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Magazine - Year 1975 - Version 2

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हम न जाने सो रहे हैं या जग रहे हैं ?

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“निद्राचार” रोग से ग्रसित मनुष्य उठकर चल देता है और सामान्य मनुष्यों की तरह कुछ काम करता रहता है और फिर आकर अपनी जगह सो जाता है। जागने पर उसे यह स्मरण नहीं रहता कि वह बीच में कहीं उठकर गया था और कुछ करके फिर अपनी जगह पर वापिस आ गया था।

हमारे जीवन के क्रम लगभग इसी अर्ध तन्द्रित अवस्था में होते रहते हैं। कोई स्वप्न आवेश में कुछ करता रहता है और हम किसी अवचेतन चेतना से बँधे हुए कुछ करते रहते हैं। क्यों करते हैं ? किस प्रयोजन के लिए करते हैं ? यह सोचने की न तो आवश्यकता पड़ती है और न फुरसत रहती है। सम्मोहित व्यक्ति किसी प्रयोक्ता के इशारे पर अपनी इच्छा शक्ति एवं स्वतन्त्र चेतना को पूरी तरह गँवा कर ऐसी क्रियाएँ करता है, जिनसे उसका कोई प्रयोजन या हित-साधन नहीं होता।

दार्शनिक आस्पेंस्की ने जन-साधारण की मनःस्थिति को ‘स्वविस्मृति’ की अर्धतन्द्रा के समतुल्य बताया है। तारे दिन में भी बने रहते हैं, पर वे धूप की तेजी के कारण हमारी आँखों को दीखते नहीं। यह स्वविस्मृति भी बनी रहती है जब हम अपने को जागता हुआ समझते हैं। किसी गहरे कुएँ में घुसकर यदि आकाश को देखें तो वहाँ से तारे उगे हुए दिखाई पड़ेंगे क्योंकि धूप की रोशनी वहाँ पर हमारी आँखों को चौंधिया न रही होगी। यदि अपना अभ्यस्त स्वविस्मृति से कुछ हटकर वस्तुस्थिति से समझने की कोशिश करें तो प्रतीत होगा कि जो कुछ चल रहा है वह विशुद्ध उस सपने की स्थिति है जिसे जागृत स्वप्न कहा जा सकता है।

कैनेथ वाकर की उस उक्ति में बहुत सार है जिसमें मनुष्य को सामान्य स्थिति को सम्मोहित व्यक्ति जैसी बताते हुए कहा था कि-”उसे यह विदित नहीं कि वह क्या और क्यों यह सब कुछ करता है ? कौन उसे किस निमित्त प्रयुक्त कर रहा हैं ? निश्चय ही यदि वह अपने को जान-समझ सका हाता और अपनी गतिविधियाँ स्वयं निर्धारित करता तो वे उससे सर्वथा भिन्न होती जो आज दृष्टिगोचर हो रही हैं।

एक व्यक्ति बातें करने में हाथ से उँगलियाँ मरोड़ता और चटकाता जाता है, जमीन कुरेदता जाता है। यह सब क्यों और क्या कर रहा है ? यह पूछने पर वह यही कह सकता है, ऐसा वह ‘होश’ में नहीं कर रहा था। वैसा कुछ अपने आप ही हो रहा था।

दार्शनिक एवकिसंन ने लोगों से पूछा है-बताओ तो, हम जीवन भर लम्बी यात्रा पर चलते रहते हैं, पर अन्त तक तनिक भी आगे नहीं बढ़ पाते, जहाँ के तहाँ बने रहते हैं। क्या ऐसा सपने की स्थिति के अतिरिक्त और किसी प्रकार हो सकता है ?

कोल्हू का बैल भी अपने लिए न सही तेली के लिए कुछ उपार्जन कर देता है, पर हम तो किसी के लिए कुछ भी उपार्जन नहीं कर पाते यह निष्फल दौड़−धूप सपने से बढ़कर नहीं हो सकती।

निद्राचार एक प्रकार का अपस्मार है। हिस्टीरिया के रोगी को शारीरिक क्रियाएँ चलती रहती हैं, पर मन संज्ञा शून्य हो जाता है। मृगी के कुछ रोगी तो बेहोश होकर गिर पड़ते हैं, दाँत मिच जाते हैं ओर मुँह से झाग निकलने लगता है किन्तु कुछ ऐसे ही होते हैं जो दौरा पड़ने से पहले जो काम कर रहे थे उसे ही तब तक करते रहते हैं जब तक कि पूर्ववत् होश में नहीं आ जाते। ऐसे रोगी यदि दौरा पड़ने से पूर्व चल रहे थे तो जिस दिशा में-जिस गति से वे चल रहे थे तो जिस दिशा में-जिस गति से वे चल रहे थे ठीक उसी तरह चाबी वाले खिलौने की तरह चलते चले जायेंगे। हाथ से यदि पेन्सिल छील रहे थे तो दौरा समाप्त होने तक पेन्सिल का वही हिस्सा छीलते रहेंगे जिसे पहले छील रहे थे। यह भी अपस्मार का एक प्रकार है। इसमें मनुष्य स्वयं तो संज्ञाशून्य रहता है, पर शरीर की अमुक गतिविधियाँ यथाक्रम चलते रहने से देखने वालों को साधारण स्थिति में काम करते हुए ही प्रतीत होते हैं।

इसी स्थिति का बढ़ा हुआ रूप ‘निद्राचार’ है। सोते-सोते चारपाई से उठकर चल देना और किसी अभ्यस्त क्रम से अभ्यास दिशा में पैरों का उठते जाना, इस क्रम का दौरे के अन्त तक चलते रहना, होश में आने पर अपने को विचित्र स्थिति में पाना, वापिस लौटना और फिर बिस्तर पर सो जाना यह बीमारी या आदत कई व्यक्तियों को देखी जाती है। बचपन में यह शिकायत अधिक होती है। उम्र बढ़ने पर मस्तिष्क का सचेतन भाग प्रखर होता जाता है और अचेतन को ऐसी गड़बड़ियाँ पैदा करने से रोक देता है। इसलिए बचपन में जिन्हें इस तरह की व्यथा होती है उनमें से अधिकाँश की बड़े होने पर छूट जाती है। फिर भी बहुत से व्यक्ति ऐसे होते हैं जिन्हें सदा बनी रहती है। कइयों को यह रोग बचपन में नहीं युवा अथवा अधेड़ अवस्था में उत्पन्न होता है और बहुधा आजीवन बना रहता है।

कई बार तो इस रोग की बड़ी विचित्र स्थिति देखी जाती हैं जो देखने में ही नहीं कहने-सुनने में भी बड़ी अजीब लगती है। रोगी कोई काम भले चंगों की तरह करता है, उसमें पूरी समझदारी बरतता है, सवाल जवाब करता है, गतिविधियों में हेर-फेर करना होता है तो बिलकुल भले चंगों जैसी समझदारी का परिचय देता है। किसी को सन्देह भी नहीं होता कि यह सब वह अपने सचेतन की मूलसत्ता को प्रसुप्त स्थिति में छोड़कर उसके कामचलाऊ उधार अंश के सहारे यह सारी हरकतें कर रहा है। इस सबके साथ एक विलक्षणता और भी जुड़ी होती है कि जब दौरा समाप्त होने को होता है तो अचेतन उसे चुपचाप वापिस लौटा लाता है और जिस स्थिति में दौरा आरम्भ हुआ था ठीक उसी में ले जाकर छोड़ देता है। फलस्वरूप रोगी को उस पूरे घटना-क्रम का तनिक भी स्मरण नहीं रहता जो उसने घण्टों तक पूरे समझदार आदमी की तरह चलाया था।

फ्राँस के मनोरोग चिकित्सक डा0 जैने ने अपने इलाज में आये हुए निद्राचार के अनेक रोगियों का विस्तृत विवरण छपाया है। इनमें एक बीस साल की युवती आइरीन का विवरण है। जिसे यह रोग अपनी माता की डरावनी मौत के साथ आरम्भ हुआ और मुद्दतों चलता रहा। यह निद्राचार ग्रस्त स्थिति में घंटों बनी रहती और अपनी माता की मृत्यु का घटना-क्रम यथावत् एक नाटक के ढंग से दुहराती रहती। यथा-स्थिति आने पर उसे उसे अभिनय के बारे में तनिक भी स्मरण नहीं रहता था।

डा0 जैने ने निद्राचार का एक और भेद बताया है-’फ्यूग’। इस स्थिति में कुछ समय तक मनुष्य अपनी मूल स्थिति को भूलकर किसी विशिष्ट स्थिति में कल्पित कर लेता है और अपने को सचमुच ही उस स्थिति में मान लेता है। यह मान्यता दूसरे की दृष्टि में कल्पना हो सकती है, पर वह स्वयं उस दौरे की अवधि में सचमुच उस स्थिति में पहुँचा हुआ मानता है। ऐसे व्यक्ति कोई कहानी गड़ लेते हैं और उसके साथ अपना सम्बन्ध जोड़कर इस तरह वर्णन करते हैं मानो वह सब कुछ निश्चित रूप से उनके साथ घटित हुआ हो और बिना किसी छल वृक्ष के वे किसी यथार्थता का विवरण सुना रहे हों।

ऐसे दौरे थोड़े समय के हों तो अपनी अनुभूति को भूल भी सकते हैं। कई बार उस समय की स्मृति किसी दिव्य-दर्शन की तरह चिरकाल तक स्मरण भी बनी रहती है। देवी-देवताओं के दर्शन की स्मृतियाँ प्रायः इसी प्रकार की भ्रमित मन-स्थिति में होती हैं। भूत-प्रेतों का साक्षात्कार भी बहुधा इसी प्रकार का होता है। किसी को अवसर सर्प आदि दिखाई पड़ते हैं जबकि वस्तुतः वहाँ भूत, सर्प आदि का कोई अस्तित्व नहीं होता।

अकेले पैरिस नगर में प्रायः 18000 लोग इसी तरह खो जाते हैं। यह खोने वाले न तो बच्चे होते हैं और न विक्षिप्त। अच्छे-खासे पढ़े-लिखे और काम-धन्धे में लगे हुए लोग यह तरीका अपनाते हैं। इनमें से कुछ ही ऐसे होते हैं जो विस्मृति विक्षिप्तता सरीखे किसी मानसिक रोग से ग्रसित होकर ऐसा करते हैं। पुलिस को इन खोये लोगों का पता लगाने के लिए एक विशेष विभाग खोलना पड़ा है जिसके प्रयास से प्रायः 30-35 प्रतिशत तक यह ‘गुमशुदा’ लोग पकड़ लिये जाते हैं और उनकी पुरानी जगह पहुँचा दिया जाता है।

सम्भवतः हमें भी अपने को भुला देने में ही शराबियों की तरह गम गलत करने में कुछ राहत मिलती हो। उनका अचेतन उन्हें विस्मृति के गर्त में धकेल कर विवेक अपनाने पर कन्धे पर चढ़ने वाले उत्तरदायित्वों से छुटकारा दिला देता हो।

निद्राचार से ग्रसित एक डाक्टर का विवरण अतीव विचित्र और भयंकर हैं उसका आत्मबोध पूरी तरह सोया रहता था। अचेतन में दबी प्रवृत्ति अत्यन्त तीव्र हो उठती थी और वह सचेतन के एक भाग पर कब्जा करके उसके शरीर और मस्तिष्क से मनचाहा काम कराती थी। यह स्थिति जब तक अचेतन चाहता, बनाये रहता और जब उसकी तृप्ति हो जाती तो शरीर को लाकर उसी चारपाई पर पटक देता जहाँ से उसे उठाया था। नींद से उठने के बाद उस डाक्टर को उस सारे घटना-क्रम की स्वप्न जैसी धुँधली स्मृति भी नहीं रहती थी। इतना गहरा विस्मरण भी अचेतन का ही अभिशाप था।

सन् 1888 की बात है उन दिनों सारे लन्दन में आतंक छाया हुआ था। एक हत्यारा पुलिस थानों के इर्द-गिर्द ही नृशंस हत्याएँ करने में संलग्न था। अस्पतालों में गुर्दे की जिस तरह चीर-फाड़ की जाती है, लगभग उसी तरह वह हत्यारा अपने शिकार का कतर-व्यौंत करके रख देता था। यह हत्याएँ धन के लालच से नहीं की जाती थी क्योंकि सारे गये लोगों के शवों के साथ उनकी कीमती वस्तुएं तथा नकदी यथावत् मिलती थी। हत्याओं की संख्या दर्जनों को पार करके सैकड़ों के अंग छूने लगी थी।

इस संदर्भ में पुलिस को लज्जित होना पड़ रहा था कि वह इन नृशंस अपराधों को रोकने और अपराधियों को खोजने में असफल रहते हैं। यद्यपि पुलिस के जासूसी विभाग ने जी तोड़ कोशिश की थी और सन्देह में कितनों को ही पकड़ा भी था, पर वास्तविक हत्यारे का कुछ सुराग मिल ही नहीं रहा था। हत्यारे का अखबारों न ‘जैक दि रिपर’ के कल्पित नाम से उल्लेख करना आरम्भ कर दिया था।

हत्यारे का पता लगाने में एक साधारण व्यक्ति की अतीन्द्रिय शक्ति ने जो भूमिका निबाही उससे वह प्रसंग और भी अद्भुत बन गया था। इंग्लैण्ड के एक सामान्य नागरिक राबर्ट जेम्स लीज ने ऐसे ही पड़े-पड़े सपना देखा कि-” एक तगड़ा व्यक्ति एक युवती का पीछा करते हुए गली में मुड़ा और जैसी ही एकान्त स्थान आया उस व्यक्ति ने चीते की तरह चाकू से युवती पर आक्रमण किया, गला काटा, पेट चीरा और खून से सने हाथ लाश से पोंछकर चलता बना।” इस सपने से लीज डर गया और उसकी रिपोर्ट लिखाने पुलिस दफ्तर पहुँचा। उसकी रिपोर्ट तो लिखली गई, पर उसे ‘सनकी’ कहकर भगा दिया गया।

एक दिन लीज अपनी पत्नी के साथ ट्राम में कहीं जा रहा था। उसने सपने वाले आदमी को पास ही बैठा देखा। उसके मन ने कहा यहीं वह प्रख्यात हत्यारा है जिसका आतंक मचा हुआ है; उसी को उसने उस दिन स्वप्न में देखा था। लीज अपनी पत्नी को घर जाने के लिए कहकर उस व्यक्ति के पीछे ही लिया, रास्ते में ड्यूटी पर खड़े पुलिस सिपाही से उसने अपने सपने के आधार पर पहचाने हत्यारे को पकड़ने के लिए कहा-पर उसने भी उसे सनक ही समझा और टाल दिया।

अबकी बार लीज अपना ऐसा सपना सुनाने फिर पुलिस दफ्तर पहुँचा और बताया कि हत्यारा लाश के कान काटकर ले जा रहा था। कान काटने की बात ने पुलिस अफसर को चौंका दिया क्योंकि हत्यारे ने पार्सल से उसी दिन कटे हुए कान भेजे थे और चुनौती दी थी कि-”यह पत्र उसी का लिखा है- उसे पकड़ कर कोई दिखायें।” लीज की बात में सार मालूम हुआ और पुलिस ने उसकी सहायता स्वीकार कर ली।

एक दिन लीज पुलिस को साथ लेकर ढूँढ़ता-ढूँढ़ता एक शानदार कोठी के सामने जा खड़ा हुआ और बोला हत्यारा इसी के अन्दर है। वह कोठी एक सुप्रसिद्ध डाक्टर की थी। पुलिस को संकोच था कि ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्ति के यहाँ वह किस प्रकार प्रवेश करें। तो भी वे लोग भीतर गये ही। डाक्टर से पूछताछ की तो उसने हत्याओं के सम्बन्ध में अपने को सर्वथा अनजान बताया। उनकी स्त्री ने गहरी पूछताछ में इतना भर स्वीकार किया कि वे कभी-कभी अपने को सर्वथा भूल जाते हैं और उठकर कहीं चले जाते हैं। लौटते हैं तो कहते हैं न जाने मैं कहाँ भटक जाता हूँ और क्यों कहीं घूमघाम कर वापिस आता हूँ।

तलाशी ली गई तो खून से सने ढेरों कपड़े उनके यहाँ पाये गये, जिन्हें हत्याओं में लिए गये खून के नमूनों से विशेषज्ञों ने बिलकुल मिलते हुए रक्त से सने बताया। मुकदमा चला। अनेकों प्रमाणों से डाक्टर ही अपराधी सिद्ध हुआ।

आखिर डाक्टर ऐसा क्यों करता था ? इसकी गहरी खोज-बीन से पता चला कि उसे मस्तिष्कीय कोई ऐसी बीमारी थी जिसके कारण वह आपे से बाहर होकर किसी विशेष मदहोशी में चला जाता था और धर से बाहर जाकर यह कुकृत्य बड़ी कुशलता पूर्वक करता था। घर लौट आने पर उसे इतनी ही याद रहती थी कि उसने कुछ ऐसा किया है जो बुरा है। घर से निकलने से लेकर वापिस आकर खून से सने कपड़े यथा स्थान रखने तक उसकी ऐसी ही स्थिति बनी रहती थी। यहाँ तक कि एक बड़ा ऊनी ओवरकोट इसी काम के लिए ले जाता था कि हत्या से पहले उसे उतार कर दूर रखदे और खून के दाग वाले कपड़ों के ऊपर उसे पहनकर बिना किसी को सन्देह उत्पन्न किये घर वापिस आ सके।

मुकदमे के अन्त में जब डाक्टर ने जाना कि सचमुच उसने ही इतनी हत्याएँ की हैं तो वह रो पड़ा। उसने अदालत से आग्रहपूर्वक कहा-”मुझे जल्दी ही मौत की सजा दीजिए। मैं ऐसा नर-पिशाच रहा हूँ यह जानने के बाद अब मेरे लिए इस दुनिया में जी सकना कठिन है।”

डाक्टर को विशेषज्ञों ने एक खास किस्म का पागल माना और उसे पागलखाने में बन्द रहने की सजा दी गई।

लगता है हम सब ऐसे ही निद्राचार रोग से ग्रसित हैं। हम क्या हैं ? जीवन क्या है ? जीवन का प्रयोजन क्या है ? जो कुछ हम कर रहे हैं क्या वह करणीय हैं ? जिस कोल्हू में हम जुत रहे हैं, उससे क्या पल्ले पड़ने वाला है ? मृत्यु कितनी निकट और विकट है। उसकी तैयारी के लिए क्या कुछ हो रहा है ? ईश्वर के दरबार में उपस्थित होने पर जिन कर्त्तव्यों का लेखा-जोखा माँगा जाता है, उनका विवरण क्या है ? मृग-तृष्णा में अब तक भटकने पर क्या मिला और उसी की पुनरावृत्ति आजीवन करते रहने पर आगे क्या मिलना है ? दुनिया वाले जिस प्रवाह में बहकर खो ही खो रहे हैं, उसी में बहते हुए हम क्या पाने की आशा करें ? आदि मुख्य प्रश्न अनसुलझे पड़े हैं। सच तो यह है कि हमें आत्म-विस्मृति ने बुरी तरह जकड़ लिया है और निद्राचारग्रस्त व्यक्ति मानसिक रोगी की तरह पशु-प्रवृत्ति के वशीभूत होकर नर-कीटकों जैसा निकृष्ट जीवन जीने की इस मनुष्य जन्म में भी पुनरावृत्ति मात्र कर रहे हैं।

च्वाँगत्सु ने एकबार सपना देखा कि वह तितली बन गया है और स्वच्छन्दतापूर्वक सुरम्य फूलों पर उड़ता, बैठता फिर रहा हैं। सवेरे उठा तो हम सपने का उस पर गहरा असर था। दिन में कल वह आदमी था तो रात में तितली कैसे बन गया है। यदि सपने में आदमी तितली बन सकता है तो यह भी असम्भव नहीं कि तितली आदमी होने का सपना देख रही हो। च्वाँगत्सु अपनी सारी अक्ल खर्च करके बहुत समय तक इस गुत्थी को सुलझाने में लगा रहा कि कहीं वह कोई तितली ही तो नहीं है जो कहीं सोई पड़ी हो और वह आदमी का वैसा सपना देख रही हो जैसा कि वह इन क्षणों जीवनयापन कर रहा हैं।

हम जी रहे हैं या सपना देख रहे हैं, इसे खोजने पर ऐसा सन्देह होता है हम कहीं निद्राचारग्रस्त रोगी की स्थिति में ही तो नहीं रह रहे हैं।

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