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Magazine - Year 1975 - Version 2

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हमारा ज्ञान बढ़ा है और साथ में संसार भी

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यह संसार विकसित हो रहा है; क्योंकि हम विकास की ओर अग्रसर हो रहे हैं। अति प्राचीनकाल में यह धरती एक फर्श की तरह थी, उस पर नीले आसमान की चाँदनी टंगी थी, जिसमें छोटे-छोटे सितारों के जुगनू चमकते थे और सूर्य चन्द्रमा के रूप में दो झाड़ फानूस टंगे थे। समुद्र एक छोटे तालाब कि तरह था पर अब बात बहुत आगे बढ़ गयी है। अब हमारी पृथ्वी विशालकाय ब्रह्माण्ड की एक राई-रत्ती जितनी छोटी सदस्या है। उसके जैसे असंख्य पिण्ड इस अनन्त आकाश में छितरे पड़े है। समूचे ब्रह्माण्ड का विस्तार मनुष्य की कल्पना शक्ति के बाहर है। अपनी धरती पर भी जितना दृश्य पदार्थ है उसे असंख्य गुना विस्तृत और शक्तिशाली वह है जो विद्यमान रहते हुए भी अदृश्य है। प्राचीन और अर्वाचीन कल्पनाओं में कितना विचित्र अन्तर है अपने इसी विश्व ब्रह्माण्ड के बारे में। हम बढ़े हैं- हमारे ज्ञान एवं साधन क्षेत्र का विस्तार हुआ है। तद्नुसार यह विश्व भी अधिकाधिक विस्तृत होता चला गया है। भविष्य में जिस गति से हम बढ़ेंगे हमारा विश्व भी उसी अनुपात से अधिक विकसित होता चला जायगा।

यूनान के लोग मानते थे कि पृथ्वी हरक्यूलस देवता के खम्भे पर टंगी है। हम लोग शेषनाग के फन पर, गाय के सींग पर एवं कछुए की पीठ पर उसे टिकी मानते थे। सूर्य देवता के रथ में सात घोड़े जुते होने और अरुण सारथी द्वारा हाँके जाने की मान्यता को अब सूर्य किरणों के सात रंग और अरुण को प्रभात कालीन रक्ताभ आलोक कहकर सामयिक साधन करना पड़ा।

किसी समय चटाई की तरह चपटी बिछी रहने वाली पृथ्वी को हिरण्याक्ष कागज की तरह लपेट कर भाग गया था और समुद्र में जा छिपा था तथा विष्णु भगवान ने बाराह बनकर उससे छीनकर छुड़ाया था। आज वे बाते बाल कल्पना हैं। पृथ्वी के लपेटे जाने की बात उसी पर भरे हुए समुद्र में छिपा लेने की बात अब समझ की परिधि से बाहर है पर किसी समय यही मान्यता शिरोधार्य थी। विद्वान आर्य भट्ट ने पांचवीं शताब्दी में पहली बार उसे गोल गेंद की तरह बताया। पीछे बारहवीं शताब्दी में भास्कराचार्य ने उसमें आकर्षण शक्ति होने की बात भी जोड़ दी। प्राचीन ज्योतिष विज्ञान धरती को स्थिर और सूर्य को चल मानता था, सहज बुद्धि वही बता सकती थी। पर पीछे पृथ्वी को भी भ्रमणशील बताया गया, तो बताने वालों को उपहासास्पद ही नहीं माना गया वरन् उन्हें नास्तिकता के अपराध में शूली पर भी चढ़ा दिया गया।

अब हम अनन्त विश्व के एक नगण्य से घटक बन कर रह रहे हैं। अपने विश्व की असंख्य निहारिकाएं है। वे इतनी बड़ी हैं कि उनके एक कोने में करोड़ों सूर्य पड़े रह सकें। वे हमसे इतनी दूर है कि उनका प्रकाश पृथ्वी तक आने में लाखों प्रकाश वर्ष लग जाते हैं जबकि प्रकाश एक सेकिण्ड में एक लाख छियासी हजार मील की चाल से चलता है। आसमान में जो तारे दिखाई पड़ते हैं उनमें से कई तो अपने सूर्य से भी हजारों गुने बड़े महासूर्य हैं। उनके अपने-अपने सौरमण्डल तथा ग्रह-उपग्रह हैं जो अपनी आँखों को दिखाई नहीं पड़ते। वे आपस में नजदीक दीखते भर हैं वस्तुतः उनके बीच का फासला अरबों खरबों मील है। वे सभी एक दूसरे के साथ पारस्परिक आकर्षण शक्ति के रस्सों से बंधे हैं। आकाश के नीचे गिरने या ऊंचे उछलने जैसी कोई शक्ति नहीं है। उस पोल में हर वस्तु अधर में सहज ही लटकी रह सकती है। हलचल तो ग्रह नक्षत्रों की अपनी आकर्षण शक्ति के कारण उत्पन्न होती है। उसी के प्रभाव से वे अपनी धुरी पर तथा कक्षा में घूमते हैं। यह बातें सुनने में बड़ी विचित्र लगती हैं, पर हैं सत्य। अब से कुछ सौ वर्षों तक इन बातों पर कोई विश्वास नहीं कर सकता था, पर अब हम बढ़े हैं और हमारा विश्व बढ़ा है। अस्तु इन मान्यताओं को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं होती।

अपने सौरमण्डल का केन्द्र सूर्य है। उसका व्यास पृथ्वी से 109 गुना वजन तीन लाख तीस हजार गुना और घनफल तेरह लाख गुना बड़ा है। उसके एक वर्ग इंच स्थान में तीन लाख मोमबत्तियों से मिलकर होने जितना प्रकाश है, गर्मी छह हजार डिग्री जिसकी तुलना में अपनी धरती की आग की बरफ जैसी ठंडी माना जा सकता है। इतनी अधिक गर्मी के कारण सूर्य का सारा पदार्थ पिघला हुआ है। उसमें सदा भयंकर तूफान उठते रहते हैं। जिनके कारण कभी-कभी इतने बड़े खड्ड हो जाते हैं जिनमें अपनी कई धरती समा सके। यही खड्ड सूर्य में काले धब्बे दिखाई पड़ते हैं।

पिछले जमाने में सूर्य को ठण्डा माना गया था उसे आतप कहा गया था। आतप वह जो स्वयं तो ठंडा हो, पर दूसरों को प्रकाश दे। यह मान्यता इसलिए थी कि हम जितने भी ऊंचे बढ़ते थे ठंडक बढ़ती है। पहाड़ों पर बर्फ जमी रहती है। जितनी ऊंचाई उतनी ठंडक- इस सिद्धांत ने सूर्य को ठंडा होने की कल्पना दी थी। पर आब उस बात पर कोई विश्वास नहीं करता । ताप के संचालन, संवाहक एवं विकरण गुणों के बारे में पदार्थ विज्ञान के प्रारम्भिक छात्र भी बहुत कुछ जानते हैं। संचालन वह प्रक्रिया है जिसके अनुसार किसी ठोस पदार्थ का एक हिस्सा गर्म करने पर दूसरा भी गर्म हो जाता है। जैसे लोहे की छड़ का एक सिरा तपाने से पूरी छड़ गरम हो जाती है। संवाहन वह है जिसके अनुसार गर्म हुआ पदार्थ स्वयं ही भागने लगता है जैसे भाप। तीसरी क्रिया विकरण वह है जिस पारदर्शी पोल को चुपचाप पार करती हुई गर्मी अन्त में जहाँ टकराती है उसी जगह को गर्म करती है। सूर्य की गर्मी 9 करोड़ मील की पोली हवा रहित जगह को पार करती हुई चुपचाप चली आती है, पर जब पृथ्वी से वे किरणें टकराती है तो भूतल गर्म हो उठता है। धरती को छूकर जो ताप उत्पन्न होता है वह ऊंचाई की दिशा में धीरे-धीरे कम होता जाता है। और ऊंचे पहाड़ों का चोटियों पर बर्फ जमने लगती है। भूतकाल में यह जानकारियाँ उपलब्ध न रहने से सूर्य को आतप अर्थात् दूसरों को गर्मी देने वाला कहकर सन्तोष करना पड़ा होगा।

सौर परिवार का सबसे निकटस्थ ग्रह बुद्ध है। इसके बाद शुक्र, इसके बाद हमारी पृथ्वी। फिर मंगल। इसके बाद क्षुद्र ग्रहों की एक पूरी पट्टी है जिसमें हजारों अवान्तर पिण्ड चक्कर काट रहें हैं। इनमें बड़े से बड़ा 480 मील का और छोटे से छोटा 550 गज का नापा गया है। इससे छोटे भी कुछ हो सकते हैं जो अभी देखे नहीं जा सके । इसके बाद पृथ्वी, फिर शनि। प्राचीन काल में यही अन्तिम ग्रह था। सूर्य से बहुत दूर जाने के कारण उसकी प्रदक्षिणा बहुत देर में अर्थात् साड़े उनतीस वर्ष में पूरी हो पाती है। उसकी चाल पृथ्वी से अधिक है तो भी दूरी के कारण देरी तो हो ही जाती है। इस देरी की चाल को कभी समझा गया और उसे शनैः चर एवं मन्द कहा गया। इन शब्दों का अर्थ होता है धीमे चलने वाला।

पीछे सौरमण्डल के तीन सदस्य और भी ग्रह खोज लिए गये -(1) यूरेनस-वारुणी जो पृथ्वी से वजन में पन्द्रह गुना-घनफल में चौसठ गुना बड़ा है। यह सूर्य की परिक्रमा 84 वर्ष में पूरी करता है। (2) नेपच्यून -वरुण-यह पृथ्वी से 17 गुना भारी है। यह 165 वर्ष में परिक्रमा करता है। (3) प्लेटो-यम- यह सूर्य की परिक्रमा 300 वर्षों में पूरी करता है। अपने ही सौर मण्डल में तीन सदस्य अब और बढ़ गये हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि पहले थे ही नहीं। हम बढ़े हैं-हमारा ज्ञान साधन बढ़ा है -तो फिर हर क्षेत्र में नये आधार मिलेंगे ही। उदाहरण के लिए अपने सौर परिवार में तीन और बड़े-बड़े सदस्य मिले।

चन्द्रमा किसी जमाने में पूर्ण ग्रह था। उसे तारापति माना जाता था। सौरमण्डल के सदस्यों का ही नहीं आकाश में चमकने वाले समस्त तारकों का वह अधिनायक था। अब नये तथ्य सामने आये हैं चन्द्रमा पूर्ण ग्रह नहीं, पर सूर्य की नहीं पृथ्वी की परिक्रमा करता है, इसलिए उसी का उपग्रह है। बहुत समीप मात्र ढाई लाख मील दूर होने के कारण ही वह बड़ा लगता है। सूर्य की तुलना में तो वह उसका करोड़वाँ हिस्सा भी नहीं है। आकार में पृथ्वी का 49 वाँ वजन में 81 वाँ भाग है। उसका व्यास मात्र 2160 मील जितना उपहासास्पद है। वह पृथ्वी की परिक्रमा भर करता है, अपनी धुरी पर नहीं घूमता इसलिए हमें सदा उसका लगभग आधा भाग ही दीखता है। उसकी जमीन बहुत ऊंची-नीची है, सबसे ऊंची चोटी 27 हजार फुट और तीन हजार ज्वालामुखी फटने से बने बड़े-बड़े खड्ड हैं। वहाँ न हवा है न पानी न हरियाली। दिन में खौला देने वाली गर्मी ओर रात में जमा देने वाली सर्दी पड़ती है। परिक्रमा करते समय जब हमारी पृथ्वी की आड़ में हो जाता है तब अमावस्या के दिन से दीखना बन्द हो जाता है क्रमशः यह आड़ जब कम ज्यादा होती जाती है तो उसी अनुपात से शुक्ल पक्ष में बढ़ना और कृष्ण पक्ष में घटता शुरू हो जाता है। पृथ्वी, सूर्य और चन्द्रमा की अपनी-अपनी अलग-अलग गतियाँ हैं। इस चक्र में कई बार सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा के ऊपर पड़ने के मार्ग में पृथ्वी आ जाती है तो चन्द्र ग्रहण दीखता है। पृथ्वी और सूर्य के बीच चन्द्रमा आ जाता है तो सूर्य ग्रहण पड़ता है। कौन कितना आड़े आया इसी हिसाब से ग्रहण की छाया न्यूनाधिक दीखती है।

अब राहु केतु राक्षस चन्द्र, सूर्य पर आक्रमण नहीं करते। पुरानी मान्यताओं का यह कहकर समाधान करना पड़ता है कि वे राक्षस मात्र इस ग्रहों की छाया ही समझे जाने चाहिए । चन्द्रमा का दर्जा तारापति से- पूर्ण ग्रह से उतार कर छोटे उपग्रह का कर दिया गया। आक्रमणकारी राक्षस विदा कर दिये गये। इतना ही नहीं मानवी प्रगति ने ऐसी-ऐसी कितनी ही पुरातन मान्यताओं को अस्वीकार कर दिया है और वह कड़ुई गोली किसी प्रकार पुरातन पंथियों को भी गले उतारनी पड़ी है।

अपनी पृथ्वी उतर से दक्षिण को 7896 मील और पूर्व से पश्चिम को 7926 मील है। उसका 71 प्रतिशत भाग समुद्र में डूबा पड़ा है। समुद्रों की अधिक से अधिक गहराई 35 हजार फुट है। भूतल के ऊंचे से ऊंचे पहाड़ 29 हजार फुट तक के है। उस सूर्य की एक परिक्रमा करने में 58 करोड़ 46 लाख मील की यात्रा एक वर्ष में पूरी करनी पड़ती है। उसकी चाल 66600 मील प्रतिघण्टा है। अपनी धुरी पर 24 घण्टे में घूम लेती है। पोले आकाश में सांस लेने योग्य हवा कुछ ही दूर तक है। इससे आगे बन्द राकेटों में साँस लेने का अतिरिक्त प्रबन्ध करके ही जाया जा सकता है। प्राचीन काल के लोग अन्यान्य लोकों में ऐसे ही विचरण करते थे, ऐसे कथा, प्रसंगों से पुराण, साहित्य भरा पड़ा है। वैसा करना या मानना अब नितान्त असंभव हो गया है।

अपने पंचांगों में राहु, केतु नामक दो ग्रहों का वर्णन है और वे अन्य ग्रहों की तरह ज्योतिष गणना में अपना सुनिश्चित स्थान बनाये हुए हैं ; पर वे हैं क्या ? यह ठीक से नहीं कहा जा सकता । राहु को पृथ्वी की छाया मान लिया गया है। केतु की व्याख्या पुच्छल तारों के रूप में करते हुए काम चला लिया गया है। पर वे पुच्छल तारे न तो किसी स्थान पर टिकते हैं न इनका आकार निश्चित है। वे घुमक्कड़ सेलानियों की तरह घूमते हैं और अपनी आकृति को घटाते बढ़ाते रहते हैं। केतु एक नहीं वरन् अनेकानेक होते हैं। वे गैसें के बने होते हैं। छोटे-छोटे कंकड़-पत्थर भी उनमें रहते हैं। धुएं के बादलों की तरह एक पारदर्शी बहुत लम्बी पूँछ कभी-कभी आकाश में दिखाई पड़ती है यह पुच्छल तारे केतु कहे जा सकते हैं। यह पूँछ करोड़ों मील लम्बी होती है। उसका एक सिरा पृथ्वी पर और दूसरा सूर्य पर हो सकता है। वे पृथ्वी से लाखों गुने बड़े होते हैं पर वजन में वे धरती के लाखवें हिस्से के बराबर भी नहीं होते। उस पूँछ के बीच में से पृथ्वी मजे से पार हो जाती है ओर हमसे से किसी का उसका आभास तक नहीं मिलता। उनकी पूंछ कटती और उगती रहती है। कई केतु सूर्य की अनियमित परिक्रमा करते हैं कई अनन्त आकाश में ऐसे ‘ही जहाँ-तहाँ स्वेच्छापूर्वक भ्रमण करत रहते हैं। कुछ तो अपनी पुरानी जगह कभी लौटकर नहीं आते और बहुत दिन बाद फिर अपनी पुरानी जगह की खोज खबर लेने आ धमकते हैं। अपने सौरमण्डल में एक केतु है जिसे हैली कहते हैं। पिछले 1800 वर्षों में 21 बार प्रदक्षिणा कर चुका है। वह सन् 1910 में देखा गया था अब 1986 में फिर लौटने वाला है। अब हम इन्हीं घुमक्कड़ों गैसीय बादलों को केतु ग्रह मानकर पुरानी मान्यताओं के साथ कुछ बिठाने का प्रयत्न करते हैं।

उल्कापात किसी समय देवताओं अथवा प्रेतात्माओं की हलचलों के रूप में माना जाता था। किसी महापुरुष के मरने पर एक तारा टूटता है। देवता लोग उल्कापात के माध्यम से पृथ्वीवासियों पर विपत्ति भेजते हैं। यह मानकर लोग भयभीत होकर देव पुष्टि के कर्मकाण्ड रचा करते थे। उल्कापात अब प्रकृति की एक साधारण सी घटना है।

अनन्त आकाश में किन्हीं ग्रह नक्षत्रों के टूटे-फूटे टुकड़े कंकड़ पत्थरों के रूप में उड़ते रहते हैं। वे कभी पृथ्वी के वायुमण्डल में घुस पड़ते हैं तो हवा के घर्षण से वे जलकर खाक हो जाते हैं। यह जलना और दौड़ना ही उल्कापात है। कभी कभी एक साथ सैकड़ों कंकड़ घुसते हैं तो आकाश में आतिशबाजी जैसी लगने लगती है। कुछ पिण्ड बहुत बड़े और अधिक कठोर होते हैं तो उनकी ऊपर परत ही जल जाती है और अधजला हिस्सा धरती पर आ गिरता है। ऐसी उल्काएं संसार भर में जब तक गिरती रहती हैं। उनके छोटे-बड़े नमूने अजायबघरों में प्रदर्शनार्थ रखे गये मिलते हैं। उतर प्रदेश के जालोन जिले में सन् 1928 में एक पचास मन की उल्का गिरी थी और उससे दो किसान तत्काल मर गये थे। उसकी आवाज बीस मील तक सुनी गई थी। आरिजोना अमेरिका में गिरी एक उल्का ने एक मील चौड़ा और सात फुट गहरा गड्ढा कर दिया था। साइबेरिया में 30 जून 1908 में सबसे प्रचण्ड उल्का गिरी थी, उसने पचास मील का जंगल जलाकर खाक कर दिया था। हजारों मनुष्य और पशु-पक्षी मरे थे। अब इन उल्काओं को प्रकृति का साधारण सा खेल माना जाता है, देवात्मा का आतंक नहीं।

पृथ्वी आरम्भ में आग के गोले की तरह थी उसकी ऊपरी परत धीरे-धीरे ठंडी होती गई है और उस पर प्राणियों तथा वनस्पतियों का निवास सम्भव हुआ है। तो भी उसके भीतर अभी भी अचंड गर्मी है। सारा पदार्थ पिघला हुआ है और कड़ाही में खौलते तेल की तरह खुदबुद करता रहता है। इसकी भाप अक्सर धरती के ऊपरी परत बेधकर निकलती रहती है। जिधर से वह निकलती है वहाँ या तो ज्वालामुखी फटते हैं या मामूली भूकम्प आते हैं। यह हलचलें निरन्तर होती रहती हैं। औसतन हर तीसरे दिन में बड़ा और दस मिनट में हलका भूकम्प पृथ्वी पर कहीं न कहीं आता ही रहता है। इनके अनेक कारण होते हैं। समुद्र की तली से पानी रिसकर उस आग्नेय द्रव पदार्थ तक पहुँचता है तो उसकी भाप विस्फोट करती हुई ऊपरी सतह को फाड़ती है। नये पहाड़ों के भीतर जहाँ तहाँ गुफाओं की तरह बड़ी-बड़ी पोल हैं, वे धंसकती रहती है। पृथ्वी के ऊपरी पपड़ी सिकुड़ती रहती है। ऐसे-ऐसे अनेकों कारण ज्वालामुखी फटने अथवा भूकम्प आने के हैं। उससे नये टापू निकलते, पुराने डूबते तथा भयंकर समुद्री तूफान आते हैं। संसार में ऐसी पट्टियाँ भी मौजूद है जिनके क्षेत्र में अक्सर भूकम्पों का ताँता लगा रहता है। उन्हें भू-गर्भ की सामान्य हलचलों में एक सहज प्रक्रिया मान लिया गया है।

हम प्रगति के पथ पर क्रमशः बढ़ रहे हैं। हमारा ज्ञान बढ़ रहा है साथ ही पुरानी मान्यताओं के स्थान पर नये प्रतिपादनों की स्थापना करती पड़ रही है। यह क्रम अनादिकाल से चला आ रहा है और अनन्त काल तक चलता रहेगा। आज की अपनी स्थापनाओं में भी भविष्य के विकास क्रम के अनुरूप परिवर्तनों की शृंखला चलती ही रहेगी।

हमें दुराग्रही नहीं होना चाहिए और पूर्वजों के प्रति पूर्ण आस्थावान रहते हुए भी यह मानकर चलना चाहिए कि भूतकाल में जो माना या कहा जाता रहा है वही अन्तिम नहीं है। विकास क्रम के साथ-साथ मान्यताओं का हर क्षेत्र में विकास उसी तरह होता रहेगा जैसा कि अपनी पृथ्वी और सौरमण्डल सम्बन्धी प्रतिपादनों के संदर्भ में हुआ है।

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