प्रामाणिकता की प्रभावोत्पादक शक्ति
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प्रामाणिक व्यक्ति किसे कहना चाहिए। इसकी व्याख्या करते हुए दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने कहा है जो अपनी असफलताओं का दोषारोपण दूसरों पर नहीं करता। बचकाने लोग अपनी असफलताओं के लिए व्यक्तियों, पदार्थों और परिस्थितियों को दोषी ठहराते रहते हैं, इससे एक बड़ी हानि यह होती है कि आत्म समीक्षा का अवसर चला जाता है और वे त्रुटियाँ समझ में नहीं आती, जिनके कारण आवश्यक प्रतिभा न जुटाई जा सकी और आगे बढ़ने के अवसर हाथ से निकल गये।
जो लोग असफल रहे है वे एक प्रकार से बालक हैं। हर असफलता के बाद अधिक गहराई से उत्पन्न कठिनाइयों पर विचार करना और उनके निराकरण का उपाय खोजा जाना चाहिए। बाल बुद्धि के लोग साहस और पुरुषार्थ की दृष्टि से पिछड़े होते हैं और तनिक सा अवरोध आने पर निराशाग्रस्त होकर अपने प्रयास बन्द कर देते हैं। योग्यता जुटाने में उत्साह नहीं दिखाते और हर असफलता के बाद दूने उत्साह से पुरुषार्थ करने की आवश्यकता अनुभव नहीं करते। यही होता है कि उनकी असफलता का मूल कारण। ऐसे व्यक्ति निश्चित रूप से चेतना की दृष्टि से अपरिपक्व होंगे। बालकों पर कटाक्ष करने से क्या लाभ? उन्हें यथार्थता समझाई जानी चाहिए। यदि इतना भी न बन पड़े तो कम से कम स्वयं के लिए शिक्षा तो ग्रहण करनी ही चाहिए कि जिन कारणों से दूसरे असफल हुए हैं उन्हें हम तो न अपनायें।
प्रामाणिक व्यक्ति की एक विशेषता है स्वतन्त्र चिन्तन। लोग क्या सोचते हैं, क्या कहते हैं ? इस बात की ओर उसका ध्यान नहीं होता, वह सदा तथ्यों को ढूंढ़ता है और उचित को अपनाता है; भले ही इस दृष्टि से वह अकेला पड़ता हो और दूसरे उसका उपहास करते हों। स्पष्ट है कि यथार्थता को समझने की और उचित को अपनाने की शक्ति किन्हीं विरले लोगों में ही होती है। ऐसी दशा में उच्चस्तरीय रीति-नीति अपनाने वालों को दूसरों का समर्थन कदाचित ही मिल पाता है, उसे अपनी लम्बी मंजिल अकेले चलकर ही पर करनी पड़ती है।
विरोधियों से झगड़ने और दुर्घटनाओं की स्मृति में उलझने का जिसे अवकाश नहीं, जो निरन्तर सृजन की ही बात सोचता है- वह प्रामाणिक है। अशुभ चिन्तन से क्षोभ बढ़ता है और उपयोगी शक्तियाँ उसी जंजाल में उलझ कर नष्ट हो जाती हैं। यदि चिन्तन के इस अपव्यय से बचा जा सके तो उस बचत से बहुत कुछ किया जा सकता है। झगड़ना आसान है पर सृजन के लिए प्रतिभा और परिपक्वता चाहिए। अच्छा यही है कि अपना ध्यान प्रौढ़ता के संग्रह में एकाग्र रखा जाय। प्रामाणिक व्यक्ति यही करते हैं।
प्रामाणिक व्यक्ति किसी से काम निकालने की फिराक में नहीं रहते वरन् उसे प्रखर व्यक्तित्व को सींचे जाने के विश्व नियम के अनुरूप उदार सहयोग देने के लिए बाध्य करते हैं। इस आधार पर अधिक समर्थ लोगों की प्रचुर सहायता अनायास ही आकर्षित की जा सकती है।
सन्त कन्फ्यूशियस के अनुसार प्रामाणिकता मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। वह उत्तरदायित्व निबाहने, मर्यादाओं का पालन करने और कर्तव्य पालन में सतत् जागरुक रहने वालों को मिलती है। जिसने इसे पा लिया उसके लिए अभीष्ट मार्ग पर द्रुत गति से बढ़ चलना नितान्त सरल होता है। मनुष्य में रूप, चातुर्य, बुद्धि वैभव, कलाकारिता आदि कितनी ही ऐसी विशेषताएं हो सकती हैं जो दूसरों को प्रभावित करें, पर सबसे अधिक प्रभावोत्पादक आकर्षण- प्रामाणिकता जिन्होंने उसका उपार्जन किया है वे हर क्षेत्र में ऊपर उठे और चमकते हुए दिखाई पड़ेंगे।

