता है कि वह सब एक ही आत्म-चेतना की विलक्षण और रहस्यपूर्ण परिणति है। एक ही चेतना अपनी इच्छा आकाँक्षाओं के रूप में अनेक शरीर धारण करती रहती है। प्रकृति निर्जीव नहीं, जीवित क्रिया शक्ति है गुण और जीवन पद्धति उतनी ही विलक्षण है जितनी इच्छा और वासनाओं वाला यह संसार रहस्य पूर्ण है।
अर्विन के मन में विकासवाद सिद्ध करने का एक भूत सवार था इसी कारण उन्होंने यद्यपि सैकड़ों विलक्षण जीव−जंतुओं का अध्ययन किया पर, उन सबकी शारीरिक रचना का वह अंश ही चुनने में लगाया जो विकासवाद का सिद्धाँत सिद्ध करने में सहायक मिला। आज का जीवशास्त्र का विद्यार्थी कदाचित प्रश्न कर देता है कि यदि प्राकृतिक परिवर्तनों और इच्छा शक्ति के कारण ही जीव एक कोशीय अवस्था से विकसित होकर बहुकोशिय क्षुद्र जन्तुओं की श्रेणी में आये और क्रमशः हाइड्रो, मछली, घोड़ा, बन्दर आदि बनते-बनते मनुष्य बन गया तो फिर जीवों के स्वभाव और बनावट की इस विलक्षणता का क्या रहस्य है? वह किस बात के विकसित परिणाम हैं जो आज भी अनेक जीवों में दिखाई देते हैं।
उत्तरी अमेरिका में अलास्का से बाजा कैलीफोर्निया तक समुद्र में 60 फुट से 1800 फुट तक की गहराई में ‘लेम्प्रे’ जाति की एक मछली पाई जाती है इसका नाम है ‘हैगफिश’। कोई कल्पना नहीं कर सकता कि कई इंजनों वाले जेट विमान के समान इस मछली के 4 हृदय होते हैं, पेट होता ही नहीं और नथुना भी केवल एक ही होता है, दाँत जीभ में होते हैं। अपने शरीर को रस्सी की सी गाँठ लगाकर यह किसी मरे हुये जीव के शरीर में घुस जाती है और उसका सारा शरीर चट कर जाती है पर आश्चर्य है कि भोजन न मिले तो भी वह वर्षों तक जीवित बनी रह सकती है।
हैगफिश किस जीव का विकास है यह सोचना पड़ता तो डार्विन अपना सिद्धाँत अपने हाथों काट देते। स्वयं आज का विज्ञान जगत भी प्रकृति के इस रहस्य को सुलझा सकने में असहाय अनुभव कर रहा है। सन 1864 में कोपन हेगन की साइन्स एकेडमी ने घोषित किया कि जो वैज्ञानिक यह खोज कर लेगा कि हैगफिश की प्रजनन विधि क्या है उसे भारी पुरस्कार दिया जायेगा पर आज तक भी यह पुरस्कार कोई वैज्ञानिक प्राप्त नहीं कर सका।
जिस प्रकार ‘हैगफिश’ की प्रजनन विधि ज्ञात नहीं हो सकी उसी प्रकार वैज्ञानिक सर्वत्र पाये जाने वाले तिल चट्टे (काक्रोच) की आयु निर्धारित करने में असफल रहे हैं। अनुमान है कि करोड़ों वर्ष पूर्व पृथ्वी में देनोसारस श्रेणी के जीवों का आविर्भाव हुआ तब तिलचट्टा पृथ्वी में विद्यमान था। इसकी संभावित आयु 35 करोड़ वर्ष बताई जाती है, इतनी अवधि पार कर लेने पर भी कठोर से कठोर और भयंकर से भयंकर प्राकृतिक परिवर्तन झेल लेने पर भी इसकी शारीरिक रचना में न तो कोई अन्तर आया, न विकास हुआ तब फिर जीव-जगत को नियमित और प्राकृतिक परिवर्तनों के अनुरूप विकास की संज्ञा कैसे दी जा सकती है।
तेज से तेज गर्मी, वर्ष भर बर्फ जमी रहने वाले ग्लेशियर, पहाड़ और मैदान सब जगह वह तिलचट्टे पाये जाते हैं महीने भर तक भोजन पानी नहीं मिले तो भी उसका काम चल सकता है। दो महीने तक केवल पानी पर उपवास करके दिखा सकता है कि भोजन शरीर की आवश्यकता नहीं तो 5 महीने तक वह सूखा भोजन ही लेता रहकर यह सिद्ध कर देता है कि मनुष्य पानी के बिना भी शरीर धारण करने में समर्थ हो सकता है। यह सब चेतना के अन्तरिक्ष गुणों पर आधारित रहस्य है, जिन्हें केवल शारीरिक अध्ययन द्वारा नहीं जाना जा सकता। उसे समझने के लिए आत्म-चेतना के विज्ञान का एक नया अध्याय खोलना आवश्यक है। यह व्यवसाय जीव के शरीर धारण की प्रक्रिया से संबंधित और आध्यात्मिक तथ्यों व तत्व दर्शन का अध्याय होगा जिसके लिये पूर्वजों ने कठोर से कठोर तप किया था और उन सनातन सत्यों का प्रतिपादन किया था जो धार्मिक विरासत के रूप में अभी भी हमारे पास विद्यमान हैं।
तिलचट्टे की भूख भी भयंकर होती है, आहार प्रारंभ कर देता है तो अपने अण्डे बच्चे भी नहीं छोड़ता। मादा अपने बच्चों से बड़ा स्नेह रखती है प्रायः हर दो दिन में यह 1 अण्डा दे देती है। एक रूसी जीव-शास्त्री ने एक बार पौने पाँच लाख तिलचट्टों के ऐसे शव ढूंढ़ निकाले जो एक ही तिलचट्टे दम्पत्ति की संतान थे। नर काक्रोच बड़ा सफाई व सौंदर्य पसंद जीव है। वह घंटों अपने शरीर और मूँछों की सफाई में लगाता है और उन्हें सुन्दर ढंग से संवारता है। इसकी मूंछें लंबी होती हैं और एरियल का काम देती हैं। मूँछों की मदद से वह अंधेरे में भी अपना रास्ता आसानी से तय कर लेता है। विज्ञान के लिये यह खुली चुनौतियाँ हैं, आज जो खोजें मनुष्य ने कर ली हैं प्रकृति उनका ज्ञान आदि काल से अपने गर्भ में छिपाये हुये है। सृष्टि के यह विलक्षण जीव प्रकृति की चेतना के ही प्रमाण हैं। वह इस बात के साक्षी भी हैं, कि प्रकृति एक ‘परिणत वैज्ञानिक’ है, विज्ञान की पूर्ण शोध और जानकारी का लाभ किसी प्रकृतिस्थ को ही उपलब्ध हो सकता है।
तिलचट्टे की विलक्षणतायें और भी हैं। उसके बच्चे सप्ताहों भूखे रह सकते हैं। वह स्वयं बर्फ की चट्टान में दब जाता है बर्फ पिघलकर उधर निकलती है और यह इधर उठकर चल देता है इसका बाहरी आवरण इतना कठोर होता है कि पाँव से दब जाने पर भी यह मरता नहीं है। दौड़ने में यह किसी सुन्दर विमान से कम नहीं यह सब गुण हैं जिन्होंने वैज्ञानिकों का ध्यान इसकी शोध के लिये आकर्षित किया। पर बेचारे जीव शास्त्री उसकी इस शारीरिक विलक्षणता पर ही उलझे रहे मानसिक रहस्यमयता का एक भी पर्दा वे उघाड़ न सके।

