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मनुष्य का जीवन क्षणिक है पर आत्म-सुधार उसे अनन्त तक फैला देता है।

-इमर्सन

दूसरों की अपेक्षा अपना सुधार अधिक सरल तथा अधिकार सम्मत होता है। दूसरे को तो हम सुधार के लिए समझा ही सकते हैं, प्रार्थना कर सकते हैं, अधिक से अधिक उपदेश दे सकते हैं। लेकिन अपने को हठपूर्वक भी सुधार सकते हैं। जहाँ दूसरों पर हमारा कोई वश नहीं होता, वे हमारी बात मानें ही, इसके लिये उन्हें विवश नहीं किया जा सकता। किन्तु अपने पर तो हमें पूरा अधिकार हो सकता है। अपना सुधार करने के लिए हम सब अपने घर सख्ती भी कर सकते हैं और जिधर चाहें, बलपूर्वक मोड़ सकते हैं। दूसरों के विषय में हमें न तो यह अधिकार होता है और न स्वतंत्रता। इसलिये संसार कल्याण का सबसे सरल तथा संभव तरीका यही है कि दूसरों से पहले हमें अपना स्वयं का सुधार प्रारंभ कर देना चाहिए।

अपना सुधार करने से तो केवल हमारा ही सुधार हो सकता है। इससे इतने बड़े संसार का सुधार किस प्रकार संभव हो सकता है? ऐसी निराशापूर्ण शंका करना विचार-संकीर्णता है। कोई भी आदर्श अथवा सिद्धाँत सार्वभौमिक होता है। जब हम सब अलग-अलग एक-एक करके सुधरने लगेंगे तो सारा संसार स्वतः ही एक साथ सुधरने लगेगा। संसार का सुधार का इतना बड़ा काम कुछ थोड़े से सुधारकों के लिए संभव नहीं है, बल्कि सबसे सरल तरीका यही है कि हम सुधारकों से प्रेरणा एवं प्रकाश लेकर अपना सुधार आप ही करें। इससे यह विशाल कार्य छोटे-छोटे भागों में वितरित होकर सरल हो जायेगा। थोड़ी-थोड़ी जिम्मेदारी सब पर चली जायेगी और एक तरह से सभी लोग संसार सुधार के काम में लग जायेंगे। विशाल कार्य विशाल जन-समूह द्वारा किये जाने पर जल्दी तथा पूर्ण रूप से सम्पादित हो जायेगा।

आत्म-शोधन में निरत होना, संसार शोधन में लगने का एक प्रकार है। एक व्यक्ति अपनी अच्छाई से केवल अपने आप ही लाभान्वित नहीं होता बल्कि अन्य लोगों की सुख-शाँति बढ़ाने में भी सहायक होता है। जिस प्रकार एक बुरा आदमी अपनी बुराई का प्रभाव दूसरों तक पहुँचाता है और इस प्रकार उनके दुःखों में वृद्धि करता है उसी प्रकार एक उपयुक्त आदमी भी अपनी अच्छाई का प्रभाव दूसरों पर डालता है और उसके व्यवहार से लाभान्वित ही नहीं प्रेरित भी होते हैं। उनके शोक-संतापों की संख्या घटती और सुख-शाँति की वृद्धि होती हैं। इसलिए विश्व कल्याण का सबसे सरल और सही तरीका आत्म-कल्याण ही मानना चाहिए।

आत्म-सुधार अथवा आत्म-कल्याण की भावना को किसी प्रकार भी स्वार्थ मानना भारी भूल होगी। अपने चरित्र को ऊपर उठाना अथवा आत्मा की उन्नति करना स्वार्थ नहीं माना जा सकता, वह विशुद्ध परमार्थ है और परमार्थ के कार्यों से न केवल अपना ही मंगल होता है बल्कि सारे संसार, सारे मनुष्यों और सारे जीव, प्राणी मात्र को मिलता है।

संसार का सुधार करने के लिए हमें जीवन में आध्यात्मिक दृष्टिकोण को विकसित और आध्यात्मिक गतिविधि को अपनाकर चलना चाहिए। प्रत्येक अच्छी बुरी परिस्थिति का उत्तरदायी हम स्वयं अपने को मानें। बाह्य प्रवृत्तियों का कारण अपने अन्दर खोजें और उनका निवारण करें। अपने गुण, कर्म, स्वभाव को उन्नत एवं उदात्त बनायें। तब न तो हमें संसार से शिकायत रहेगी और इस प्रकार सारा संसार ही सुधार की ओर चल पड़ेगा।

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