जर्रा-जर्रा बोल रहा है- ‘जियो और जीने दो’
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राइजोबियम जाति के जीवाणु बैक्टीरिया और दलहन जाति के पौधों ने परस्पर समझौता कर लिया है। दलहन पौधों की जड़ें इन जीवाणुओं को रहने के लिये स्थान और शरण देती हैं यह जीवाणु वायुमण्डल से नेत्रजन (नाइट्रोजन) खींचकर पौधों को देते हैं जिनसे पौधों को पोषण मिलता है। दोनों बढ़ते और विकसित होते रहते हैं। प्रकृति की इस परोपकारी वृत्ति को 1. ‘सिम्बायोसिस’ कहते हैं।
किसी गाँव में आग लग गई। सब लोग सकुशल निकल गये पर एक अंधा, एक लंगड़ा व्यक्ति दो ही रह गये। वे भाग नहीं सकते थे। अन्धा देख नहीं सकता था, लंगड़ा चल नहीं सकता था। दोनों ने ऊपर के सिद्धाँत को अपनाया। अंधे ने लंगड़े को कंधे पर बैठा लिया। लंगड़ा अंधे को रास्ता बताने लगा और परस्पर सहयोग के आधार पर वह दोनों भी सकुशल बाहर निकल आये। एक दूसरे के हित में परस्पर सहयोगी होने के इस सिद्धाँत को मनुष्य ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लागू कर लिया होता तो छोटी-छोटी क्षमताओं के लोग भी संतोष और सुविधा का जीवन जीते हुये अंधे और लंगड़े की तरह साँसारिक कठिनाइयों से पार हो जाते।
सेलूलाइटिक फफूँद की दो जातियों में एक जाति बलवान होती है दूसरी निर्बल। जो निर्बल होते हैं वह अपने आहार ‘सेलूलोज’ को तोड़-फोड़ नहीं सकते। अब शक्तिशाली फफूँद ‘सेलूलोज’ को तोड़ना प्रारंभ करते हैं और उसमें कार्बनिक-अम्ल पैदा कर देते हैं। यह कमजोर सेलूलाइटिक फफूँद के लिये आहार का काम देता है। यदि बलवान फफूँद इन निर्बलों को सहारा न देते तो उनकी एक जाति कभी भी नष्ट हो गई होती।
परिवार में बच्चे, बूढ़े, विधवायें और कई लोग बीमार तथा अपाहिज भी होते हैं, समाज में कई निर्धन, रोगी, अभावग्रस्त लोग होते हैं। उनके प्रति साधन सम्पन्न और शक्तिशाली लोगों का कर्त्तव्य भी ऐसा ही होता है यदि सम्पन्न और सशक्त लोग कमजोर और निर्बलों की असुविधायें और अभाव दूर करने में थोड़ी सी भी शक्ति खर्च कर सके होते तो आज समाज में कहीं भी विषमता न होती। प्रकृति का यह 2. ‘प्रोटो को आपरेशन’ सिद्धांत ही विश्व शाँति का आधार बन सकता है।
जीव जगत में 3. कमेन्सलिज्म का एक सिद्धाँत भी ‘जियो और जीने दो’ की समाजवादी व्यवस्था का आदर्श उदाहरण है। कुछ खास किस्म के सूक्ष्म जीवाणुओं में अपने विकास के साधनों का ज्ञान नहीं होता। उन्हें अपनी आजीविका और विकास के लिये साधनों की वैसे ही आवश्यकता पड़ती है जैसे समाज के अनेक पिछड़े, पद दलित, अपंग, आदिवासी, स्त्रियों व हरिजनों को शिक्षा, ज्ञान संवर्द्धन, स्वास्थ्य, उद्यम-उद्योग आदि के साधनों की आवश्यकता होती है। इस आवश्यकता को दूसरे महत्वपूर्ण जीवाणु ‘विटामिन’ और ‘एमीनो एसिड’ बनाकर पूरा कर देते हैं। शिक्षित, सम्पन्न और प्रतिभावान लोगों ने पिछड़े समाज को ऊपर उठाने के लिये इस सिद्धाँत के आधार पर अपने साधनों का एक अंश भी जुटा दिया होता तो आज संसार में कोई भी पिछड़ा और पद दलित नहीं होता। सब लोग सुखी होते। ‘एरोब्ज’ और ‘एनारोब्ज’ जीवाणु इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि मनुष्य को अपने ही नहीं दूसरों के विकास का भी सदैव ध्यान रखना चाहिये।

